गेहूं से होंगे झारखंड के किसानों के सपने साकार

2018-11-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-प्रमोद जायसवाल

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आमतौर पर झारखंड की पहचान कृषि प्रधान राज्य के रूप में कभी नहीं रही है। साल में सिर्फ एक फसल यानी धान की फसल उगाकर यहां के किसान संतोष कर लेते हैं। राज्य के  भारतीय गेहूं एवं बार्ले शोध संस्थान ने झारखंड की जलवायु के अनुरूप गेहूं की एक अच्छी किस्म DBW187 तैयार की है जो यहां के किसानों के लिए वरदान साबित हो सकता है।गेहूं की नयी किस्म की खासियत यह है कि इसे लगाकर किसान रबी फसल के रूप में अच्छी उपज तैयार कर अपनी आय बढ़ा सकते हैं।
झारखंड बनने के वक्त राज्य गेहूं उत्पादन के क्षेत्र में काफी पिछड़ा था और सिर्फ एक हजार हेक्टेयर क्षेत्र तक ही गेहूं का उत्पादन सीमित था। वतर्मान में राज्य में गेहूं का उत्पादन बढ़कर दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा हो गया है। यह झारखंड के लिए अच्छी खबर तो है। लेकिन कृषि वैज्ञानिक कुछ नये किस्म के बीजों पर काम कर रहे हैं ताकि यहां के मौसम और परिस्थितियों के अनुसार अधिक से अधिक गेहूं का उत्पादन किया जा सके। साथ ही गेहूं के उत्पादन का दायरा भी बढ़ाया जा सके। 
हम जानते हैं कि झारखंड में रबी की फसल के दौरान सिंचाई एक बड़ी समस्या है, क्योंकि मैदानी इलाकों की तरह यहां सिंचाई के साधनों की कमी है। साथ ही मौसम भी थोड़ा प्रतिकूल है।सम्मेलन में आये कृषि वैज्ञानिकों ने इसी समस्या से निबटने के उपाय सुझाये। पहले तो उन्होंने झारखंड के किसानों का आश्वस्त किया कि गेहूं के उत्पादन की यहां पूरी सम्भावनाएं हैं। यहां के किसान भी गेहूं को अधिक मात्रा में उपजाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं। बस, इसके लिए ऐसे किस्म के गेहूं की आवश्यकता होगी जो यहां की जलवायु के अनुरूप हो। जो न सिर्फ 90 से 100 दिन में तैयार हो जाये और कम पानी में भी अच्छी उपज दे सके। यानी पटवन भी तीन से चार बार ही करनी हो।
इस सम्बंध में बीएयू के निदेशक डॉ डीएन सिंह ने बताया कि करनाल के इंडियन इंस्टियूट ऑफ व्हीट एंड बार्ले रिसर्च की ओर से यह आश्वासन मिला है कि वह झारखंड के लिए विशेष किस्म की गेहूं और जौ की किस्म विकसित करने में सहयोग करेगा। सम्मेलन में आये आईसीएआर के महानिदेशक ने भी बताया कि झारखंड में गेंहू और जौ की खेती की अपार संभावनाएं हैं। इस सम्मेलन का उद्घाटन करने आयीं राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू ने भी राज्य में गेहूं और जौ का उत्पादन बढ़ाकर किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में राज्य सरकार के सहयोग का आश्वासन भी दिया।
2022 तक पांच टन प्रति हेक्टेयर पहुंचाने का लक्ष्य
गेहूं के उत्पादन में झारखंड राज्य अब भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है, लेकिन बिरसा कृषि विवि के कुलपति डॉ पी कौशल ने उम्मीद जतायी कि गेहूं के उत्पादन में झारखंड अब किसी राज्य से पीछे नहीं रहेगा। जैसा कि जानते हैं कि गेहूं का उत्पादन राष्ट्रीय औसत 3.17 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि झारखंड में 2.12 टन प्रति हेक्टेयर है, लेकिन 2022 तक झारखंड में गेहूं की पैदावार पांच टन प्रति हेक्टेयर  पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
डॉ कौशल ने कहा कि झारखंड में धान की फसल के बाद रबी फसल के लिए 28 लाख हेक्टेयर जमीन खाली पड़ी रहती है। यानी झारखंड की कृषि योग्य भूमि में 25 प्रतिशत पर ही रबी फसल का उत्पादन हो रहा है, जबकि 75 प्रतिशत भूमि खाली पड़ी रहती है। इस खाली पड़ी जमीन का सही उपयोग करके ही निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।
पूरे देश की बात करें तो 1950- 52 में 11 मिलियन टन ही गेहूं का उत्पादन होता था, लेकिन वर्तमान समय में यह आंकड़ा 100 मिलियन टन के करीब तक पहुंच चुका है। फिलहाल 98 मिलियन टन गेहूं उत्पादन हो रहा है।