जिन्दगी से हार नहीं मानेंगे

2018-11-09

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-रूपेश साहु

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जिंदगी को हर दिन आखरी मान लो, और काम टारगेट करके करो.’ जिंदगी को इन्हीं दो जुमलों पर रांची की विनीता तिवारी जी रही हैं. वो भी पूरे दृढ़ संकल्प के साथ. ये जानते हुए भी कि उन्हें कैंसर है. विनीता तिवारी का छह महीने के अंतराल दो बार कैंसर का ऑपरेशन हो चुका है. पेशे से एक  शिक्षिका वीनिता की जीवटता कैंसर के मरीजों के लिए प्रेरणादायक है. इनकी रोजमर्रा की जिंदगी की कहनी उन सैकड़ों कैंसर के मरीजों के लिए प्रेरणा है, जो इस बीमारी का नाम सुनते ही हार मान जाते हैं.
इधर, रांची से ढाई सौ किलोमीटर दूर कृष्णा दत्ता महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में लगी हुई है. लेकिन इन दिनों इनकी सुर्खियों की वजह किन्नरों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास है. इन दोनों की प्रेरणादायक कहानी इस प्रकार है.
पॉजिटिविटी ही ताकत
वीनिता तिवारी के पति जलज एक बिजनेसमैन हैं. नामकुम स्थित इनके परिवार में दो बच्चे हैं. बेटी जालंधर के एक कॉलेज से एग्रीकल्चर में बीएससी कर रही है और बेटा प्लस टू में है. विनीता पिछले 26 साल स्कूल में पढ़ाती आ रही हैं. फिलहाल रांची के कांके स्थित इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल में वाइस प्रिंसिपल हैं. वो बताती हैं कि उन्होंने अपनी बीमारी का ख्याल कभी भी जेहन में नहीं आने दिया. उनकी इस बात की पुष्टि तब और होती दिखती है, जब दोनों बार ऑपरेशन के एक हफ्ते बाद उन्होंने स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया.
विनीता को इसी साल फरवरी में ब्रेस्ट कैंसर डिटेक्ट हुआ था. डॉक्टर ने बताया कि बीमारी सेकंड स्टेज में है. इसके बाद मार्च में कोलकत्ता के टाटा मेडिकल सेंटर में उनका ऑपरेशन हुआ. लेकिन छह माह में ही कैंसर का सेल रि-अकर कर गया. वो बताती हैं, 25 सितंबर को केमो के दौरान पता चला कि कैंसर रि-अकर कर गया है. इस बार उन्होंने रांची के प्रगाति अस्पताल में इसका ऑपरेशन कराया.
इतने के बावजूद विनीता की रोजमर्रा लाइफ एक एथलीट की तरह ही है. हर रोज सुबह उठकर मॉर्निंग वाकिंग करना, फिर घर का काम करके स्कूल के लिए निकल जाना. ये सब बीमारी के बाद भी यथावत है.
परिवार वाले आराम करने को नहीं कहते हैं, चूंकि आप मरीज हैं? के प्रश्न पर विनीता कहती हैं, “बहुत. मेरी बेटी ने अपनी पढ़ाई तक छोड़ने का फैसला ले लिया था, ताकि वो घर पर रहकर मेरी देखभाल करे. लेकिन मेरा मानना है कि आप इस बीमारी में अपने अंदर जितना पॉजिटिविटी और मूवमेंट लाएंगे, आपके लिए उतना ही बेहतर होगा. बल्कि डॉक्टर ने भी यही मशवरा दिया है. मेरा दो परिवार है. एक घर और दूसरा स्कूल. और इन दोनों का साथ मेरे साथ है.
किन्नरों की मां
कृष्णा दत्ता का कहना है कि समाज तभी बदलेगा जब लोगों की मानसिकता बदलेगी. कृष्णा महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के साथ-साथ किन्नरों के अधिकार और थर्ड जेंडर वाले फर्क को मिटाने लिए भी जंग लड़ रही हैं. उम्र के इस पड़ाव में भी पूरे जोश और जुनून के साथ किन्नरों को मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं. शुरू से ही औरों के लिए कुछ करने का हौसला तो इनके अंदर था ही. इन्होंने जमशेदपुर में (2015) झारखंड महिला उद्ममी मंच का गठन किया. इसके  माध्यम से महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का काम शुरू किया. उन्हें टिस्को में ट्रेनिंग देने का अवसर भी मिला. इसी सिलसिले में उनकी मुलाकात किन्नरों से हुई. वो कहती हैं कि तब जाना कि किन्नरों को कदर की समस्याओं से जूझना पड़ता है. इसके बाद कृष्णा किन्नरों को खुद कढ़ाई, बुनाई की ट्रेनिंग देनी शुरू की. कुकिंग के टिप्स दिएं. टिस्को के मदद से उन्हें स्टॉल मुहैया कराया. इसको लेकर कैंपने चालाया. इनके कार्य के लिए पूरे भारत से किन्नरों ने उन्हें सम्मानित किया. कृष्णा अबतक करीब एक सौ महिलाओं और एक दर्जन किन्नरों हुनरमंद कर चुकी हैं.