झारखंड के गर्म क्षेत्र में सेब फलना एक करिश्मा

9.10.2018

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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रॉबर्ट एक्का ने तीन वर्ष पहले सेब के लगभग एक दर्जन पौधे लगाए थे, जिनमें सात ही पेड़ बच पाये. जब इनमें से पांच पेड़ों में लगभग 20 फल लगे तो इसे देखकर रॉबर्ट की खुशी सातवें आसमान पर पहुंच गयी. इनका कहना है कि सब्जी की तरह ही अब सेब की भी खेती करेंगे और आने वाले दिनों इसकी खेती से झारखंड को एक अलग पहचान दिलाएंगे.
लेकिन बौंड़ी महतो के पेड़ों पर लदे सेब को देख वैज्ञानिक हैरत में है. क्योंकि रांची के नामकुम स्थित एसीएआर के वैज्ञानिकों के अनुसार बौंड़ी महतो के पेड़ में फलने वाला सेब लो चिलिंग वैराइटी का है और इस तरह के सेब ठंडे यानी कश्मीर, शिमला और उत्तराखंड जैसे इलाकों में होते हैं. इनका कहना है कि ये किसी करिश्मे से कम नहीं है.
बीज, गांछी, पेड़ और दस साल बाद फल
दस साल पहले बौंड़ी महतो ने अपनी बाड़ी में कई सारे सेब के बीज बोए थे. कुछ महीने बाद वहां पर सेब की गांछी निकल आई. उसे वहां से निकालकर खेत के किनारे लगा दिया. हालांकि इसमें आधे पौधे नष्ट हो गये, लेकिन जो बचे वे फल देने शुरू कर दिये. बौंडी कहते हैं कि इन पेड़ों में तीन साल से फल आ रहे हैं. पहले 10-12 की संख्या में आये और दूसरे साल 30 के लगभग, लेकिन इस बार 10 किलो के करीब सेब फले हैं.
उधर, बौंड़ी और रॉबर्ट के घर स्थानीय लोग बधाई देने भी पहुंच रहे हैं. हाल ही में बौंड़ी को झारखंड की एक क्षेत्रीय पार्टी के छात्र नेताओं ने सम्मानित भी किया है.
बौंड़ी महतो इस बारे में बताते हैं कि वे सधारणतः सब्जियों की खेती की तरह ही सेब के पौधों में भी खाद-पानी किया करते थे. बौंड़ी का घर रामगढ़ जिले के गोला थाने में है. वो एक पेशेवर किसान हैं और उनके पूरे परिवार की अाजीविका खेती पर ही निर्भर  है. वे कहते हैं, खेती से साल में लगभग तीन लाख रुपये की बचत होती है. सेब की खेती करने का विचार तो आता था, लेकिन यह एक सपने जैसा ही था. दो साल पहले जब पहली बार इस पेड़ में फल आएं तब उम्मीद जगी. इस वर्ष पेड़ में लगे फल को देख ऐसा लगता है कि मानो मेरे ख्वाब को पंख लग गये हों.
रॉबर्ट के भी प्रयास में कुछ इसी तरह की समानताएं देखने को मिलती हैं. हालांकि रांची के रॉबर्ट ने हाल में ही फुल टाइम खेती करनी शुरु की है. अपनी इस सफलता पर कहते हैं कि वे दो एकड़ में धान, गेहूं के अलावा कई तरह की सब्जी भी उगाते हैं और यही उनकी इनकम का सबसे बड़ा स्रोत है. उनके खेत में उपजने वाली सब्जियों में बैगन, आलू, नेनुआ, करैला, लौकी, फूल गोभी, पत्ता गोभी आदि शामिल हैं. 
रॉबर्ट के अनुसार सात साल पहले उन्होंने ड्राइवरी छोड़कर खेती करना शुरु की है. आगे कहते हैं, आज मेरे खेतों में उपजने वाली सब्जी रांची के स्थानीय बाजारों तक जाती हैं. इस साल सब्जी और दो ट्रैक्टर तरबूज बेचकर दो लाख रुपये तक की आमदनी हुई है. अब सेब की भी खेती इसी तर्ज पर करना चाहता हूं.
हालांकि रॉबर्ट को सरकार की तरफ से कोई सहायता तो नहीं मिल रही है, लेकिन वे रांची के नामकुम स्थित इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर में ट्रेनिंग लेने जाते हैं. खेती में रुचि और सफलता देख सेंटर से उन्हें खेत में छिड़काव करने वाली दो मशीनें दी हैं जबकि इस बाबत बौंड़ी महतो का कहना है कि उनके पुरखों के समय से खेती होती आ रही है. उन्हें भी सरकार की तरफ से कोई खास सहयोग नहीं मिला है.
