ट्रैक्टर की आवाज में दब गये बैलों के घुंघरू के राग

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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वक्त के साथ गांव भी आधुनिक हो रहे हैं। किसान भी अत्याधुनिक हो रहे हैं। खेती में अब मशीनीकरण हावी हो गया है। एक वक्त था जब मशहूर गीतकार इंदीवर ने फिल्म  'उपकार' के लिए एक गीत लिखा था- 'मेरे देश की धरती...', उसमें एक पंक्ति थी- 'बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं...' तथा एक और पंक्ति थी- 'सुन के रहट की आवाजें, यूं लगे कहीं शहनाई बजे...'। इस गीत में खेती की स्थापित परम्परा और संस्कृति की महक थी। अब बैलों के गले में बंधे घुंघरू के वे राग ट्रैक्टर की आवाज में दब गये हैं। हल और बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है। खेत जुताई की साइत से लेकर राहट से सिंचाई और दौनी तक खेतिहर बैल पर निर्भर हुआ करते थे। अब ये सभी काम मशीनों से हो रहे हैं। इस कारण गांवों में बैलों की संख्या में कमी आ गयी है। बैलों के गले में बांधने के लिए घुंघरू समेत अन्य साजो-सामान की खरीदारी ही किसानों ने बंद कर दी है। वक्त के साथ किसानों की पोशाक भी बदल गयी है। अब हल-बैलों की जगह ट्रैक्टर तथा हलवाहे की जगह चालक हो गये हैं। बैलगाड़ियों और दौनी के काम भी ट्रैक्टर ही कर रहे हैं। रहट की जगह मोटर पंप, इलेक्ट्रिक पम्प और सोलर पंप आ गये हैं। ट्रैक्टर चालक अब पैंट-शर्ट में खेत जोतता है। स्थिति बदली है तो समय की बचत भी हो रही है। बैलों की गति धीमी हुआ करती थी, पर ट्रैक्टर तेजी से खेतों की जुताई, दौनी, ओसाई सब कर रहे हैं। धीमी गति का उदाहरण आज भी बैलगाड़ी है। लेकिन बैलों का गोबर खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाता था। अब उसकी जगह रासायनिक खाद पर निर्भर रहना पड़ता है।
किसानी शुद्ध कर्मयोग
धरती कर्म की भूखी है और किसानी शुद्ध कर्मयोग। बैल खेतिहर के जीवन के वास्तविक धुरंधर हुआ करते थे। इसी कारण किसान बैलों को प्राण की तरह मानता था। किसान के हर कदम बैलों के साथ ही उठा करते थे। वैशाख अखड़तिजिया में खेत डाहे जाते थे। वह खेती की साइत भी हुआ करती थी। तब किसान बैलों को लेकर खेत तैयार करने उतरते थे। खुंटार, बलिहन आदि सभी खेतों की उन्हारी कर भदई की तैयारी होती थी। हल-बैलों के जमाने में आषाढ़ में हरिस, दबिया, परिहथ, जुआठ, हेंगा की मरम्मत बढ़ई से करायी जाती थी। खुरपी, बेलचा, कुदाली के बेट बदलवाये जाते थे। फिर दो बैलों को जुआठ कर घुटनों तक धोती पहने किसान कंधे पर हल टांग कर खेतों में जाते थे। तब शुरू होती थी खेती। भदई, साठी, अगहनी फसलों की बुआई शुरू होती थी। आषाढ़ में धुरिया बावग, लेवही बावग, मिलौनी बावग, पैरा बावग, धारी बावग होते थे। इन कार्यों में बैल अपरिहार्य थे। खेती की शुरुआत में बाच्छा काढ़ने की एक प्रक्रिया होती है। उदंत, दुदंता, चौदंता, छदंता, अठदंता आदि बैलों के प्रकार होते हैं। सभी के अलग-अलग महत्व है। छदंता को जवान माना जाता है। हल में जोतने लायक तैयार करने से पहले उसका बधिया किया जाता है। सींग, आंख, कान, दांत, बांसा, ककही, पुट्ठा, खुर, पूंछ, टांग आदि से बैलों की परीक्षा होती है। अपने विभिन्न गुणों के कारण मैना, धवरा, गोला, सोकना, मुंड़वा, खैरा, करिया, सोकना, टिकरा, लतखना, मरखना आदि बैलों के नाम होते हैं। पहले इसके विशेषज्ञ हुआ करते थे। बैलों में होने वाले रोग के अलग विशेषज्ञ थे। बैलों को खिलाने के लिए किसान का परिवार घास, भूसा, कुट्टी, चोकर, खुदी, खल्ली आदि की विशेष व्यवस्था करता था। हल जोतने के लिए हलवाहा और उन्हें चराने के लिए चरवाहे हुआ करते थे। किसानों के माल ढोने के लिए बैलगाड़ियां हुआ करती थीं। तब बैलों के समृद्ध बाजार हुआ करते थे। आषाढ़ के महीने में बैल बाजार की भीड़ देखने लायक होती थी। 
