बेकार की दवाइयों का असर

2018-11-09

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए. खान

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बची हुई दवाइयां एक्सपायर्ड मत होने दें. अगर ये आपके मर्ज की दवा नहीं हैं, तो भी उन्हें फेंके नहीं. दवा दुआ के साथ लग जाये तो जान बच जाएगी. इसलिए दवाइयां डोनेट करें.

शुरूआत की ये दो लाइनें हैं, जिसे अभियान की तरह विद्दार्थियों का एक समूह रांची के कॉलेज और स्कूलों में छात्रों के बीच पढ़कर सुनाता है. संत जेवियर्स कॉलेज के 40 छात्रों के इस समूह का नाम है ‘मेडिसिन बैंक’ और मुहिम ‘बची हुई दवाइयां बचाएं’ और मकसद, इस अभियान के तहत घरों से ऐसी दवाइयों को इकट्ठा कर वैसे असहाय मरीजों तक पहुंचाना, जो पर्याप्त पैसा नहीं हो पाने के कारण दवाइयां नहीं खरीद पाते हैं.

इस मुहिम को लेकर छात्रों का तर्क है, अधिकतर घरों में इलाज के बाद दवाइयां बच जाती हैं. बची हुई दवाई किसी गरीब की जान और पैसा दोनों ही बचा सकती है. आज लोगों के लिए महंगी दवाइयां एक बड़ी परेशानी है. बहुत से लोगों की मौत दवाइयों की वजह से हो जाती है.

ऐसे जुटाते हैं दवाइयां

अभियान के को-ऑर्डिनेटर और संत जेविर्यस बी-कॉम पार्ट वन के स्टूडेंट्स अशबाह जावेद बताते हैं, अभियान की शुरुआत जनवरी में हुई थी, लेकिन काम अप्रैल से आरंभ हुआ. इसका संचालन कॉलेज का रोट्रैक्ट क्लब करता है और अभियान टीम में सभी छात्र क्लब के सदस्य ही हैं.

उधर, विद्यार्थियों की मदद कर रहे हैं प्रकाश टेकरीवाल संत जेविर्यस कॉलेज के पास लेडीज एंड किड्स कॉर्नर की दुकान चलाते हैं और वे इस अभियान को स्पॉन्सर भी कर रहे हैं. ये नेक प्रयास भी उन्हीं का आइडिया है. प्रकाश बताते हैं कि दिल्ली के 80 साल के एक बुजुर्ग ओंकारनाथ शर्मा की कहानी अखबारों में पढ़ी, जो घर- घर जाकर बची हुई दवाइयां संग्रहीत करते हैं और दवाई को गरीबों को निःशुल्क उपलब्ध कराते हैं. इन्हीं से मिली प्ररेणा को संत जेविर्यस कॉलेज के फादर से साझा किया. इसके बाद ही संत जेवियर्स में इस आनोखी पहल की शुरुआत हुई.

छात्रों के समूह ने दवा जुटाने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में मेडिसिन बैंक के नाम से डोनेट बॉक्स लगा रखा है. फिलहाल रांची के 15 कॉलेज-स्कूल में मेडिसिन बैंक का दवाई डोनेट बॉक्स लगा हुआ है. इसमें बच्चे, अभिभावक, शिक्षक आदि अपने-अपने घरों में बची हुई या बेकार पड़ी दवाइयां लाकर डाल देते हैं. कुछ दिनों के अंतराल पर बॉक्स से दवा निकाल ली जाती है. इसके बाद दवाओं को रांची के चैरिटेबल अस्पताल में पहुंचाया जाता है, जहां गरीब मरीजों को मुफ्त दवाइयां मुहैया कराई जाती है.

अगस्त में 28 किलो तक इकट्ठी हुईं दवाइयां

अशबाह जावेद ने कहा, फादर और कॉलेज प्रबंधन ने इस काम का जिम्मा रोट्रैक्ट क्लब के सदस्यों को सौंपा. इस मुहिम की शुरुआत संत जेविर्यस कॉलेज से ही हुई. परिसार में स्टॉल लगाकर इसका खूब प्रचार-प्रसार किया गया. कॉलेज के हर विभाग के विद्यार्थियों ने दवाइयां लाकर दी. इस तरह पहले महीने में आठ किलो दवा इकट्ठा हुई. इसके बाद अन्य स्कूलों और कॉलेजों में अभियान को तेज किया गया. दूसरे महीने 25 किलो दवाइयां जमा हुई. और इस वर्ष के अगस्त में रांची से 28 किलो दवाइयां जमा हुई.

इधर, कॉलेज के डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर, प्रोफेसर और अन्य छात्रों से भी इस ग्रुप को काफी मदद मिलती है. दवाई बॉक्स में ज्यादातर लोग सर्दी-जुकाम, बुखार, बीपी, डायबिटीज आदि की दवाइयां डोनेट करते हैं. दवाई सही है और एक्सपायर्ड नहीं हो इसका पूरा ख्याल रखा जाता है.

‘बची हुई दवाइयां बचाएं’ अभियान को स्कूल और कॉलेजों से मिल रहे समर्थन के बाद इसे कोचिंग इंस्टीट्यूट और डोर टू डोर चलाने की योजना बनाई गई है. अभियान से जुड़े एक अन्य स्टूडेंट्स का कहना है कि अब कई घरों से कॉल आ रहे हैं. वे लोग दवा डोनेट करना चाहते हैं. इसलिए इस मुहिम को और तेज करना है. मुहिम को घर-घर तक ले जाएंगे.

छात्रों का प्रयास प्रेरणादायक

कॉलेज के डीन ऑफ स्टूडेंट् वेलफेयर, मार्कस बारला का कहना है कि बची हुई दवाइयों को इकट्ठा कर गरीबों तक पहुंचाना, संत जेवियर्स के छात्रों की एक अनोखी पहल है. पूरा कॉलेज स्टाफ छात्रों के इस नेक काम के साथ है. छात्रों का यह प्रयास समाज के लिए प्रेरणादायक है.