झारखंड की तर्ज पर बिहार में सब्जी उत्पादन

02.07.2018

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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महिलाओं की मेहनत से गोकुर गांव के कमोबेश अब हर घर से बदहाली के बादल छंठ चुके हैं. बिहार के सारण जिले के इस गांव की महिलाएं बिना किसी सहयोग के आत्मनिर्भर हैं. अपने घर की  बाड़ी में बीज बोने में व्यस्त रामेश्वरी देवी ये सब एक सांस में कहती हैं. वहीं  पास के खेतों में लगभग 70 के करीब महिलाएं सब्जी उगाने में लगी थीं, जिसे रामेश्वरी अपनी उंगलियों के इशारों से दिखाते हुए मुस्कुराने लगतीं.

दरअसल, पिछले कई महीनों से गोकुर गांव की महिलाएं काफी मात्रा में सब्जी उगा रही हैं और इस काम में पुरुषों से काफी आगे हैं. मोहम्मदपुर पंचायत स्थित गोकर गांव की अधिकतर आबादी पिछड़ी और दलित तबके की है. सब्जी की खेती से इनके घरों की आर्थिक तंगी दूर हो गई और अब गांव की महिलाएं सब्जी उगाने की विधि को आजीविका के तौर पर देखती हैं. गोकुर गांव की तस्वीर झारखंड के खूंटी के माहिल गांव से मिलती-जुलती है. खूंटी के माहिल गांव में भी महिलाएं अपने घरों की बाड़ियों में सब्जी उगाती  हैं. जो खूंटी के कई प्रखंडों के हाटों और बाजारों में भेजी जाती हैं. जानकार कहते हैं कि जिस तरह झारखंड में कम जगहों पर अधिक सब्जी उगाई जाती है, इसी तर्ज पर बिहार के इस गांव की महिलाएं सब्जी उत्पादन कर रही हैं.

झारखंड में सब्जी उत्पादन अन्य राज्य की तुलना में काफी अधिक होती है. सरकार इसके उत्पादन और निर्यात के लिए कई योजनाएं चला रही हैं. पिछले साल ही झारखंड सरकार ने सब्जी उगाने और इसके निर्यात के उद्देश्य से रांची के तिकराटोली में 88.77 करोड़ की फसल इकाई का उद्घाटन किया है. जबकि चार मई 2018 को ही ब्रिटेन के लंदन की कंपनी इंटरनेशनल ट्रेसेयिबिलिटी सिस्टम लिमिटेड ने बड़े स्तर पर सब्जी उगाने के उद्देश्य से झारखंड सरकार के साथ 100 मिलियन डॉलर निवेश करने का एग्रीमेंट किया है. यही वजह है कि बिहार जैसे राज्य को सब्जी के मामले में झारखंड से आयात करना पड़ता.

सब्जी उगाने में गांव का संघर्ष

आर्थिक दृष्टिकोण से गोकुर गांव की हालत काफी पिछड़ी हुई है. यहां के लोगों के जीवन-यापन का सहारा मौसमी खेती ही है. जब कभी मौसम का मिजाज बिगड़ता है तो गांव की आर्थिक स्थिति और दयनीय हो जाती है. ऐसे में यहां की महिलाओं के द्वारा सब्जी उगाने वाली वैकल्पिक पहल गांव की तस्वीर बदलने में सहायक साबित हो रही है.

गृहिणी शांति देवी कहती हैं कि हमलोगों को इस काम में कोई बाहरी सहयोग नहीं मिलता है. बस समाज का साथ मिले तो आगे इस क्षेत्र में और बेहतर कर सकती हैं. अब तक यहां के खेतों का इस्तेमाल गेहूं, चावल, दाल पारम्परिक फसलों को उगाने के लिए होता आया है. अब हमलोगों ने इस चीज को बदल डाला है.