समृद्धि का पैमाना बना ट्रैक्टर
आज का खेतिहर अत्याधुनिक हो चुका है। कभी किसान के दरवाजे पर बैलों की उपस्थिति से उसकी समृद्धि का आकलन हुआ करता था। अब किराये के ट्रैक्टर से खेती कराना सामान्य बात हो गयी है। परम्परा यूं टूटी कि तब बड़े किसान हलवाहे पर निर्भर हुआ करते थे, अब स्वयं ट्रैक्टर लेकर हल जोतते नजर आते हैं। बैल सामाजिक सामूहिकता में भी भूमिका निभाते थे। ट्रैक्टर के जमाने में व्यावसायिकता हावी हो गयी है। बैल के जमाने में किसानी फर्ज और धर्म हुआ करती थी, पर ट्रैक्टर के जमाने में इसे लाभ-हानि की नजर से देखा जा रहा है। आधुनिकता से न सिर्फ खेती के औजार और परंपरा बदले, बल्कि ग्रामीणों की सामूहिकता में भी दीवार खड़ी हो गयी। अब अकेला किसान बाजार की ओर ताक रहा है, जबकि किसानी के औजार बनाने वाले बढ़ई और लुहार पुश्तैनी धंधा छोड़ विकल्प तलाशने को विवश हैं।
हमारे देश के किसान बैलों से खेती करते आये हैं। आज पारम्परिक खेती करने के तरीकों में परिवर्तन हो गया है। देश की बढ़ती जनसंख्या के कारण आज भोजन की समस्या आ खड़ी है। अन्नदाता किसानों पर इस समस्या का हल है। अब खेती में विज्ञान की नई नई खोज से अधिक उपज ली जाने लगी है। पहले जैसे अब हल नहीं चलते । अब ट्रेक्टर व आधुनिक मशीनों का खेती में उपयोग होने लगा है। पहले गोबर की खाद काम आती थी। आज कई तरह की रासायनिक खाद का खेती में उपयोग हो रहा है। आज समृद्ध खेती की जरूरत है। उत्पादन बढ़ाने के लिए किसान विज्ञान का उपयोग करने लगे हैं। बीज,उर्वरक,पौध संरक्षण,रसायन,सिंचाई तंत्र का संतुलित एवम आधुनिक विधियों का उपयोग किया जा रहा है। बहुत से किसान जैविक खाद का उपयोग कर जैविक खेती कर रहे हैं।
झारखंड में अभी पारम्परिक खेती
झारखंड में अभी भी पारम्परिक तरीके से ही खेती होती है। इसके कारण दूसरे मैदानी इलाकों की तरह यहां लम्बे-चौड़े खेत नहीं हैं। इसके अलावा अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड कृषि के क्षेत्र में उतनी ख्याति भी नहीं रखता। यहां के किसान मौसमी फसलें तो उगाते ही हैं, साथ ही बागवानी पर विशेष ध्यान देते हैं। झारखंड सरकार राज्य में कृषि के विकास पर इन दिनों विशेष ध्यान दे रही है। सरकार ने राज्य को 2025 तक ऑर्गेनिक राज्य बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए किसानों को जैविक खेती की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। 
दरअसल, जैविक खेती का तरीका यह है कि इसमें रासायनिक खाद और कीटनाशक की जगह कुदरती खाद का इस्तेमाल होता है। गोबर की खाद, हरी खाद, जीवाणु कल्चर के अलावा बायो-पैस्टीसाइड और बायो एजैंट जैसे क्राईसोपा का इस्तेमाल होता है। इससे भूमि की पैदावार शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है। साथ ही पर्यावरण भी संतुलित रहता है। कृषि लागत घटने और उत्पाद की गुणवत्ता बढऩे से किसानों को अधिक लाभ मिलता है। 
कुल मिलाकर झारखंड का खेती का स्वरूप अभी पारम्परिक है। कुछ सम्पन्न किसानों के पास ट्रैक्टर और अन्य आधुनिक कृषि-यंत्र है। अन्यथा राज्य के शेष किसान पारम्परिक खेती पर ही निर्भर है।