अंग्रेजों ने भी माना था शराब-दारू नहीं है आदिवासियों की संस्कृति

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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ब्रिटिश काल की एक रिपोर्ट के खुलासे से स्पष्ट है कि छोटानागपुर प्रमंडल में आदिवासी शराब के आदी नहीं थे. 1883-84 में छोटानागपुर के एक्साइज कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि इस क्षेत्र के आदिवासी शराब पीना पंसद नहीं करते हैं. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में ये बात भी मानी थी कि इनके शराब नहीं पीने से सरकार को नुकसान भी हुआ था.
...जब अंग्रेजों को बंद करनी पड़ीं भट्ठियां
इतिहासकारों का मानना है कि शराब शोषण और रेवेन्यू के लिहाज से एक बड़ा हथियार था. बिट्रिश हुकूमत ने इसी के मद्देनजर 1864-65 के बीच रांची सदर और लोहरदगा सदर में दो दारू की भट्ठियां डाली. 1867 में चोरेया, बालूमाथ, पालकोट, डोमा और राहे में और पांच भट्ठियां खोलीं. यहां बनी शराब बेचने के लिए कई शराब की दुकाने खोली गईं. लेकिन ये दारू की भट्ठियां आदिवासियों की उदासीनता की भेंट चढ़ गईं। सरकार को यह घाटे का सौदा साबित हुआ. राहे की भट्टी को मात्र दो माह के अंदर ही बंद करना पड़ा, जबकि कुल सात में से पांच भट्टियां 1871 तक बंद हो गईं. दो भट्टियां रांची और लोहरदगा में इसलिए चलती रहीं, क्योंकि इन इलाकों में एक बड़ी आबादी बिहार-यूपी से आये मजदूरों की थी जो शराब का सेवन करती थी. झारखंड में 1864 से पहले तक शराब का धंधा बाहर से आये कलाल और साहू-सूढ़ी के हाथों में था. वे मुख्यतया महुए और धतूरा मिलाए पानी वाली शराब बेचा करते थे. ब्रिटिश सरकार ने आदिवासियों को दारू की ओर मोड़ने के लिए उनकी सांस्कृतिक पहचान ‘हाड़िया’ पर 1830 में टैक्स लगाया था, जिसका व्यापक प्रतिरोध हुआ और बाद में इस टैक्स को हटा लेना पड़ा. अंग्रेजों का अथक प्रयास भी आदिवासियों को दारू की आदत नहीं लगा पाया.
आदिवासियों को लगाई गई थी लत
आदिवासियों को दारू पिलाकर ठगी के मामले झारखंड में अनेक हैं. विशेषकर उनकी जमीनों को हथियाने के. यही वजह थी कि संताल परगना काश्तकारी अधिनिम 1949 तथा छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 जैसे कानून बनाए गए ताकि आदिवासियों की जमीनें हथियाई न जा सकें. आदिवासी संस्कृति के जानकार और लेखक अश्विनी पंकज कहते हैं कि आदिवासी के प्रति समाज की सोच बहुत संकीर्ण है. गैर आदिवासी ये आज भी मानते हैं कि आदिवासियों की संस्कृति शराब-दारू है और इसे पीकर वे हर जगह पड़े रहते हैं. जबकि झारखंड के आदिवासियों के इतिहास का अध्यन करेंगे तो बात बिल्कुल भिन्न पायेंगे.1890 से पहले तक आदिवासी समाज शराब पीना पसंद नहीं करता था. हां, हाड़िया उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान रही है और वे इसका सेवन अवसरों पर किया करते थे. आप हाड़िया की तुलना उन नशीले शराब से कतई नहीं कर सकते हैं, जिसकी धारणा आज बदल दी गई है. हाड़िया का इस्तेमाल नशे के तौर पर नहीं, सांस्कृतिक ढंग से किया जाता था और इसमें नशा नहीं होता था. लेकिन बाद में हाड़िया में केमिकल मिलाकर उसे शराब में बदल दिया गया. अंग्रेजों ने धीरे-धीरे आदिवासियों को महुए के शराब की लत लगाई. फिर सामंतवादियों और बाजारीकरण ने इसे आगे बढ़ाया. इसलिए ये धारणा बिल्कुल बदलनी चाहिए कि शराब आदिवासियों की संस्कृति का हिस्सा रहा है. वहीं सीपीआई(एम) और तीन बार विधायक रहे राजेंद्र सिंह मुंडा कहते हैं कि आदिवासियों का दारु-शराब से कहीं कोई नाता नहीं रहा. ये आदत एक साजिश के तहत अंग्रेजों की दिलाई हुई है. इसी को हथियार बनाकर आदिवासियों की जमीनें हड़पी गईं।