रिम्स में तीन कमरों में 20 वर्षों से पड़े हैं हजारों विसरे

2018-11-09

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-वरुण सिन्हा

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झारखंड के प्रमुख चिकित्सा संस्थान, रिम्स के फॉरेंसिक मेडिसिन विभाग में विगत 20 वर्षों से हजारों की संख्या में शवों के अंत्यपरीक्षण के बाद जांच की आस में सुरक्षित किये गये विसरे (भीतरी मानव अंग) पड़े हैं। सभी विसरा विभाग के तीन कमरों में भरे पड़े हैं। सुरक्षित विसरे पूरी तरह खराब हो चुके हैं। अब उसकी जांच भी नहीं की जा सकती। रिम्स के फारेंसिक मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. तुलसी महतो ने बताया कि इस संबंध में कई बार गृह विभाग को पत्र लिखकर जानकारी दी गयी है। साथ ही खराब हो चुके विसरों को नष्ट करने के संबंध में दिशा-निर्देश भी मांगा गया है, लेकिन विभाग से कोई स्पष्ट आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। इसके कारण हजारों की संख्या में विसरे पड़े हुए हैं। डॉ. महतो ने बताया कि शवों के अंत्यपरीक्षण के बाद संबंधित थाने की पुलिस जांच पदाधिकारी को रिपोर्ट देने के समय ही उन्हें लिखित जानकारी दी जाती है कि तीन माह के अंदर अगर आवश्यक समझते हैं तो सुरक्षित विसरे जांच के लिए ले जा सकते हैं। कई मामलों में तो पुलिस जांच पदाधिकारी विसरा जांच के लिए ले जाते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट लेने के बाद विसरा जांच के लिए नहीं ले जाया जाता है, जिससे गत 20 वर्षों से हजारों की संख्या में विसरे सुरक्षित रखे हुए हैं। 
क्यों जरूरी है विसरा जांच? 
शव के अंत्यपरीक्षण के समय डॉक्टर को जब मौत से संबंधित ठोस जानकारी नहीं मिलती है और उन्हें आशंका रहती है कि कहीं जहर का तो मामला नहीं है, उसे देखते हुए शव का विसरा सुरक्षित कर रख दिया जाता है। जिसे संबंधित थाने के पुलिस जांच पदाधिकारी प्रीजर्व विसरा जांच के लिए स्टेट फारेंसिक साइंस लेबोरेट्री (एसएफएसएल) होटवार, रांची में ले जाते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के अनुसार विसरा प्रीजर्व करने का मुख्य कारण अगर जहर से मौत हुई है तो किस प्रकार के जहर का इस्तेमाल हुआ है? इसकी जानकारी मिलती है। पुलिस के समक्ष कई ऐसे मामले आते हैं, जिसमें मृतक को जहर देकर मारा जाता है फिर उसे फांसी देकर लटका दिया जाता जिससे लगे कि मृतक ने फांसी लगाकर आत्महत्या की है। इसके अलावा इलाजरत मरीज की मौत का कारण जानने के लिए भी विसरा प्रिजर्व किया जाता है ताकि मरीज को इलाज के दौरान चलाये गये अधिक डोज की दवा का पता चल सके, क्योंकि ज्यादा डोज की दवा भी शरीर में जहर का काम करती है जिससे मरीज की मौत हो सकती है। 
छह माह तक ही विसरा जांच के योग्य
डॉ. तुलसी महतो ने बताया कि छह माह तक ही विसरा फारेंसिक साइंस लेबोरेट्री में जांच कराने के उपयुक्त रह पाता है। उसके बाद विसरा खराब होने लगता है, जिसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है। जानकारों के अनुसार राज्य सरकार जिस तरह से लावारिस शवों के सामूहिक अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी है, उसी प्रकार रिम्स के पोस्टमार्टम विभाग में छह माह से अधिक समय से प्रिजर्व विसरा को भी डिस्पोजल करने की अनुमति दी जानी चाहिए।