आज नारी नहीं किसी पर भारी

2018-11-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए. खान

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बेबसी और मोहताजी को मात देना है इसके लिए पुरुष प्रधान की सोच से हटकर सुमन देवी, संतोषी मुंडा और जानकी कुमारी मुंडा के उदाहरण को सामने रखना होगा. ये तीनों महिलाएं रोजाना बैट्री रिक्शा चलाकर 800 से 1000 रुपये तक कमा लेती हैं. रिक्शा लिए मर्दों की कतार में खड़ा होने में इन्हें को हिचक नहीं होती. और हिचक हो भी क्यों? जब मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होने की ठान ली है. बल्कि सवारी ही एक महिला को ड्राइविंग सीट पर बैठी देख असहज हो जाती है. उनके लिए खेद की बात सिर्फ यही है और उन्हें कचोटती भी है, वह है इन्हें पड़ने वाले भद्दे कमेंट्स.

फिर भी उनके हौसलों में कोई कमी नहीं आयी है. तभी तो वे कहती हैं- “हम किसी पर भी बोझ बनना नहीं चाहतीं. बच्चा हमारा है तो उसके भविष्य को बनाना भी उनकी जिम्मेदारी है. घर में कमाने वाला कोई नहीं है, खाने वाले इतने. किसी के सामने हाथ फैलाना पंसद नहीं. परिवार चलाना है तो कमाना पड़ेगा ही. अब कमाने वाला मर्द हों या औरत, क्या फर्क पड़ता है. अपने को कोई फर्क नहीं पड़ता, कौन क्या कहता है. बस कमाना है और खाना, तो शर्म किस बात की.”

पैसा कमाना तो किस्मत का खेल

जानकी कहती हैं कि रांची की सड़कों पर बीते दो साल में बैट्री रिक्शा की संख्या काफी बढ़ गयी है. इसके कारण हाल के दिनों में चलाकों की कमाई कम हुई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है तीन महिलाओं के रिक्शा चलाने की वजह से ही पुरुष ड्राइवर की पहले जैसी कमाई नहीं हो पा रही है. वहीं, संतोषी मुंडा का मानना हैं कि चाहे जितने रिक्शा आ जाये, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि सब किस्मत की बात है. सुमन के मुताबिक ये धारणा ही बेतुकी है.

दरअसल, इन महिला चालाकों का कहना है कि इसी वजह से इन्हें भद्दे कमेंट सुनने पड़ते हैं. संतोषी बताती हैं, “भद्दे कमेंट या गाली देने वाला कोई सवारी नहीं होता है, बल्कि बैट्री रिक्शा चलाने वाले पुरुष चालक हैं. क्योंकि उन चालाकों का मानना है कि हम महिलाएं रिक्शा चलाकर उनके हिस्से का पैसा ले रही हैं. जबकि मैं मानती हूं जिसकी किस्मत में जितना होगा, उसे मिलेगा ही.”

सुमन और जानकी को भी अभद्र टिप्पणी का शिकार होना पड़ा है. अभद्र टिप्पाणियों के बदले आपका जवाब क्या रहता है, के प्रश्न पर ये महिलाएं कहती हैं कि उन्हीं की भाषा में जवाब देकर वे उलझना नहीं चाहती हैं. इसलिए विन्रमता और खमोशी अख्तियार करना ही बेहतर समझती हैं.

जिंदगी जीना चाहती थी- संतोषी

22 वर्षीय संतोषी मुंडा पिछले दो साल से रांची में बैट्री रिक्शा चला रही हैं. रांची से 50 किलोमीटर दूर स्थित सिल्ली की रहने वाली संतोषी कहती हैं कि वह एक साल की थीं, जब उनकी मां का निधन हो गया. फिर पिता परिवार में तीन भाई और दो बहनों को छोड़कर चले गये. भरण-पोषण की चुनौतियों की चिंता ने परिवार को रांची पहुंचा दिया. तब से ही मोहताजी और बेबसी परिवार का हिस्सा रहा.

