चतरा के आदिवासी किसान जायें तो जायें कहां

03-10-2018

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए. खान

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झारखंड के चतरा जिला के किसानों के सामने बेघर होने का खतरा मंडरा रहा है. कारण है वन क्षेत्र के जिस भू-भाग पर कई पीढ़ियों से वे रहते आये हैं, वन विभाग द्वारा उन्हें खाली करने का नोटिस दे दिया गया है. अब उनकी चिंता यह है कि जमीन से बेदखल होकर आखिर वे कहां जायेंगे. अपनी जमीन को न बचा पाने की बेबसी के बीच उनकी चिंता दोगुनी तब हो जा रही है जब उनकी फरियाद भी सुनने वाला कोई नहीं है. जबकि ये किसान कह रहे हैं कि वे जिस जमीन पर रह रहे हैं उनके पास उस पर मालिकाना दावा करने के कागजात भी हैं, लेकिन उनके दावे को वन विभाग सही नहीं मान  रहा है.

चतरा जिले के कई गांव के किसानों और ग्रामीणों पर वन विभाग दबाव दे रहा है कि वे जल्द-जल्द से मकान और जमीन खाली कर दे. वन विभाग ने इस बाबत गांव वालों को नोटिस भी दे रखा है. वन विभाग के अधिकारी द्वारा मौखिक चेतावनी भी दी गयी है. इसी वजह से विभिन्न गांवों के 600 से भी अधिक किसान परिवारों पर बेघर होने का संकट मंडराने लगा है. इनकी 1400 एकड़ से भी अधिक जमीन को वन विभाग ने वन भूमि बताकर खाली करने का नोटिस भेजा है. किसान कहते हैं कि इस जमीन पर वे कई पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं.

हमारे साथ धोखा हुआ

लावालौंग प्रखंड के पतरातू गांव के तुलसीदास हों या विनोद दास, सबका एक ही कहना है कि वन विभाग द्वारा उनके साथ धोखा हुआ है. तुलसीदास के अनुसार, धोखे की शुरुआता एक साल पहले तब हुई जब वन विभाग के एक रेंजर ने आकर उनकी जमीन पर वन विभाग का पिलर गाड़ दिया. रेंजर का कहना था कि यह पिलर निशान के तौर पर गाड़ा जा रहा है, बाद में गांव वाले इसे उखाड़ सकते हैं. लेकिन अब वन विभाग की भाषा बदल गयी है. वन विभाग के अधिकारी कह रहे हैं कि यह वन भूमि है, इस पर वे खेती नहीं कर सकते और उन्हें घर भी खाली करना होगा.

दूसरी ओर, विनोद दास का कहना हैं उनका परिवार तीन पीढ़ियों से यहां रहता आ रहा है. उनके पास जमीन का पर्चा, रसीद और नक्शा भी है, पर वन विभाग इसे मानने को तैयार नहीं है. 60 वर्षीय गोपाल राम के मुताबिक वह बाप-दादा के समय से इसी जमीन से गुजर-बसर करते आ रहे हैं. अगर उनसे उनकी जमीन छीन ली जाएगी, तो परिवार को लेकर वे कहां जायेंगे.

आगे जीवन यापन की चिंता

आगे जीवन कैसे यापन करेंगे की चिंता माथे पर लिए कान्हा चट्टी प्रखंड के छेवटा गांव के जुलाल दांगी कहते हैं कि वन विभाग के अधिकारी ने जेल में डाल देने धमकी देकर और उनसे लिखित ले लिया है कि वे अब से इस जमीन पर खेती नहीं करेंगे और मकान समेत जमीन खाली कर देंगे. जुगल के अनुसार, उनके पूर्वजों ने जमींदार से 44 हुकुमनामे पर जमीन ली थी. 1957 से लेकर 2012 तक रसीद भी कटी, लेकिन इसके बाद से रसीद कटनी बंद हो गयी. अब वन विभाग किसी भी कागज को नहीं मान रहा. जुलाल के अनुसार, वही नहीं, इस गांव में लगभग एक दर्जन ऐसे किसान परिवार हैं, जिन पर वन विभाग की गाज गिरी है.

भय का माहौल

चतरा प्रखंड के पकरिया और ढड़हा गांव में 100 से भी अधिक परिवारों में भय का माहौल है. यहां के प्रदीप उरांव बताते हैं कि कई घरों को वन विभाग ने जमीन खाली करने का नोटिस दिया था और उसी दौरान उनकी जमीनों पर पिलर गाड़ा गया था. इस गांव में किसानों के पास जमीन का पर्चा भी है और रसीद भी. यहां हर परिवार के पास दो से तीन एकड़ जमीन है, जिस पर पर वे वर्षों से खेती करते आ रहे हैं.

