कचरे के ढेर पर बैठी रांची डेंगू-चिकनगुनिया की चपेट में

2018-11-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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झारखंड की राजधानी रांची वर्तमान में डेंगू और चिकनगुनिया की चपेट में है। रांची में कदम-कदम पर इन बीमारियों के वाहक मच्छरों के लार्वा पनप रहे हैं। रांची के हिन्दपीढ़ी, पुरानी रांची, मेन रोड, बारियातु, राजेन्द्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) परिसर, डॉक्टर्स कॉलोनी आदि जहां भी चिकित्सीय टीम ने जांच की, मच्छरों के लार्वा पाये गये। यह जांच अगस्त से जारी है और लगातार एक महीने से अधिक समय से विभिन्न मुहल्लों में इसकी जांच की जा रही है। चिकित्सा दल अलग-अलग मुहल्लों में जाकर वाटर कंटेनर, कचरों के ढेर में पड़े कंटेनर, नारियल के छिलके, टूटे-फूटे डब्बे, बोतल, बर्तन, पानी की टंकियों आदि की जांच कर रहा है और अधिकतर में मच्छरों के लार्वा मिल रहे हैं। दूसरी ओर डेंगू और चिकनगुनिया के मरीजों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। सभी पीड़ितों के ब्लड सैंपल की जांच रिम्स में हो रही है और हर दिन कुछ न कुछ मरीज मिल रहे हैं। हालांकि रांची सदर अस्पताल, मलेरिया विभाग, नगर निगम और रिम्स की टीम अलग-अलग एवं समूह बनाकर लगातार इस काम में जुटे हुए हैं, लेकिन न तो लार्वा की संख्या में कमी आयी है और न ही नये मरीजों का मिलना कम हुआ है। इसका कारण यह है कि यह टीम लार्वा और रोगियों की खोज तो कर रही है, पर इसके कारणों को समाप्त नहीं कर रही है। रांची नगर निगम शहर की सफाई के प्रति अभी तक सतर्क नहीं हुआ है। यह घोर लापरवाही है। पूरी रांची कचरे के ढेर पर है, लेकिन सफाई की मुकम्मल व्यवस्था की चिंता यहां न तो नगर निगम को है, न नगर विकास विभाग को और न ही राज्य सरकार को। गंदगी के कारण मच्छर पनप रहे हैं, लेकिन गंदगी हटाने के बजाय सरकार के सभी तंत्र रोगी को चिह्नित करने एवं रोगाणु को पकड़ने में लगे हैं। 
150 मीट्रिक टन कचरा रोज बिखरता है सड़कों पर
रांची नगर निगम में सफाई की व्यवस्था बिल्कुल ही लचर है। नगर निगम के अधिकारियों के अनुसार निगर क्षेत्र में प्रतिदिन 650 मीट्रिक टन कचरा निकलता है। उसमें से 500 मीट्रिक टन का ही उठाव हो पाता है। शेष 150 मीट्रिक टन कचरा रोज सड़कों पर ही बिखर जाता है और फिर नालियों में चला जाता है। इस हिसाब से यहां वर्ष में 54,750 मीट्रिक टन कचरा सड़कों पर ही बिखर जाता है। यही वह कचरा है, जो मच्छरों समेत अन्य रोगाणुओं के पनपने का कारण बनता है। 
ऐसा नहीं है कि नगर निगम प्रबंधन के पास सफाई के लिए पैसे की कमी है। बजट सत्र 2018-19 में नगर निगम का बजट 1974 करोड़ रुपये का पास हुआ है। उसमें 46.20 करोड़ रुपये मात्र सफाई के नाम पर हैं। दूसरी ओर सफाई के लिए नगर निगम ने पूरे क्षेत्र को दो भागों में बांट रखा है। कुल 53 वार्डों में से 34 वार्ड की सफाई का जिम्मा एक निजी सफाई एजेंसी एस्सेल इंफ्रा को दिया गया है, जबकि शेष 19 वार्डों की सफाई स्वयं नगर निगम कर रहा है। नगर निगम के पास सफाई के लिए 98 वाहन एवं लगभग 1700 मजदूर हैं। निजी एजेंसी एस्सेल इंफ्रा के पास भी करीब इतने ही संसाधन हैं। इस तरह करीब 200 वाहन और करीब साढ़े हजार से अधिक मजदूर शहर की सफाई में 24 घंटे लगे हुए हैं। औसतन हर वार्ड में 60 सफाई मजदूर कार्यरत हैं। इसके बाद भी सभी कचरों का उठाव नहीं हो पाता है। 
नागरिकों की शिकायतें हर रोज नगर निगम कार्यालय और वार्ड पार्षदों के पास पहुंचती हैं। लोग सफाई से संतुष्ट नहीं हैं। कई चौराहों से कचरों का नियमित उठाव नहीं किया जाता है। शहर में डेंगू और चिकनगुनिया फैलने के बाद नगर निगम बोर्ड की बैठक में वार्ड पार्षदों से सफाई पर खूब हंगामा किया। सभी वार्ड पार्षद सफाई मजदूरों की संख्या बढ़ाने की मांग कर रहे थे। लगातार दो बैठकों में यही स्थिति रही। लेकिन नियमित सफाई में व्यवधान कहां है, यह कोई भी बताने की बात तो छोड़ दीजिए, जानने और समझने को भी तैयार नहीं है। 
नालियां और कूड़े फैला रहे रोगाणु
नागरिकों का कहना है कि शहर में सफाई कर्मचारी नालियों से चकरा निकाल कर वहीं ऊपर में छोड़ देते हैं। कहा जाता है कि यह गीला चकरा, सूखने पर उठाया जायेगा। लेकिन जब तक वह कचरा सूखता है, तब तक गाड़ियों के टायरों से बिखर कर पुन: नालियों में चला जाता है। उसी तरह कई चौक-चौराहों पर कचरों का ढेर समय पर नहीं उठाया जाता है। शहर की यही गंदगी है, जो रोगाणु को पनपने को मौका दे रही है। कई चौक-चौराहों पर कूड़े-कचरे के लिए कंटेनर नहीं रखे गये हैं। शहरवासी यूं ही सड़क के किनारे घर से निकले कचरे को फेंक देते हैं। इससे काफी कचरे नालियों में गिर जाते हैं। यह प्रक्रिया चलती रहती है और रोगाणु पूरे शहर में अपना जाल फैलाते रहते हैं। शहर के कचरों का डंपिंग स्थल भी शहर से सटे झिरी गांव में है। मच्छरों समेत अन्य रोगाणुओं के वहां से शहर तक पहुंचने में आसानी होती है। झिरी गांव के निवासियों ने कई बार यहां डंपिंग स्थल होने का विरोध किया है, लेकिन कचरा निष्पादन के लिए समुचित प्रबंधन योजना के अभाव में सब कुछ यूं ही चल रहा है। नगर निगम के अधिकारियों पर किसी भी हंगामे का कोई असर नहीं पड़ रहा है।