मागो यानी मार गिराओ

22.06.2018

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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मागो मुंडा समाज की वह प्राचीन प्रथा है जिसमें सह गोत्र में विवाह कर लेने वाले जोड़ो को खाप पंचायत की तर्ज पर मृत्युदंड तक दे दिया जाता था। इसी प्रथा को मुंडा समाज में वर्षो से लोग मागो के नाम जानते आ रहे हैं.
मा जोड़ गो यानी मार गिराओ.
झारखंड में अनेकों परंपराओं में कुछ अनोखी परंपराएं भी हैं. आदिवासियों के रहन-सहन से लेकर उनकी विविध संस्कृति. लेकिन इनके यहां भी विवाह की नियमवाली में गोत्र वाली प्रथा हिंदू धर्म से विचित्र नहीं है. इन दोनों समुदाय में एक ही गोत्र में शादी करने की सख्त मनाही की गई है, और ऐसा नहीं करने पर सजा की व्यवस्था है. हालांकि हिंदू समाज में कोई कड़े दंड के प्रावधान तो नहीं हैं, पर आदिवासियों में खाप पंचायत की तर्ज पर उस जोड़े को समाज में मृत्यु तक दे दी जाती थी.  इसी प्रथा को मुंडा समाज में वर्षो से लोग मागो के नाम जानते आ रहे हैं. मा जोड़ गो यानी मार गिराओ.
क्या है गोत्र और मागो?
आमतौर पर लोग इस प्रथा को सहगोत्री के नाम से जानते हैं, लेकिन झारखंड के छोटानागपुर के मुंडा समाज में इसकी पहचान मागो शब्द से है. मागो के शिकार हुए कई जोड़ों का जिक्र करते हुए रायफोर टोप्पनो बताते हैं, एक बार बियाकेल में लगभग 50 वर्ष पहले जब बृज्जा गोड़िया ने अपने ही गोत्र की लड़की से शादी कर ली थी. तब उसे और उसकी पत्नी दोनों को ही जान से मारकर गांव की सीमा पर उनके नाम से पथलगड़ी कर दी गयी थी. मागो यानी मार गिराओ. इसके अलावा उन्होंने कई जोड़े को देशाबाहार कर गांव की सीमा से सदैव के लिए बाहर कर देने की घटना भी बताई. उनके मुताबिक हुक्का-पानी बंद कर गांव से बाहर निकाल देना. बांस टोली गांव के बुजुर्ग दिलेश्वर गुड़िया और उसी गांव के समसुन टोप्पनो बताते हैं कि हमारे यहां दूसरी जाति और रिश्तेदारों में शादी करने पर बोरा और गाय बर्धी करने यानी हुक्का-पानी बंद कर गांव बाहर निकाल देने का भी प्रवाधान है. वह कहते हैं कि नरेश मुंडा ने जब एक ही गोत्र में शादी की थी, तब ग्रामसभा ने उसे गांव बाहर कर दिया गया था. पंद्रह साल बीत जाने के बाद भी उसे आजतक गांव में चढ़ने नहीं दिया गया है. पत्रकार अनिल भगत कहते हैं कि ऐसे जोड़े अक्सर भाग कर असम चले जाते हैं. 
गोत्र यानी खून का रिश्ता
आदिवासियों में गोत्र यानी खून का रिश्ता. एक ही उपनाम या गोत्र के संबंध में भाई और बहन की तरह ही रिश्ता माना जाता है. लोग इसे अपने वंश के सम्मान से जोड़कर देखते हैं. हिंदू समाज में भी गोत्र को एक ही वंशज की सारी संतान मानता है. मुंडा में कोई लड़का या लड़की एक ही गोत्र में शादी कर लेता है तो उसे मागो यानी हुक्का पानी (दाना-पानी) और गांव बदर (गांव से बाहर) कर दो की सजा मिलती है.  
हालांकि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन जानकार कहते हैं कि आदिवासियों में गोत्र का बंटवारा करने का श्रेय रिसा मुंडा को जाता है. बताया जाता है कि लगभग 30-35 हजार वर्ष पूर्व उन्होंने अलग-अलग कबीलों (खंड) में बांटकर गोत्र की बुनियाद डाली थी. जबकि हिंदू समाज में गोत्र का बंटवारा ऋषि-मुनियों ने किया था, और माना जाता है कि इनके यहां नौ ऋषि है. मुंडाओं के उपनाम प्राकृतिक तत्वों के नाम पर पड़े हैं. जैसे पेड़, पक्षी, पशु से संबंधित कई उपनाम है. आईंद नदी मछली पर, चौरिया चूहे पर और कई ऐसे नाम हैं.
प्रथा के प्रावधान में बदलाव
शादी-विवाह की नियमावली संभवत: सभी धर्मो में रीति-रिवाज और परम्पराओं पर आधारित है. मुस्लिम समाज की भी कई जातियों में इसे नहीं मानने पर हुक्का पानी यानी गांव-मुहल्ले और जात निकाल देने की प्रथा अब भी कायम है. मुस्लिमों में बहुत पहले ये बहुत हद तक आदिवासियों जैसा ही दंड का प्रावधान था. जिसकी कुछ बातें मुस्लिम के कुरैश, कलाल, गद्दी, राईन, धोबी और इदरीसी समाज में आज भी है. लेकिन मुस्लिमों में गोत्र वाला मामला एकदम उल्टा है. इनके यहां रिश्तेदारों में शादी की प्रथा इस्लाम धर्म के प्रारंभ से ही होती आ रही है, लेकिन मुस्लिमों की जिन जातियों का जिक्र हुआ वहां के नियम विचित्र हैं. इनके यहां अगर कोई दूसरी जाति में शादी कर लेता है, तब सजा का प्रावधान है. जबकि आदिवासियों में एक गोत्र में शादी करने पर सजा दी जाती है.
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण मुंडा मागो प्रथा के बारे में बताते हैं कि आज भी आदिवासियों में एक गोत्र में शादी करने पर दंड दिया जाता है. लेकिन वक्त के साथ इसमें काफी बदलाव आया है. प्रवीण मुंडा कहते हैं पहले का नियम बहुत ही कड़ा था. अगर कोई सहगोत्री विवाह करता था तो उसे पैतृक संपत्ति से बेदखल कर आदिवासी समाज से बाहर कर दिया जाता था. उस जोड़े के जीवित रहते हुए भी उसके नाम से गांव के सिमान (बॉर्डर) पर पथलगड़ी कर दिया जाता है. जिसपर उसके की मृत्यु दर्शायी जाती थी.
वैज्ञानिक नजरिया
लेखक और आदिवासी मामलों के जानकार अश्विनी पंकज मागो का प्रथा को सही ठहराते हैं, और इसे आदिवासियों के अस्तित्व जोड़कर देखते हैं. इस संदर्भ में कहते हैं कि इस प्रथा को आदिवासियों के अलग-अलग समूह और जगहों  विभिन्न नामों से जाना जाता है. ये मेडिकल के दृष्टिकोण से सही है. एक ही गोत्र में विवाह करने से प्रजजन क्षमता कम होती है, और ये बात मेडिकल साईंस  ने भी माना है. जहां तक सजा का प्रावधान है तो उसे इसलिए रखा गया कि ताकि सहगोत्री विवाह पर लगाम लगे.