हक की गुहार भी बेकार

2018-11-09

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए. खान

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“मुख्यमंत्री साहब गांव आए थे, यहां सम्मेलन करके चले गये, लेकिन उनके स्वागत में हमने जो पसीना बहाया, उसका बकाया अब तक नहीं मिल पाया.”  राजेंद्र परहिया पिछले छह महीने से बीडीओ और मुखिया के कार्यलय का चक्कर लगाते-लगाते थक गये और अब आते-जाते सभी लोगों को यही बात बताते हैं.
दरअसल,  दस मार्च 2018 को लातेहार जिला के बेतला पंचायत में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने वहां आयोजित भाजपा के पंचायत स्तरीय प्रमंडल कार्यकर्ता सम्मेलन में भाग लिया था. उनके स्वागत के लिए बेतला मैदान की साफ-सफाई करायी गयी थी, जिसमें परहिया आदिम जनजाति के मजदूरों ने काम किया था. इस मैदान को साफ करने में 24 मजदूर तीन-चार दिन तक लगे रहे, लेकिन छह माह बीत जाने के बाद भी उन्हें उनकी मजदूरी नहीं मिल पाई है. अब इन मजदूरों ने अपनी मजदूरी मांगने के लिए सीएम के पास जाने का मन बना लिया है.
राजेंद्र परहिया  पेशेवर एक मजदूर हैं और वे भी उन मजदूरों में शामिल जिन्हें भुगतान नहीं हुआ है. वह बताते हैं, “गांव में मुख्यमंत्री के आने से एक हफ्ता पहले मुखिया जी बीडीओ की गाड़ी से हमारे घर आये थे. उन्होंने कहा था कि मैदान साफ करना है. मजदूर दो, प्रति दिन दो सौ रुपया मजदूरी देंगे. मैंने सोलह महिला और आठ पुरुष मजदूरों को सफाई में लगा दिया. पहले दिन का काम खत्म होने पर जब मजदूरी मांगी तो उन्होंने कहा कि अभी बहुत व्यस्त हैं, पहले पूरा काम कर लो. एक बार ही पैसा दे देंगे, पर रोज तुम लोग पंचायत सेवक के पास हाजरी बना देना. अब मजदूरी मांगने के लिए जाते हैं तो कभी बीडीओ साहब के पास भेजा जाता है तो कभी बीडीओ साहब मुखिया जी के पास भेजते हैं.”
योजना से भी वंचित
आदिम जनजाति के विकास के लिए सूबे के मुखिया रघुवर दास की सक्रियता के बावजूद इनके हालात नहीं बदले हैं. सरकार ने जुलाई 2016 में राज्य के प्रीमीटिव ट्राईब ग्रुप (पीटीजी) के लिए रोजगार और शिक्षा में दो प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दी थी. 2017 में डाकिया स्कीम शुरू की गयी, जिसके तहत हर पीटीजी घर तक 35 किलो चावल मुफ्त पहुंचाना है. लेकिन पहले से अपनी बदहाली का रोना रो रहे बेतला के ये लोग फिलहाल कई महीने से अपनी मजदूरी के भुगतान के लिए भटक रहे हैं.
बेतला पंचायत से सटा बहरिया टोला में करीब तीस घर आदिम जनजाति हैं, पर एक भी घर पक्का नहीं है. हालांकि राजेंद्र परहिया कहते हैं कि इसी साल प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सात घरों के नाम का चयन हुआ है. यह टोला और यहां रहने वाला परिवार सरकार की उस योजना से भी वंचित है, जिसमें हर घर जाकर 35 किलो चावल मुफ्त मुहैया कराने की बात कही गयी है.
झारखंड में 32 जनजातियों में आठ पीटीजी हैं जिसे आदिम जनजाति कहा जाता है. इनमें परहिया, कोरवा, असुर, बिरहोर, साबर, बिरजिया, मल पहरिया और सौरिया परहिया शामिल हैं. 2011 के जनगणना के अनुसार, राज्य में इनकी आबादी में 2.23 थी. एक्टिविस्ट धीरज कुमार कहते हैं, “राज्य की आदिम जनजातियां धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है. इसकी वजह इनका का हर लिहाज से पिछड़ना है. राज्य की साक्षरता दर 54 प्रतिशत और इनका 16.87 है. प्रति माह इनका इनकम 500-1000 रुपया तक ही हो पाता है. जीवन का जरिया मजदूरी है जो महीने में मात्र 10-15 काम ही मिल पाता है.
जीने का सहारा मजदूरी
