जड़ी-बूटियों की प्रयोगशाला

22.06.2018

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-दयानन्द राय

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66 साल के डॉ सुरेश अग्रवाल अनोखे हैं। अनोखे इसलिए हैं कि एलोपैथिक सर्जन होने के बाद भी उन्होंने अपना जीवन जड़ी-बूटियों से दवाओं के अनुसंधान में लगा दिया है। लालपुर स्थित अपने घर को बीते तीस सालों से न सिर्फ जड़ी-बूटियों की प्रयोगशाला के तौर पर तब्दील कर दिया है, बल्कि वे इसमें खुद प्रयोग कर दवाएं बनाते भी हैं। रूसी के इलाज के लिए उन्होंने आयुर्वेदिक दवा डेंड्रोजेल बनायी है और इसे जरुरतमंद मरीजों को मुफ्त उपलब्ध कराते हैं। यही नहीं अपने घर के बगीचे में उन्होंने 50 से ज्यादा मेडिसीनल प्लांट लगा रखे हैं।
इंटीग्रेटिव मेडिसीन से होगा बेहतर इलाज
डॉ सुरेश अग्रवाल ने बताया कि कोई भी चिकित्सा पद्धति अपने आप में पूर्ण नहीं है। एलोपैथी हो या यूनानी या आयुर्वेद सबमें बेहतरी की संभावनाएं हैं। पर मुझे आयुर्वेद भारतीय परिदृश्य में ज्यादा बेहतर चिकित्सा पद्धति लगती है। क्योंकि इसमें इलाज सस्ता है। देशभर में 7000 पौधे मेडिसीनल प्लांट के तौर पर यूज किए जाते हैं और उनमें 1200 पौधों का जिक्र आयुर्वेद में है। बीते 30 सालों से मैं जडी-बूटियों पर रिसर्च कर रहा हूं और अब 200 मेडिसीनल प्लांटस को पहचान भी लेता हूं। डैंडर्फ से छुटकारे के लिए मैंने डेंड्रोजेल बनाया और महिलाओं के संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए अमृता स्वरस बनाया। बालों की समस्याएं दूर करने के लिए केश रक्षक योग और शरीर की इम्यूनिटी बरकरार रखने के लिए इम्यूटोन टैब्लेट बनाया।
पिंडलियों के दर्द से दिलाया छुटकारा
रांची की अनामिका को पिंडलियों में जबर्दस्त दर्द होता था। इससे वह परेशान रहती थीं। किसी ने उन्हें डॉ सुरेश अग्रवाल का पता बताया। उनकी विकसित गोलियों से उनका दर्द जाता रहा। इसी तरह कांके की मालती देवी बीते दस वर्षों से माइग्रेन से परेशान थीं। डॉ सुरेश अग्रवाल के ट्रीटमेंट में आयीं तो उन्होंने माइग्रेन के लिए उन्हें शिरीष पुष्प से बनी सूंघने की दवा दी। इससे उनका मर्ज बहुत हद तक ठीक हो गया। डॉ अग्रवाल ने बताया कि माइग्रेन में शिरीष के फूल सूंघने से बहुत फायदा होता है। पर हरेक मौसम में शिरीष के पुष्प नहीं मिलते। ऐसे में हमने शिरीष पुष्प नस्य बनाया जो हर मौसम में मिल सकता है। मेडिसीनल प्लांटस के फायदों की जानकारी सबको हो इसके लिए उन्होंने 11 चुनिंदा प्लांटस की एक पुस्तिका भी बनवायी है। इनमें अमूता, कालमेघ, घृतकुमारी, पिप्पली, पुनर्नवा, ब्राहमी, भुईं आंवला, मंडूकपर्णी, वासक, शतावर और हरसिंगार से होनेवाले फायदों की जानकारी सबको हो इसके लिए उन्होंने 11 चुनिंदा प्लांटस की एक पुस्तिका भी बनवायी है। इनमें अमूता, कालमेघ, घृतकुमारी, पिप्पली, पुनर्नवा, ब्राहमी, भुईं आंवला, मंडूकपर्णी, वासक, शतावर और हरसिंगार से होनेवाले फायदों की जानकारी दी गयी है।
सरकार को रिसर्च करना चाहिए
रिम्स के मेडिसीन के प्रोफेसर डॉ संजय सिंह ने बताया कि डॉ अग्रवाल व्यक्तिगत तौर पर मेडिसीनल प्लांटस पर जो रिसर्च कर रहे हैं वह काबिले-तारीफ है। चिकित्सक का यह फर्ज होता है कि वह मरीजों को रोगमुक्त करने के लिए काम करे। जडी-बूटियों पर रिसर्च होना चाहिए पर दुर्भाग्य से सरकार इनके अनुसंधान पर पैसे खर्च नहीं कर रही है। जबकि विदेशों में अनुसंधान पर भारी-भरकम राशि खर्च हो रही है। डायबिटीज के इलाज के लिए मेटफोर्मिन नाम की दवा यूज की जाती है। यह सबसे कारगर दवा है और यह आयुर्वेद से ही आयी है। चीन में देशी जडी-बूटियों से अनुसंधान का काम जबर्दस्त तरीके से चल रहा है। इससे वहां सस्ती दवाएं विकसित हुई हैं और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च भी कम हुआ है। अपने देश में भी इस तरह का काम होना चाहिए। वहीं आरोग्य भारती के प्रांतीय सदस्य डॉ संजय सिंह ने कहा कि डॉ अग्रवाल निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा के लिए जो अनुसंधान कार्य कर रहे हैं वह सराहने योग्य है। ऐसे लोगों से ही स्वस्थ और बेहतर समाज का निर्माण किया जा सकता है।