ग्रामसभा को नहीं चाहिए विकास समितियां

22.06.2018

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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झारखंड सरकार के ग्रामीण विकास विभाग (पंचायती राज) ने ग्राम स्तर पर 30 हजार आदिवासी विकास समिति और ग्राम विकास समिति बनाने का निर्णय लिया है. इसे 13 मई, 2018 को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है. तभी से सरकार के इस फैसले के विरोध में ग्रामसभाओं में स्वर फूटने लगे थे, धीरे-धीरे इसका असर सड़कों पर भी दिखने लगा है. ज्ञात हो कि झारखंड में लगभग 32 हजार गांव आते हैं. समिति के गठन के सम्बंध में लोगों का मानना है कि इससे ग्रामसभाओं के अधिकार खत्म हो जायेंगे।
कानून का उल्लंघन
कानून के जानकार और जंगल बचाओ आंदोलन से जुड़े संजय बासु मल्लिक ग्राम विकास समिति और आदिवासी विकास समिति के बारे में कहते हैं कि सरकार को इन समितियों के गठन से पहले बताना चाहिए था कि कैसे और कानून के किस प्रावधान के तहत इसका गठन किया गया है. जबकि केंद्रीय पेसा कानून (1996) और झारखंड पंचायती राज्य अधिनियम (2001) में स्पष्ट उल्लेख है कि गांव में कोई भी विकास का काम करने का अधिकार ग्रामसभा को ही है. यही बात वन अधिकार कानून 2016 और झारखंड पंचायती राज्य अधिनियम में भी कही गई है, लेकिन सरकार ने इसे नजरअंदाज करके ग्राम विकास समिति का गठन किया है, जो पूरी तरह से गैर संवैधानिक है.
वहीं, कुमार संजय समिति के निर्माण और इनके माध्यम से गांव में विकास का काम कराया जाना संविधान के 73वें संशोधन और आदिवासी क्षेत्रों में लागू पांचवीं अनुसूची का उल्लंघन मानते हैं. संजय ने अपने कई लेखों में इस बात का जिक्र किया है कि ग्राम विकास समिति और आदिवासी समिति के गठन से बिचौलियों का एक बड़ा वर्ग खड़ा हो जायेगा. उन्होंने कहा कि झारखंड में पांचवीं अनुसूची का इलाका आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका को सर्वोपरि माना गया है. कानून ने ग्रामसभा को गांवों में सामाजिक-आर्थिक विकास का कार्य करने की विशेष शक्तियां दी है.
कानून सरकार को अधिकार नहीं देता
झारखंड वन अधिकार मंच के संयोजक फादर जॉर्ज मनीपल्ली कहते हैं कि अलग से आदिवासी विकास समिति और ग्राम विकास समिति बनाना कानून संबंध नहीं है. पंचायती राज्य अधिनियम में ग्रामसभा और पंचायत को जो शक्तियां दी गयी हैं उसका उल्लंघन है. मेरा मानना है कि जो समिति ग्रामसभा के अधीन पहले से बनी हुई थी, उसे मजबूत करने के बजाय अलग से सरकार के द्वारा समिति का गठन किया जाना पंचायती राज्य व्यवस्था को खत्म करना है.
उन्होंने कहा कि गांव में किसी भी सरकारी विकास की योजनाओं का क्रियान्वयन करने या उसके क्रियान्वयन हेतु समिति का गठन करने का अधिकार कानून के तहत ग्रामसभा को दिया गया है ना कि राज्य सरकार को. इस तरह की समिति का गठन और उसके सदस्यों के चयन का अधिकार भी ग्रामसभा को है, लेकिन यहां सरकार ग्रामसभा के चंद लोगों को लेकर ग्राम स्तर पर समिति का गठन नहीं कर सकती है.
झारखंड में पंचायती राज्य अधिनियम के सेक्शन-10बी के तहत ग्रामसभा ने ऐसे कार्यों के लिए आठ समितियों का गठन किया है. सरकार ने आजतक उन्हें विकास का काम करने के लिए राशि नहीं दी, बल्कि गैरकानूनी ढंग से नई समितियों का गठन कर दिया. 
कैसी होगी समिति
गांव में छोटे-छोटे विकास कार्यों की जिम्मेदारी ग्राम विकास समिति और आदिवासी विकास समिति के अधीन होगी. ये समितियां गांव में पांच लाख तक के विकास के कार्य कर सकेंगी. इन समितियों का प्रशासानिक और वित्तीय नियंत्रण प्रखंड विकास पदाधिकारी के जिम्मे होगा. कमेटी स्वशासी परिषद् के अंतर्गत काम करेगी. इसका गठन 100 घरों से ज्यादा वाले गांव में किया जायेगा. समिति में 11 सदस्यीय टीम होंगी, जिसकी अध्यक्ष महिला होगी. अनुसूचित क्षेत्रों और 50 फीसदी से अधिक एसटी आबादी वाले गावों में आदिवासी विकास समिति और शेष गांवों में ग्राम विकास समिति का गठन किया जायेगा.
ग्रामसभा के अधिकार और शक्तियां
ग्रामसभा को पंयायती राज्य व्यवस्था में सर्वोच्य अधिकार मिला हुआ है. ग्राम सभा को अधिकार है कि अनुसूचित क्षेत्र में जानजातियों के शोषण का विरोध करे उन समुदायों को राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक विकास से जोड़े. भूमि, वन, जल, और खनिज संपदा का उपयोग गांव के विकास और अपने आजीविका लिए कर सकती है. प्राकृतिक संसाधनों का गांव के विकास के लिए प्रयोग करना. गांव की भलाई और सामुदायिक विकास के लिए जल, जंगल और जमीन को उपयोग करना. जमीन विवाद के मामले को निपटारा करना. हत्या छोड़कर हर स्तर के पारिवारिक व गांव के झगड़ों को निपटारा करना. भूमि संपत्ति विवाद को सुलझाना. त्योहारों व धार्मिक मामलों में पारंपरिक भूमिका निभाना. इसी तरह के कई और अधिकार ग्राभसभा को दिए गये हैं.
क्या कहता है कानून
ग्रामसभा और पंचायतों के अधिकारों की सुरक्षा पंचायती राज्य अधिनियम के अलावा पेसा कानून और वन अधिकार अधिनियम भी करता है. पेसा अधिनियम के तहत अनुसूचित जनजाति के लोगों को स्वशासन करने का अधिकार देता है. इसके तहत जल, जंगल, जमीन पर उनका पहला अधिकार होगा. वन अधिकार अधिनियम (2006) वन संबंधी नियमों का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है. यह कानून जंगलों में रह रहे लोगों के भूमि तथा प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार से जुड़ा हुआ है. इसके तहत गांव वाले या जंगलों में रहने वाले अपने आजीविका के लिए लकड़ी व अन्य वनोपज का उपयोग कर सकते हैं. पंचायती राज्य अधिनियम में भी यही अधिकार दिया गया है.
कैसी और क्या करेगी समिति
गांव में छोटे-छोटे विकास कार्य ग्राम विकास समिति और आदिवासी विकास समिति के जिम्मे होंगी. ये समितियां गांव में पांच लाख तक के विकास के कार्य कर सकेंगी. इन समितियों का प्रशासानिक और वित्तीय नियंत्रण प