जिन्दगी बढ़कर छीनी जाती है

2018-11-09

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए. खान

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भंवर से लड़ो, तेज लहरों से उलझो,
कहां तक चलोगे किनारे किनारे..
रजा हमदानी की इस पंक्ति को मानो अनुरंजन समद ने अपना ध्येय वाक्य बना लिए है. अनुरंजन कोरवा आदिम जनजाति समुदाय से आते हैं. लेकिन उन्होंने अपने समुदाय का मुख्य पेशा जंगलों में शिकार और रस्सी बनाने को अपनाने के बजाय एक शिक्षित इनसान बनकर अपने परिवार की तकदीर बदलने को ज्यादा मुनासिब समझा. सरकार की सारी घोषणाएं इनकी जरूरतों के आगे फेल हो गयीं. हर प्रकार की छात्रवृत्ति के लिए इन्होंने आवेदन दिये, लेकिन पैसा कहीं से नहीं मिला. सरकारी दफ्तर से निराशा मिलने के बाद भी हार नहीं मानी. पहले कुली का काम करके स्नातक किया, अब मोटरसाइकिल के वर्कशॉप में मजदूरी कर पीजी कर रहे हैं.
कभी सेकेंड नहीं, फर्स्ट रहे
अनुरंजन समद ने अपना स्नातक रांची के श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से हिंदी में पूरा किया. और यहीं से पीजी भी कर रहे हैं. गढ़वा जिले के भंडारिया के गांव में रहने वाले अनुरंजन के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है. थोड़ी-बहुत खेती होती है, जिससे परिवार का गुजर-बसर होता है. वे बताते हैं कि मैट्रिक से लेकर स्नातक तक की हर परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी से पास की है. मैट्रिक तक की पढ़ाई संत पॉल हाईस्कूल से और इंटर संत जॉन इंटर कॉलेज से किया है. फिलहाल अपने छोटे भाई अभिषेक समद की पढ़ाई का भार भी अनुरंजन के ही कंधे पर है. अभिषेक का भाई रांची संत पॉल से बारहवीं की पढ़ाई कर रहा है और दोनों ही रांची के सिरम टोली में रहते हैं. अनुरंजन की कमाई काफी कम है. वे बताते हैं कि वर्कशॉप से महीने के सात हजार ही जुट पाते हैं. इसी में रूम का तीन हजार किराया, खाना-पीना और भाई के साथ अपनी पढ़ाई का खर्च भी उठाना पड़ता है. दोनों का लक्ष्य बड़ा है, और आर्थिक तंगी इससे भी बड़ी. सुविधाओं से वंचित अब इन दोनों की उम्मीदें सरकार से हैं. 
सिविल सर्विस में जाने की इच्छा
अनुरंजन बताते हैं कि वह प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होना चाहते हैं. एक सरकारी मुलाजिम बनना चाहते हैं, लेकिन पैसे कहां से लाएं. अगर सिर्फ पढ़ेंगे तो पैसे कहां से लाएंगे और खाएंगे क्या. सिविल सार्विस में जाने की इच्छा है. अगर सरकार की तरफ से पढ़ाई के लिए कुछ मदद हो जाए तो संभव भी है, अन्यथा मुश्किल लगता है. अनुरंजन ने विश्वविद्यालय में हर प्रकार की फीस माफी के लिए आवेदन दिये हैं और उन्हें इसके स्वीकार हो जाने उम्मीद भी है. 
क्या है योजना
झारखंड में 32 जनजातियों में आठ पीटीजी हैं जिसे आदिम जनजाति कहा जाता है. इनमें परहिया, कोरवा, असुर, बिरहोर, साबर, बिरजिया, मल पहरिया और सौरिया परहिया शामिल हैं. 2011 के जनगणना के अनुसार राज्य में इनकी आबादी में 2.23 थी. बताया जाता है कि राज्य की आदिम जनजातियां तेजी से विलुप्त हो रही है. इसकी वजह इनका का हर लिहाज़ से पिछड़ना है. राज्य की साक्षरता दर 54 प्रतिशत और इनकी 16.87 है. प्रति माह इनकी इनकम 500-1000 रुपया तक ही हो पाती है. जीवन का जरिया मजदूरी है. सरकार की दर्जनों योजनाएं तो हैं, लेकिन इन तक पहुंच नहीं पाती हैं. सरकार ने जुलाई 2016 में राज्य केप्रीमीटिव ट्राईब ग्रुप (पीटीजी) के लिए रोजगार और शिक्षा में दो प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया है. 2017 में डाकिया स्कीम योजना शुरू की गई है, जिसके तहत हर पीटीजी घर तक 35 किलो चावल मुफ्त पहुंचाना है. ऐसी ही दर्जनों योजनाएं चलायी जा रही हैं,  लेकिन इन तक पहुंच नहीं पाती हैं. अब यह योजनाएं जमीनी स्तर पर कितनी चरितार्थ हो रही हैं, अनुरंजन उसके  उदाहरण हैं. हालांकि विश्वविद्यालय में आदिम जनजाति के विद्यार्थियों से किसी प्रकार का शुल्क नहीं लेने का प्रावधान है.