ब्लैक बंगाल भर रही जनजातीय महिलाओं के जीवन में उजाला

2018-11-09

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-प्रमोद जायसवाल

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झारखंड में बकरी पालन का व्यवसाय बड़े पैमाने पर तो होता ही है। वर्तमान में ब्लैक बंगाल नामक बकरी पालन का चलन भी चल निकला है। इसके पीछे का कारण है कि यह बकरी दूसरी अन्य बकरियों की तरह दूध और मांस के काम आती है। लेकिन दूध की मात्रा और मांस की मात्रा के कारण व्यावसायिक दृष्टि से काफी लाभदायक सिद्ध हो रही है। झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी झारखंड में बकरी पालक किसानों की मदद कर रहा है तथा उन्हें बकरी पालन के सही तरीकों से भी अवगत करा रहा  है। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां की जलवायु ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियां के लिए पूरी तरह उपयुक्त है। 
लागत कम, लाभ ज्यादा 
बकरी पालन कम लागत और सामान्य देखरेख वाला व्यवसाय है। यही कारण है कि तेजी से गरीब किसानों और खेतिहर मजदूरों की आय का एक अच्छा साधन बन रहा है। झारखंड ही नहीं दूसरे राज्यों में बकरियां एटीएम के रूप में परिभाषित किया जाता है। कारण है, जब किसानों को पैसों की आवश्यकता हुई, बकरी अथवा बकरी के बच्चों को बेच कर पैसों की अपनी जरूरत पूरी कर ली। देश में 75 प्रतिशत किसानों के पास काफी कम जमीन है, ऐसे किसान बकरी पालन करते हैं। सरकार, जो इस समय पशुपालन पर विशेष ध्यान दे रही है, अगर अपना थोड़ा ध्यान बकरी पालन करने वाले किसानों पर दे दे तो निश्चित ही इनकी आय में बढ़ोत्तरी हो जायेगी।
भारत में पशुओं की आबादी बड़ी संख्या में है। इसका लाभ उठाकर ग्रामीणों की गरीबी दूर की जा सकती है. इसी में शामिल है बकरी पालन। देश में करायी गयी उन्नीसवीं पशुगणना के अनुसार भारत में बकरियों की कुल संख्या 135.17 मिलियन है, उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या 42 लाख 42 हजार 904 है। एनडीडीबी 2016 के आंकड़ों के मुताबिक प्रतिवर्ष 5 मीट्रिक टन बकरी का दूध उत्पादन होता है, जिसका अधिकांश हिस्सा गरीब किसानों के पास है। भले ही ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान बकरी पालन व्यवसाय से जुड़े हैं, लेकिन उनमें अभी जागरुकता की कमी है। हमारे देश में बकरी की काफ़ी अच्छी नस्ले हैं जैसे जमुनापारी, बरबरी, ब्लैक बंगाल है और भी कई। लेकिन समस्या यह है कि ग्रामीण  जो बकरी पालते हैं वो अच्छी नस्ल की नहीं होती और न ही वे बकरे की अच्छी नस्ल से प्रजनन कराते हैं। 
बकरी पालन के लिए प्रशिक्षण
ग्रामीण इन बकरियों का पालन सही तरीके से हो सके और इसके लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के पशुचिकित्सा संकाय के प्रशिक्षण सत्र का भी आयोजन किया गया। प्रशिक्षण के बाद सभी प्रतिभागी बकरी पालक महिलाओं को सर्टिफिकेट और बकरियों को लगाने के लिए वैक्सीन का टीका दिया गया। विश्वविद्यालय के डॉ सुशील प्रसाद भी यह मानते हैं कि बकरी पालन झारखंड की बहुतायत ग्रामीण आबादी के लिए अतिरिक्त आय का प्रमुख साधन बन रहा है। स्थानीय बकरी प्रजाति के स्थान पर उन्नत नस्ल की ब्लैक बंगाल बकरी पालन को उन्होंने प्राथमिकता दी। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में बकरीपालन से जुड़ी जनजातीय महिलाओं को ब्लैक बंगाल बकरी नस्ल की विभिन्न आवश्यकताओं, ध्यान देने योग्य तकनीक, आहार, आवास, बीमारी और रोग, टीकाकरण एवं स्वच्छता के बारे में बताया गया। रांची जिले के चान्हो प्रखंड, चोरेया, हर्रा और गुटवा गांव में ब्लैक बंगाल बकरी का पालन कर रहीं  50 जनजातीय महिलाओं ने भाग लिया। 
उन्नत प्रभेद
दरअसल, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पशु उत्पादन एवं शोध संस्थान के वैज्ञानिकों के द्वारा बकरी की इस उत्तम संकर नस्ल को विकसित किया गया है। वर्तमान में झारखंड ही नहीं, पड़ोसी राज्य बिहार के ज्यादातर ग्रामीण किसान ब्लैक बंगाल नामक बकरी का पालन कर रहे हैं। ब्लैक बंगाल वर्ष में दो बार बच्चे देती है। सामान्य बकरी का वयस्क होने पर वजन 25 से 30 किलोग्राम वजन होता है। वहीं अफ्रीका में पाए जाने वाले बोर नस्ल का वजन वयस्क होने पर 70 से 80 किलो होता है। इस दोनों जाति को क्रॉस कराने से अब ब्लैक बंगाल का वजन 40 से 45 किलो से अधिक होता है। ब्लैक बंगाल में बीमारी से लड़ने की क्षमता अधिक पाई जाती है। साथ-साथ इसके मांस की गुणवत्ता भी अधिक होती है। यह स्वादिष्ट भी होती है, इसी कारण विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ब्लैक बंगाल से ही इस अफ्रीका के प्रचलित प्रजाति से क्रॉस कराकर नए शंकर नस्ल विकसित की है । अफ्रीका से बोर जाति के नस्ल का सीमन मंगाकर उसपर पूसा में ही यह अनुसंधान किया गया था।