अब कंप्यूटर से जमीन घोटाला

2018-11-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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झारखंड में जमीन विवाद और जमीन विवाद के नये-नये तरीके की चर्चा खूब होती रहती है। इससे निपटने के लिए राज्य सरकार ने जमीन के दस्तावेज का डिजिटलीकरण कर दिया। अब रजिस्ट्री भी डिजिटल माध्यम से हो रही है और म्यूटेशन तथा रसीद काटने का काम भी उसी माध्यम से हो रहा है। इसी बीच भूमि से राशि की उगाही करने वालों ने अपना रास्ता निकाल लिया है। अब वे लोग अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर का उपयोग कर जमीन का घोटाला कर रहे हैं। 
राज्य के अंचलाधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर का उपयोग कर गलत तरीके से डाटा इंट्री की जा रही है। ऑनलाइन हो रहे इस कार्य में सीओ के डिजिटल हस्ताक्षर का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है। गलत तरीके से डाटा इंट्री कर जमीन के स्वामित्व को लेकर चल रहे विवादों में किसी खास पक्ष को लाभ दूसरे पक्ष को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। यहां तक कि गैरमजरूआ किस्म की जमीन के मामले में भी सीओ के डिजिटल हस्ताक्षर का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तरह की कई शिकायतें पहुंच रही हैं। राज्य सरकार को भी इस तरह की शिकायतें मिली हैं। इसके बाद राज्य के भू-राजस्व, भूमि सुधार एवं निबंधन विभाग ने इस तरह के मामलों पर संज्ञान लिया है। सरकार को यह सूचना मिली है कि कई सीओ के डिजिटल हस्ताक्षर का बेजा इस्तेमाल कंप्यूटर आॅपरेटरों द्वारा किया जा रहा है। ये कंप्यूटर आॅपरेटर इस हस्ताक्षर का उपयोग वहां कर रहे हैं, जहां भू-स्वामित्व को लेकर कुछ विवाद सीओ, एलआरडीसी, अपर समाहर्ता, उपायुक्त और आयुक्तों की अदालत में चल रहे हैं। 
करोड़ों की कमाई
सूत्रों का कहना है कि झारखंड में ज्यादातर मामले में जमीन का खेल फर्जी डाटा इंट्री के माध्यम से चल रहा है। सूत्रों के अनुसार जमीन दलालों ने राज्य में जमीन खरीद-बिक्री के मामले को धंधा बना लिया है। रांची जैसे शहरों में यह धंधा बड़ा उद्योग का शक्ल अख्तियार कर लिया है। जमीन की खरीद-बिक्री में करोड़ों की कमाई हो रही है, लेकिन यह पूरी तरह काली कमाई है। इसका पूरा हिसाब-किताब जुबानी या फिर कच्चे कागजों पर होता है। इस धंधे में दलालों के साथ राजनीतिक नेता और कई अधिकारी भी शामिल होते हैं। अब डाटा आॅपरेटरों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। सूत्रों का कहना है कि चूंकि डाटा इंट्री में किसी की लिखावट पकड़ाने का कोई भय नहीं होता है, इस कारण जमीन दलालों का समूह इसे और भी निडर होकर कर रहा है। गड़बड़ी सामने आने पर दलालों की कमाई और बढ़ जाती है। पहली कमाई काम बिगाड़ने में होती और फिर दूसरी कमाई उसे सुधारने में। रांची जैसे शहर में तो हालत ज्यादा ही गंभीर है। यहां जमीन के एक-एक प्लॉट की बिक्री में कई दलालों का समूह सक्रिय रहता है। दलालों की संख्या के आधार पर यहां जमीन की दर तय होती है। जैसे ही एक दलाल बढ़ा, 50,000 रुपये की कमाई बढ़ा दी जाती है। इसी लाभ को देखते हुए कहीं-कहीं जानबूझ कर भी विवाद पैदा कर दिया जाता है, ताकि दोनों पक्ष पैसे लेकर काम सुधारने के लिए पहुंचें। यह खेल अब रफ्तार पकड़ चुका है, लेकिन उच्चाधिकारी इस पर विराम लगाने में विफल रहे हैं। 
सरकार गंभीर, अधिकारी खामोश
डाटा इंट्री में गड़बड़ी की लगातार मिल रही शिकायतों के बाद भू-अर्जन, भू-अभिलेख, परिमाप निदेशालय की ओर से सभी जिलों के डीसी और अपर समाहर्ता को पत्र भेजा गया है। इसमें निदेशक की ओर से खास तौर पर कहा गया है कि अंचल अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर का कंप्यूटर आॅपरेटर गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। यह नियम विरुद्ध है। सरकार ने इसे गंभीरता से लिया है। निदेशक ने कहा है कि सभी जिलों के उपायुक्त और अपर समाहर्ता यह सुनिश्चित करेंगे कि सीओ के डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल स्वयं सीओ ही करें और लिंक किया गया फोन नंबर उस अंचलाधिकारी का ही हो। हालांकि सूत्रों का कहना है कि सरकार की सख्ती के बाद भी कई जिलों में जमीन से संबंधित फर्जी डाटा इंट्री का खेल चल रहा है। अधिकारी इस मामले में अंजान हैं या फिर जानबूझ कर खामोश हैं, यह चिंता वाली बात है।