झारखंड : छुट्टी देकर रक्तदान की प्रेरणा

2018-11-09

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ब्रजेश राय

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अपनी धमनियों में दौड़ने वाला रक्त खुद की ही नहीं, दूसरों की भी जिन्दगी बचा सकता है। इसके लिए एक कदम आगे बढ़कर रक्तदान करने की जरूरत है। दूसरे देशों के बनिस्बत भारत में रक्तदान के प्रति जनमानस न तो सहज है और न ही सचेत। सरकार रक्तदान के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए अभियान चलाती रहती है। केन्द्र सरकार ने अपने कर्मचारियों को रक्तदान के प्रति प्रेरित करने के लिए चार दिनों के अवकाश की स्कीम चला रखी है। इसी तर्ज पर झारखंड सरकार ने भी रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए इस अनोखे उपाय को अपने राज्य के लिए भी अपना लिया है। रघुवर सरकार ने घोषणा की है कि जो राज्य कर्मचारी स्वैच्छिक रक्तदान करेगा उसे चार दिनों का आकस्मिक अवकाश प्रदान किया जाएगा। सरकार यह मान रही है कि इस तरह की पहल से रक्तदान को बढ़ावा मिलेगा। झारखंड में इस तरह की पहल की जरूरत भी है। क्योंकि यहां हर साल 3,50,000 यूनिट ब्लड की जरूरत है। जबकि विभिन्न उपायों से राज्य सिर्फ 1,90,000 यूनिट ब्लड ही एकत्र हो पाता है।
रक्तदान को लेकर भ्रांतियां
रक्तदान को लेकर भारत में अभी तक पूरी तरह से जागरूकता नहीं आ पायी है। अधिकांश लोग अभी इसी भ्रांति में जी रहे हैं कि रक्तदान करने से शरीर में रक्त की कमी हो जाती है, हालांकि यह गलत धारणा है। जबकि रक्तदान करने से रक्त बढ़ता है और शरीर में नये रक्त का संचार होता है। रक्तदान करने के बाद तकरीबन 21 दिनों के भीतर ही शरीर पुनः रक्त निर्माण कर लेता है। इसलिए किसी भी स्वस्थ व्यक्ति को रक्तदान करने से कतई कतराने की आवश्यकता महसूस नहीं होनी चाहिए। 
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 1997 में 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान की नींव रखी थी। जिसके कारण आज विश्व के 124 देशों में स्वैच्छिक रक्तदान को प्रोत्साहन मिल रहा हैं। ध्यान देने वाली बात है कि तंजानिया में 80 प्रतिशत लोग रक्तदान के लिए पैसे नहीं लेते हैं। वहीं, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया में तो यह कानून है कि कोई भी रक्तदान के लिए पैसों की मांग नहीं कर सकता। लेकिन, इसके विपरीत भारत में रक्तदान के लिए पैसे लेने पर किसी प्रकार की रोक नहीं है। यह शर्मनाक है कि भारत जैसे देश में रक्त का व्यापार हो रहा है। 
अपर्याप्त रक्त भंडारण और बर्बादी बड़ी समस्याएं
हमारे देश में पर्याप्त मात्रा में ब्लड बैंक नहीं होने की अलग समस्या है तो है ही सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से पता चलता है कि पिछले पांच सालों में देश में सभी ब्लड बैंकों ने कुल मिलाकर 28 लाख यूनिट से ज्यादा खून बर्बाद किया है। अगर इसे लीटर में मापा जाये तो पांच सालों में करीब 6 लाख लीटर खून बर्बाद हुआ है जो पानी के 56 टैंकरों के बराबर है। यह तो एक समस्या है ही, देश में ब्लड बैंकों की भी घोर कमी है। तेलंगाना राज्य में 31 जिले हैं जिनमें से 13 जिलों में तो ब्लड बैंक हैं ही नहीं। छत्तीसगढ़ में 11 जिले, मणिपुर और झारखंड में 9-9 जिले, यूपी के चार जिले ऐसे हैं, जहां ब्लड बैंक का कोई अता-पता ही नहीं है। इसके अलावा नगालैंड, उत्तराखंड, त्रिपुरा, कर्नाटक के प्रत्येक तीन जिलों में ब्लड बैंक की तो कोई सुविधा ही नहीं है। सिक्किम के दो जिलों और महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और अंडमान निकोबार द्वीप समूह के एक-एक जिले में ब्लड बैंक उपलब्ध ही नहीं है। वहीं, बिहार, असम और मेघालय में से प्रत्येक राज्य के पांच जिलों में ब्लड बैंक ही नहीं है। अगर खून की बर्बादी में राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र, यूपी, कर्नाटक जैसे राज्य इनमें सबसे आगे हैं। इन राज्यों में सिर्फ खून की ही बर्बादी नहीं हुई है, बल्कि रेड ब्लड सेल्स और प्लाज्मा भी काफी मात्रा में बर्बाद हुए हैं। ब्लड कलेक्शन में महाराष्ट्र का आंकड़ा भले ही 10 लाख लीटर के पार गया हो लेकिन, खून की बर्बादी करने में भी यह कहीं न कहीं टॉप पर रहा है। जिसके बाद कहीं जाकर पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश का नंबर आता है।
समय पर रक्त नहीं मिलने व पैसे नहीं जुटा पाने के कारण भारत में प्रतिवर्ष 15 लाख लोगों की मौत रक्त की कमी के कारण हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदंड के अनुसार किसी भी देश में किसी भी स्थिति में उसकी जनसंख्या का कम से कम 1 प्रतिशत रक्त आरक्षित होना ही चाहिए। उक्त मानक के अनुसार हमारे देश में कम से कम 1 करोड़ 30 लाख यूनिट रक्त का हर समय आरक्षित भंडार होना चाहिए। लेकिन, पिछले वर्षों के आंकड़ों के अनुसार हमारे पास प्रतिवर्ष रक्त की औसतन 90 लाख यूनिट ही उपलब्ध हो पाती है। प्रतिवर्ष लगभग 25 से 30 प्रतिशत रक्त की कमी रह जाती है। रक्त की कमी के अलावा दूसरी चिंताजनक बात, रक्त की शुद्धता है। इसलिए संक्रमित रक्त चढ़ाने से होने वाली मौतों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है।