कैंसर को मात देकर लोगों को सीखा रहे जीने का हुनर

2018-11-10

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-साक्षी अग्रवाल

image

image

31 साल के इबरार मार्शल आर्ट्स के मंझे हुए ट्रेनर हैं. लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम में उन्होंने खुद की जिंदगी को बड़ी बीमारी के बावजूद भी लड़खड़ाने नहीं दिया. जब उन्हें ब्लड कैंसर डिटेक्ट हुआ था, तो परिवार टूट-सा गया, लेकिन आज इबरार की जिंदगी फिर से पटरी पर दौड़ पड़ी है और इलाज के बाद उन्होंने बच्चों को एक बार फिर से कराटे की ट्रेनिंग देनी शुरु कर दिया है, जो निरंतर जारी है.
खिसक गयी थी पैरों तले जमीन
इबरार उस दिन को याद करते हैं, जब डॉक्टर ने बताया उन्हें कैंसर है और जितनी जल्दी हो सके मुंबई जाने का मशवरा दिया. वह कहते हैं, “2005 में मेरी गर्दन के पास कई गिल्टियां निकल आयी थीं, जिससे काफी दर्द होता था. डाक्टर को दिखाया. टेस्ट कराने पर कैंसर का पता चला. रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने मेरे भाई को अंदर बुलाकर कहा, तुम्हारे भाई को कैंसर है. ये आवाज मेरे कानों तक भी पहुंची. सुनते ही ऐसा लगा कि मेरे पैर तले से जमीन खिसक गयी हो. मैंने अपने आपको संभाला और घर में किसी को भी यह एहसास नहीं होने दिया कि मुझे पता है कि मुझे कैंसर है.”
हालांकि मैट्रिक के बाद इबरार ने आगे आर्थक तंगी की वजह कर पढ़ाई नहीं की, लेकिन इस बीच (2003) कराटे में ‘वर्ल्ड कराटे मास्टर आर्ट्स फेडरेशन’ से ब्लैक बेल्ट  हासिल कर लिया. अब बतौर ट्रेनर लोगों को ट्रेनिंग देने का लाइसेंस उन्हें मिल चुका था. इबरार ने ट्रेनिंग देनी शुरू की, लेकिन दो साल बाद ही उन्हें ब्लैड कैंसर हो गया. इबरार के भाई नेहाल कुरैशी बताते हैं, कैंसर का नाम सुनते ही हमलोग समझ चुके थे कि इबरार अब कुछ दिनों का मेहमान है. घर की स्थिति ठीक नहीं थी. इलाज के लिए मुबंई पहुंचने पर ट्रस्ट से कुछ मदद मिली. इबरार ने हार नहीं मानी.”
दो साल तक मुबंई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में इबरार का इलाज चला.
निःशुल्क भी देते हैं ट्रेनिंग
ठीक होने के बाद इबरार ने निर्णय किया कि वह फिर से कराटे का प्रशिक्षण देना प्रारंभ करेंगे और 2008 से ट्रेनिंग देनी शुरू की. इबरार कहते हैं कि कैंसर होने से पहले वह दो जगहों पर ट्रेनिंग सेंटर चलाते थे. डोरंडा शिशु सदन और एयरपोर्ट स्थित उनके  दोनों सेंटर में कुल 80 छात्र थे. इसमें कुछ उम्र दराज भी थे, लेकिन अधिकांश लड़के-लड़कियां ही.
फिलवक्त दो सेंटर अभी भी चल रहे हैं. अब वह एयरपोर्ट के अलावा डोरंडा के सनराइज एकेडमी स्कूल में छात्र-छात्राओं को कराटे, किक बॉक्सिंग और मिक्स बॉक्सिंग के गुर सिखा रहे हैं. इबरार को स्कूल से महीने के तीन हजार मिलते हैं, जबकि एयरपोर्ट वाले सेंटर से भी महीने का इतना ही आ जाता है.
उनका कहना है कि पहले और आज भी उनके वैसे दर्जनों छात्र हैं, जिन्हें वह कराटे की निःशुल्क ट्रेनिंग देते हैं. जॉइंट फैमली में इबरार के अलावा वालिद-वालिदा और तीन बड़े भाई हैं. जबकि दो बहन थी जिनकी शादी हो गई. इबरार आगे और कराटे ट्रेनिंग सेंटर खोलना चाहते हैं, ताकि आत्मसुरक्षा के लिए लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जा सके.