सब्जी के सहारे गरीबी से लड़ाई

गांव में आई आर्थिक तब्दीली को गांव की महिलाओं के लिए कई मायने में महत्व रखता है. अगर सरकार इसमें सहयोग कर बिहार  के सभी गांवों में सब्जी उगाने की विधि पर ध्यान दे तो गांव ही नहीं, बल्कि राज्य की समृद्धि होगी. राजपति देवी कहती हैं कि हमलोग हर तरह की सब्जियां उगाते हैं. आलू, प्याज, गोभी, टमाटर, लौकी, आलू, भिंडी, बैंगन, खीरा, तोराई आदि बारहों माह इसकी खेती करते हैं. यहां की सब्जी सिर्फ सारण ही नहीं, बल्कि बिहार के अन्य जिलों में भी जाती है. रामेश्वरी देवी और राजपति देवी के पास खेत के नाम पर पांच-पांच कट्ठा ही जमीन है यानी 15-15 डिसमिल. पर अपनी मेहनत और लगन से ये दोनों एक-एक बीघा के बराबर सब्जी उपजाती है.

यही वजह है कि अब इन्हें नियिमत आय के लिए चिंता नहीं करनी पड़ती है. राजपति देवी बताती हैं कि अब हमें घर चलाने के लिए सोचना नहीं पड़ता है. प्रखंड कृषि अधिकारी नवीन प्रताप सिंह का मानना है कि इन महिलाओं की ये पहल बहुत ही सराहनीय है. ये सब्जी की खेती के सहारे गरीबी से लड़ने जैसी है, जो महिला सशक्तीकरण का उदाहरण है.

दो सौ घरों में हुआ आर्थिक बदलाव

पोस्ट ऑफिस में कार्यरत  मनोज कुमार कहते हैं कि गांव में पेशेवर ढंग से सब्जी उगायी जा रही है. पहले कुछ ही घरों की महिलाओं ने इस काम को शुरू किया था. लेकिन धीरे-धीरे इन्हें देख गांव की कई गृहिणियां भी इसमें लग गयीं. छह माह के अंदर इनका एक बड़ा समूह बन गया, जो सब्जी की खेती व्यवसाय के तौर पर करने लगा. वर्तमान में दो सौ घरों की महिलाएं इसमें लगी हुई हैं. इनकी इस व्यवस्था को सरकार के किसी स्तर से सहायता तो नहीं मिलती है, पर बड़ी उत्सुकता से दूसरे ब्लॉक आदि के अधिकारी तक इनकी खेती के तरीके को देखने आते हैं. पुलक कुमार सारण जिले के ही गरखा प्रखंड के कल्याण अधिकारी हैं, जो इसे देखकर कहते हैं इनकी ये पहल देश की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा है. इससे न सिर्फ महिला सशक्तीकरण होगा बल्कि देश और मजबूत होगा. गांव के चंदन कुमार इसे साइलेंट चेंज ऑफ प्रोस्पेरिटी बताते हैं.

सरकार से उम्मीद

मोहम्मदपुर पंचायत के मुखिया दिनेश कुमार राय को गांव की महिलाओं पर गर्व है. वह चाहते हैं कि इन्हें किसी तरह सरकार से कुछ सहयोग मिल जाए, ताकि इनकी पहचान किसान के तौर पर हो. दिनेश राय कहते हैं कि इन महिलाओं को सरकारी सहयोग मिलना चाहिए. मैं भी इन्हें सरकारी सहयोग दिलाने और इसे प्रोत्साहित करने में लगा हुआ हूं. वहीं गांव की महिलाओं को भी सरकार से सहयोग की उम्मीद है.

कृषि बहुल्य राज्य, लेकिन झारखंड से पिछड़ा

बिहार कृषि बहुल राज्य है. कृषि के क्षेत्र में राज्य की 77 प्रतिशत रोजगार दर है, जो कि राष्ट्रीय औसतन से कहीं ज्यादा है. लेकिन बावजूद इसके बिहार सब्जी उत्पादन में अपने ही पड़ोसी और काफी छोटे राज्य झारखंड से पिछड़ा हुआ. झारखंड मे मोहम्मदपुर पंचायत क