बछड़ा और मालिक के बीच होता है दूध का एग्रीमेंट!

2018-11-09

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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जहां मानव हर समझौते को तोड़ने का रिकार्ड बना रहा है, वहीं एक पशु आज भी अपने समझौते को निभा रहा है। विशुद्ध देसी नस्ल की गिर गायें और उनके बछड़े अपने मालिक के साथ हुए समझौते को शत-प्रतिशत निभाते हैं। गिर गायें प्राकृतिक रचनाधर्मिता और संवेदनशीलता की मिसाल हैं। ये गायें लड़ाई-झगड़े से कोसों दूर रहती हैं। मानव के करीब स्पर्श थेरेपी के लिए आती हैं और जब मानव उन्हें देखकर मुंह फेर लेता है या फिर कार्य-व्यस्तता के कारण उनकी ओर ध्यान नहीं दे पाता अथवा पास आने पर उन्हें सहलाता नहीं हैं, तब ये गायें रूठ जाती हैं। ये ऐसी रूठती हैं कि फिर उस व्यक्ति के करीब तब तक नहीं आतीं, जब तक वह व्यक्ति स्वयं उनके करीब जाकर उन्हें प्यार से सहलाता नहीं है। शायद इसी संवेदनशीलता, सचाई और प्यार के कारण गिर गाय के दूध और मूत्र में सोने के अंश पाये जाते हैं। 
राजधानी रांची के ललगुटवा में गिर गायें पालने वाले कुशहवज नाथ शाहदेव ने बताते हैं कि इन गायों के बछड़े और मालिक के बीच एक समझौता होता है। बछड़े पीछे वाले दोनों आंचल (बालियां) से दूध पीते हैं और हमलोग आगे वाले दोनों आंचल से दूध निकालते हैं। न गायों को बांध कर रखा जाता है और न ही बछड़ों को बांधा जाता है। फिर भी बछड़े जब भी दूध पीते हैं, मात्र पीछे वाले आंचल से ही पीते हैं। शाहदेव ने बताया कि अलग-अलग वंश की गिर गायों में अंतर होता है। कुछ गायों के बछड़े आगे वाले आंचल से दूध पीते हैं और पशुपालक वहां पीछे वाले आंचल से दूध निकालता है। यह समझौता दोनों में से कोई नहीं तोड़ता। 
शाहदेव ने बताया कि इन गायों पर दवा के नाम पर कोई खर्च नहीं होता। या तो ये गायें बीमार ही नहीं होतीं अथवा यदि बीमार होती हैं, तो अपना इलाज स्वयं कर लेती हैं। हां! इनको कभी-कभी नीम की पत्तियों की जरूरत पड़ती है। जब भी ये नीम की पत्तियां खाना चाहती हैं, तब बांस के करीब आकर उसे हिलाती हैं। उससे ये इशारा करती हैं और इन्हें नीम की पत्तियां दे दी जाती हैं। उन्होंने कहा कि इन गायों की ब्रीडिंग के लिए वंशावली का ध्यान रखा जाता है। अपने वंश में ब्रीडिंग कराने से न सिर्फ इनके बछड़े प्रभावित होते हैं, बल्कि दूध की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। इसके लिए 21 पीढ़ियों की वंशावली बना कर रखी जाती है। इन गायों को बांध कर नहीं रखा जाता है। बांध कर रखने से इनकी दूध की क्षमता काफी कम हो जाती है। ये स्वतंत्र रूप से विचरण करती हैं, तब दूध देने की क्षमता में वृद्धि होती है।
शिव की भांति कंठ में विष धारण की क्षमता
जिस प्रकार भगवान शिव ने एक बार हलाहल विष को कंठ में धारण कर विश्व की रक्षा की थी, ऐसी ही कुछ क्षमता गिर तथा अन्य देसी नस्ल की गायों में होती है। यदि कभी कोई विषैला अथवा कोई हानिकारक पदार्थ ये गायें खा लेती हैं तो उसके असर को वो गले में ही रोक लेती हैं। इससे उसका विषैला प्रभाव उनके मल-मूत्र तथा दूध में नहीं आ पाता।