बहरहाल, दोनों को उम्मीद है कि अगली बार से पेड़ में सेबों की संख्या और बढ़ेगी, जिससे झारखंड में सेब के उत्पादन की संभावना प्रबल होगी. 
हरिमन-99 है सेब की किस्म
हरिमन सेब की किस्म काफी विकिसत बताई जाती है. सेब की खेती अमूमन कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे ठंडे इलाकों में होती है, लेकिन हरिमन सेब के पौधे की खासियत है कि ये 40-45 डिग्री तापमान वाले इलाके में भी फल देते हैं और ये शिमला के किसान हरिमन शर्मा के एक सफल प्रयोग से ही संभव हो पाया. इन्होंने 1999 में एक बीज से सेब का पौधा तैयार किया. उसमें फल आया जिसका आकार, गुणवत्ता और स्वाद में पूरी तरह परम्परागत सेब की तरह ही निकला. इस सेब को एचआरएमएन-99 के नाम से जाना जाता है. इसके पौधे 2014-15 में राष्ट्रपति भवन में भी लगाए गए हैं. इसके अलावा कई राज्यों में हरिमन सेब के पौधे लगाये जा चुके हैं.
हालांकि झारखंड के बौंड़ी महतो कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि उनके खेत में फलने वाला सेब किस किस्म है. लेकिन रॉबर्ट के अनुसार उनके पेड़ का सेब एचआरएमएन-99 ही है. उन्होंने इस बारे में बताया कि उन्हें तीन साल पहले रांची के ही एक परिचित किसान ने शिमला से सेब के दर्जनों पौधे मंगवाकर दिए थे. साथ ही उन्होंने बताया था कि ये एचआरएमएन-99 किस्म का सेब, जो गर्म इलाकों में भी फल देता है.
नेतरहाट में है खेती की बड़ी संभावना
भारत और राज्य सरकार के द्वारा फल उत्पादन के लिए चलाई जा रही राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना है, जो किसान को फलों की खेती में सहयोग करती है. लेकिन झारखंड में इस योजना के तहत दी जाने वाली सहायता राशि में सेब के उत्पादन का कोई प्रावधान नहीं है. यानी सेब की खेती छोड़कर सभी फलों के लिए योजना का लाभ किसान ले सकते हैं. 
वहीं नामकुम स्थित इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ विकास दास झारखंड में सेब की खेती की संभावना पर कहते हैं कि पेड़ में फल आना और खेती करना अलग-अलग चीज है. लेकिन बौंड़ी महतो के पेड़ में सेब जिस तरह आए हैं, उसने झारखंड में सेब की खेती के संभावना को जगा दिया है.विकास दास आगे कहते हैं, “सेब की बहुत सारी किस्में है. इसकी खेती के लिए ठंड होनी चाहिए. सेब के पेड़ को जितनी चिलिंग यूनिट मिलेगी वो उतना ही उत्तम किस्म का होगा. सेब के उत्पादन में देखा जाता है कि पौधे को 7 डिग्री के नीचे हर घंटा कितना चिलिंग यूनिट तापमान मिलता है. पौधे में फूल आने से पहले उसके चिलिंग यूनिट को मापा जाता है. जितना चिंलिंग यूनिट मिलेगा सेब उतना मीठा और उन्नत किस्म का होगा. सेब की खेती का सबसे अच्छा तरीका है कि सेब की कलम या ग्राफ्टिंग तकनीक से इसके पौधे लगाये जायें. दो पौधों के बीच चार मीटर की दूरी हो. गर्मी के दिनों में इसकी देखरेख अच्छे से की जाए. 
डॉ दास बौंड़ी महतो के पेड़ में फले सेब को देखकर हैरत में है. उन्होंने इसे जांचने के बाद कहा किये सब भी लो चिलिंग वैराइटी है. हालांकि फल में लाली नहीं आ पायी, लेकिन पेड़ में केमिकल और कुछ अतिरिक्त काम करने पर लाली आ सकती है. तब जाकर उसे बाजारों में बेचा जा सकता है. हालांकि दास का मानना है कि झारखंड में सेब की अच्छी किस्म और बड़े पैमाने पर खेती की संभवाना नेतरहाट में हो सकती है. क्योंकि यहां का मौसम इसके लिए काफी अनुकूल है.