65 वर्षीय बधुआ तिर्की कहते हैं, जमीन ऐसे कैसे खाली कर देंगे. हमलोग तीन पीढ़ी से यहां रहते आ रहे हैं. और अगर खाली कर देंगे तो कहां जायेंगे. राजेंद्र भारती बताते हैं, तीन महीने पहले अधिकारी आये थे, और कहकर गये कि जमीन खाली कीजिए, नहीं तो मकान गिरा देंगे. इसी जमीन से जीवन गुजर-बसर हो रहा है, अगर सरकार इसको ले लेगी तो हमलोग सड़क पर आ जायेंगे.

इस गांव की अधिकांश आबादी और इससे पीड़ित परिवार दलित व आदिवासी है, जिनकी 250 एकड़ से अधिक की जमीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है.यहां के कई किसानों ने इसे लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है.

चतरा प्रखंड के हीगोडरा, लुपुंगा और लातबेरगांव में ये आंकड़ा तकरीबन 400 के करीब है, जहां के किसानों और ग्रामीणों को वन विभाग की तरफ से कोई नोटिस तो नहीं मिली है, लेकिन सर्वेयर ने यह बताकर कि उनकी जमीन का पंजीयन नहीं किया गया है, इसलिए ये वन भूमि की जमीन है और इसे लेकर किसी भी समय नोटिस दिया जा सकता है और खाली करवाया जा सकता है.

आन्दोलन के मूड में किसान

कान्हा प्रखंड के भांग कुरकुट्टा गांव के रहने वाले तेतर सिंह की उम्र 70 साल से ज्यादा की है. वन विभाग के नोटिस ने इनकी परेशानी को इस उम्र में और बढ़ा दिया है. वे कहते हैं, रेंजर और सिपाही ने गांव से भागने को कहा है. कहते हैं, जल्दी जमीन खाली करो. पेपर को नहीं मान रहे हैं और घर तोड़ने की बात कह रहे हैं. हम कहां जायेंगे, क्या करेंगे, कोई उपाय नजर नहीं आ रहा है. आखिर में फांसी लगाकर मर जायेंगे.

इस गांव में 14 किसान परिवार हैं, जिनकी 40 एकड़ जमीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है. वहीं चतरा प्रखंड के पावो गांव के आदिवासी किसानों का कहना है कि उनकी जमीन पर 2005 में ही वन विभाग ने ट्रेंच ( जमीन काट देना) कर वृक्षारोपण शुरू कर दिया था. इस बारे में मदन मुंडा कहते हैं कि उनके पास पर्चा, रसीद, केबाला सब है. इसी को आधार बनाकर हमलोग हाईकोर्ट तक गये, लेकिन कुछ नहीं हुआ. अंत में हार मानकर हमने प्रयास छोड़ दिया है. इन छह परिवारों की 14 एकड़ जमीन पर वन विभाग ने वृक्षारोपण कर रखा है. इसी तरह लावालौंग प्रखंड के पारा मातू गांव के दस दलित किसानों की लगभग 20 एकड़ जमीन को वन विभाग ने खाली करने का लेकर नोटिस भेजा है. जबकि चतरा प्रखंड के ही लरकुआ, शकवाही गांव के 35 किसानों की 80 एकड़ जमीन को भी वन भूमि बता दिया गया है.

वन विभाग का पक्ष

इस सम्बंध में चतरा डीएफओ का कहना है कि वन विभाग जो भी कार्रवाई कर रहा है, वह सरकार के निर्देश प हो रहा है. डीएफओ आरएन मिश्रा कहते हैं, हमे सुप्रीम कोर्ट के अालोक में सरकार की तरफ से निर्देश दिया गया है कि सभी वन भूमि चिह्नित कर उसे अतिक्रमण से मुक्त कराया जाए. जिन जगहों पर वन भूमि चिह्नित हुई हैं वहां के ग्रामीणों को समय दिया गया है और कहा गया है कि अगर उनके पास जमीन के पेपर हैं तो दिखाकर  अपना पक्ष रखें.

डीएफओ ये भी कहते हैं कि जिन जगहों पर वन विभाग की तरफ से गलत पिलर गाड़ दिया गया, उसे हटा भी  रहे हैं. पेपर, रसीद के बावजूद जमीन को वन भूमि क्यों बताया जा रहा है के प्रश्न पर डीएफओ कहते हैं कि उनमें अधिकतर ग्रामीणों के पास फर्जी कागजात है. अगर इसके बावजूद उन्हें लगता है कि गलत किया गया है तो वे डीसी और न्यायालय में अपील कर सकते हैं.