चालीस साल की जगमुनिया देवी भी उन महिला मजदूर में शामिल जिन्होंने चार दिन तक मैदान की साफ-सफाई की. अपने गुस्से को गंवई अंदाज में बयां करती हुई कहती हैं, “हमरा से गड्ढा भरवैलो, झाड़ी साफ करवैलो. गोबर से मैदान लिपवैलो और खूंटा गड़वैलो. मगर मजदूरी कहकर नई देलो. हमनी गरीब के मजदूरी से ही जिये खाईलो हई.”
जगमुनिया के मुताबिक उनकी चार दिन की मजदूरी आठ सौ रुपये होती है, जो उनके लिए बड़ी रकम है. इनके परिवार में पति के अलावा एक बेटा है जो उन्हीं की तरह मजदूरी करता है.
टोला के चबूतरे से दस कदम की दूरी पर एतवरिया देवी का दो कमरे का घर है. घर की कच्ची दीवारों की दरारों से परिवार की दयनीय स्थिति को समझा जा सकता है. एतवरिया देवी की भी शिकायत औरों की तरह ही है, पर परेशानी थोड़ी ज्यादा है. यह कहती हैं, “गांव में मुख्यमंत्री जी पहली बार आये थे. लगा कि हमलोगों के लिए कुछ करेंगे. उल्टा उनके स्वागत के लिए जो हमलोगों से काम करवाया गया उसकी मजदूरी तक नहीं दी गई.”
पति के निधन के बाद एतवरिया देवी के दोनों बच्चों ने हाथों में किताब की जगह कुदाल उठा लिया है. करम (15) और धरम (12) मां की तरह ही गांव-गांव में मजदूरी करता है.
एक-दूसरे पर टाली जिम्मेदारी
मजदूरी का भुगतान नहीं किए जाने के प्रश्न पर पदाधिकारी और प्रतिनिधि दोनों ही अपनी-अपनी जिम्मेदारी एक दूसरे पर टाल देते हैं.
बेतला पंचायत के मुखिया संजय  सिंह चेरो से जब जानना चाहा कि मजदूरी का भुगतान क्यों नहीं हो पाया? तब जवाब में उन्होंने कहा, मैंने बीडीओ के आदेश पर हेलीकॉप्टर का हेलीपैड बनवाने और मैदान की सफाई के लिए मजदूर को लगाया था. बीडीओ ने भुगतान नहीं किया तब कई मजदूरों को मैंने अपने पास से एक दिन की मजदूरी भी दी, लेकिन और मजदूरी मैं कहां से दूं.
मुखिया ने ये भी कहा कि बीडीओ से उनकी बात हुई है. जल्द ही उन मजदूरों का भुगतान हो जाएगा. मगर मजदूरी का भुगतान किस मद से किया जाना था, ये उन्हें नहीं पता है.
इसी टोले के उमेश करीब पंद्रह किलोमीटर दूर बरवाडीह प्रखंड के बीडीओ कार्यलय अपनी मजदूरी मांगने गये थे, मगर उन्हें बैरंग ही लौटना पड़ा. इनका कहना है, “हमलोगों को मुखिया जी ने सफाई के काम पर लगाया था. इसलिए पहली मर्तबा उन्हीं के पास गये थे मजदूरी का पैसा मांगने, मगर उन्होंने बहलावा दे दिया और कहा कि बीडीओ साहब के पास जाओ वो देंगे. और जब बीडीओ साहब के पास पहुंचे तो इन्होंने कहा कि मुखिया जी देंगे. दोनों साहबों ने परेशान कर दिया है. मुख्यमंत्री जी का जहां पर हेलीकॉफ्टर रुका था, उस गड्ढे को भरकर हमने हेलीपैड बनाया था. एक तो महीने में दस दिन ही काम मिल पाता है, अब उसका पैसा भी नहीं मिलेगा तो क्या खाएंगे.”
तीस साल के उमेश तीन दिन तक मैदान की सफाई में लगे रहे. परिवार में इनकी पत्नी के अलावा बूढ़े मां-बाप हैं और जीविका मजदूरी ही है.
सीएम से भी लगाएंगे गुहार
मजदूरी विवाद पर बरवाडीह के बीडीओ दिनेश कुमार कहते हैं कि मजदूरों को भुगतान मुखिया को करना है. मजदूर हमारे पास भी आये थे, हमने उनसे भी यही बात कही. पंचायत में जो वर्क होता उसे मुखिया और पंचायत सेवक से ही करवाया जाता, जिसका भुगतान 14वें वित्त आयोग से होता है.
ये सभी नरेगा मजदूर हैं, जिनसे सीएम के स्वागत के लिए ग्राउंड से लेकर बेतला के टूरिस्ट प्लाजा तक की सफाई तो करवा ली गई, लेकिन भुगतान के लिए छह महीने से चक्कर लगवाए जा रहे हैं.
15 सितंबर को रामपतन परहिया, बिगनी देवी, विनोद परहिया, बालमुनी देवी, चैतू परहिया, राजो देवी, रनिया देवी, पारवती देवी, करमी देवी सरजू परहिया समेत सभी 24 मजदूरों ने संयुक्त रुप से मजदूरी नहीं दिए जाने के संदर्भ में बीडीओ को लीखित शिकायत की है. राजेंद्र परहिया कहते हैं कि फिर भी मजदूरी नहीं मिली तो वे सभी मुख्यमंत्री के पास जाएंगे.