संतोषी आत्मनिर्भर बनना चाहती थीं, लेकिन उनके भाइयों को पंसद नहीं था. वह आगे बताती हैं, “आठ वर्ष की उम्र से ही मैं अपनी दीदी के साथ लोगों के घरों में दाई का काम करने लगी. रुचि थी कि पढ़ाई-लिखाई करूं. हॉकी खिलाड़ी बनना चाहती थी. जब कमाने की बात करती तो भाई लोग मुझे दाई के काम तक ही जिंदगी सीमित रखने की सलाह देते. जिंदगी कैद जैसी लगने लगी तो भाई का घर छोड़ दिया.”

संतोषी ने जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. पढ़ने की उम्र में किस्मत ने हाथ में झाड़ू पकड़ा दिया, तो समय के साथ संतोषी ने स्वयं ही स्टेरिंग, हैंडल पकड़ लिया. आज न वह मोहताज हैं, न बेरोजगार. वह कहती हैं कि मर्द रिक्शा और ऑटो चला सकता है तो औरत या महिलाएं क्यों नहीं. फिलहाल संतोषी बैट्री रिक्शा से महीने का लगभग 20 हजार रुपया कमा लेती हैं और जरूरत पड़ने पर भाई-बहन को मदद भी करती हैं.

बोझ नहीं, आत्मनिर्भर

जब सुमन का बेटा छह महीने का था तब उनके पति इस दुनिया से जा चुके थे. आज बेटे की उम्र 14 वर्ष है और सुमन आगे उसके भविष्य को सवांरने में कोई भी आर्थिक अड़चन आने नहीं देना चाहती हैं.

वह कहती हैं, “पति के निधन के बाद मैके आकर रहने लगीं. लेकिन जब बच्चा पांच साल का हुआ तब उसके एडमिशन को लेकर काफी परेशान होना पड़ा. तब से मैंने काम करना शुरू कर दिया. आठ साल रांची के एक लेडीज गॉरमेंट्स दुकान में काम किया. अभी पिछले छह महीने से बैट्री रिक्शा चला रही हूं, जिससे रोजाना के लगभग 800 रुपये आ जाते हैं.”

सुमन अपने लड़के की पढ़ाई में किसी तरह की कोताही नहीं बरतना चाहती हैं. वह अपने बेटे का भार अपने किसी भी रिश्तेदार पर डालना नहीं चाहतीं. अब उनका एक ही लक्ष्य है कि लड़के को पढ़ाकर एक कामयाब इंजीनियर बनाना. 35 वर्षीय सुमन रांची के हिनू में अपने मां-बाप के घर में रहती हैं, लेकिन बोझ बनकर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर.

पति के साथ कदमताल 

इधर, जानकी अपना परिवार चलाने के लिए पति के साथ कदमताल कर रही हैं. पति ऑटो रिक्शा तो पत्नी जानकी बैट्री रिक्शा चलाती हैं. जानकी कहती हैं, “दो बच्चों के निजी बोर्डिंग स्कूल का बोझ, मकान का रेंट और राशन सभी इसी कमाई से पूरा हो पाता है”. जानकी कुमारी के परिवार में पति के अलावा एक बेटी और एक बेटा हैं. दोनों बच्चों को निजी बोर्डिंग में पढ़ाती हैं. वह कहती हैं पिछले कई सालों से उनका परिवार रांची में रह रहा है. पुश्तैनी मकान रांची से 15 किलोमीटर दूर टाटीसिलवे में है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई और परिवार के चलाने के लिए शहर में रहना पड़ता है.

हालांकि रांची में महिलाएं ऑटो काफी पहले से चलाती आ रही हैं. शहर में इसे पिंक ऑटो के नाम जाना जाता है और उसे चलाने वाली महिलाएं ड्रेस कोड में होती हैं. इस ऑटो पर सिर्फ महिलाएं ही बैठ सकती हैं. जबकि बैट्री रिक्शा चलाने वाली इन तीन महिलाओं के साथ ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है. इनके रिक्शे पर पुरुष और महिलाएं दोनों ही बैठती हैं. इन्हें देख सवारी की पहली नजरें भले ही असहज हो जाती हैं, लेकिन इनके हौसलों की सराहना करना नहीं भूलतीं.