आदिवासी किसानों को जमीन खाली करने को लेकर मिले नोटिस के बारे में डीएफओ साफ तौर से इनकार करते हैं. उनके मकानों पर पोकलेन चलाने वाले आरोप को भी निराधार बता रहे हैं. डीएफओ का कहना है कि तीन-चार गांवों में पोकलेन चला, लेकिन किसी भी आदिवासी के गांव या घर पर नहीं. हालांकि इस सम्बंध में और भी जानकारी देने से डीएफओ कतराते रहे और उन्होंने फोन काट दिया.

जानकारों की राय

वन कानून के जानकार और झारखंड जंगल बचाओ आन्दोलन के संस्थापक संजय बासु मलिक कहते हैं, वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत तीन पीढ़ी से रहते आ रहे लोगों को काफी अधिकार प्राप्त है. कोई पर्चा-रसीद धारक या जिनके पास कागजात नहीं भी है, वे भी जमीन पर दावा कर सकते हैं. इसके लिए कानून में प्रावधान है. इसके लिए ग्रामसभा और आसपास के लोगों को स्वीकृति देनी पड़ती है कि ये यहां तीन पीढ़ी से रहते आ रहे हैं.

वहीं, झारखंड वन अधिकार मंच संयोजक मंडली के सदस्य जॉर्ज मोनीपल्ली कहते हैं कि आदिवासी या गैरआदिवासी वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत वन में रहने वाला दावा कर सकता है, लेकिन उसे 13 दिसंबर 2005 से पहले तक जमीन पर किये गये कब्जे का सुबूत देना पड़ेगा. पर्चा, रसीद धाकर के लिए वन अधिकार अधिनियम 2006 की धारा 3(1,छ) में दावा करने का कानूनी प्रावधान है. जबकि बिना कागजात वालों के लिए धारा 3(1,क) के तहत ये प्रावधान है.

ग्रामीणों से बात नहीं कर रहे अधिकारी : सांसद

चतरा के सांसद सुनील कुमार सिंह ने इस सम्बंध में कहना है कि वन अधिकारी ग्रामीणों से बातचीत करने के बजाय उन्हें भयभीत करने का काम कर रहे हैं. वन अधिकारियों को जो काम करना चाहिए, वो नहीं करके रहे हैं, बल्कि किसानों और ग्रामीणों को भयभीत कर रहे हैं. दुर्भाग्य यह है कि प्रभावित लोगों की न ही आपत्ति दर्ज की जा रही हैं और न उनका पक्ष सुना जा रहा है. वे कहते हैं, “जमीन का कागजात चेक करना वन अधिकारी का काम नहीं है, बल्कि एलआरडीसी, सीओ और डीसी का काम है. वन अधिकारी की तरफ से जिला प्रशासन के साथ बिना समन्वय बनाये ही कागजात को फर्जी बताना अधिकारियों की मनमानी है. उन्होंने यह भी कहा कि वन अभ्यारण्य को इको जोन सेंसेटिव बनाने का जो जो ड्राफ्ट तैयार हुआ, उसके पहले पन्ने पर लिखा हुआ है कि प्रभावित ग्रामीणों के साथ बातचीत की जायेगी, जो नहीं की जा रही है.

पुनर्वास के प्रावधान पर अधिकारी मौन

आश्चर्य की बात यह है कि जिला भू-अर्जन पदाधिकारी (एलआरडीसी) अनवर हुसैन को इस बाबत बहुत ज्यादा जानकारी नहीं हैं. उन्होंने कहा, “कागजात को जांचने का काम तो भू-अर्जन पदाधिकारी का ही होता है, लेकिन गांव में अधिकतर लोगों ने फर्जी तरीके से कागजात बना रखा है.”  वे यह भी कहते हैं कि वन अधिकारी और पीड़ित दोनों को ही इसे लेकर जिला भू-अर्जन पदाधिकारी के कार्यालय में अपील करनी चाहिए. अनवर हुसैन बताते हैं कि बहुत से ग्रामीणों की रसीद फर्जी है. ये लोग अंचल स्तर के कर्मचारियों से सांठ-गांठ कर फर्जी ढंग से रसीद कटाते आये हैं. पुनर्वास के प्रश्न पर, एलआरडीसी कहते हैं कि वन भूमि पर अतिक्रमण कर रह रहे लोगों को हटाए जाने के बाद उनके पुनर्वास का कोई प्रावधान नहीं है. इस पूरे मामले पर चतरा के डीसी जीतेंद्र कुमार सिंह सिर्फ इतनी प्रतिक्रिया रही कि वे इस मामले को देख रहे हैं.

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