भूख से मौत की 'परिभाषा'

2018-12-10

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-परम

image

image

खाने के अधिकार पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं के मुताबिक झारखंड में बीते 10 महीनों में तकरीबन 12 लोगों की भूख से मौत हो चुकी है। अब इसी पर विवाद चल रहा है कि क्या ये मौतें वास्तव में भूख से हुई हैं। भूख से मौत में तकनीकी पेंच हो सकता है, लेकिन भूख से मौत होती ही नहीं, ऐसा कहना नाइन्साफी होगी। कम से कम दुनिया के चार देशों- सोमालिया, उत्तर-पूर्व नाइजीरिया, यमन और दक्षिणी सूडान में होने वाली मौतों से समझा जा सकता है कि भूख से मौतें होती हैं, जहां एक बार पेट में 'कुछ' चले जाने के बाद अगला भोजन कम नसीब होगा यहां के लोग नहीं जानते।
भारत में स्थिति इतनी भयावह तो नहीं है, लेकिन भारत के पिछले पिछड़े राज्यों में शुमार झारखंड में एक साल में हुई 12 मौतों (कथित भूख से मौतों) ने राज्य सरकार के माथे पर पसीना जरूर ला दिया है। 'भूख से मौत' तकनीकी पेंच इसलिए है, क्योंकि कुछ (विपक्ष) इसे वास्तव में भूख से मौत मान रहे हैं, जबकि कुछ (सत्ता पक्ष) इसे भूख के बजाय बीमारी से मौत मान रहे हैं। तो इसे थोड़ा तकनीकी रूप से भी समझ लेना ज्यादा जरूरी है।
शरीर को जब सही से खाना नहीं मिलता तो तमाम तरह की बीमारियां हो जाती हैं। इनमें खून का न बनना सबसे बड़ी बीमारी होती है। जब शरीर में खून नहीं बनता तो हार्टअटैक जैसी तमाम बीमारियां होती हैं। जिस वजह से पोस्टमार्टम के हिसाब से मौत का जिम्मेदार भूख को नहीं, बल्कि भूख की वजह से होने वाली बीमारियों को माना जाता है। इस तकनीकी पेंच की वजह से राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन से बचने में सफल हो जाती हैं।
यह सही है कि भूख से मौत हो सकती है। भूखे रहने की अवस्था में एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में उस व्यक्ति, जिसकी भूखे रहना 'आदत' हो गयी है, की मौत जल्द होगी 
एक सामान्य व्यक्ति को लगातार भूखा रहना पड़े तो लम्बे समय, अमूमन आठ-दस हफ्तों के बाद उसे मौत आ सकती है। यहां जैन धर्म में 'सल्लेखन' द्वारा जैन मुनियों के देह-त्याग का उदाहरण प्रासंगिक होगा। 'सल्लेखन' में ये मुनि भूखे रहकर अपना देह-त्याग करते हैं। कई दिनों भूखे रहने के बाद ही उनकी आत्मा देह-त्याग कर पाती है। इसके अलावा, ऐसे कई उदाहरण हैं कि दुर्घटना के बाद मलबे में कई-कई दिन दबे रहने के बाद भी उसमें से व्यक्ति या बच्चे जीवित निकल आते हैं। लेकिन झारखंड (अन्य राज्यों में भी) में जो मौतें हुईं, वे तो चार-पांच दिन भूखे रहने के बाद ही आ गयी थीं। बस, यही वजह है कि उनकी मौतों पर 'भूख से हुई मौत' की मुहर नहीं लग पा रही है। तो क्या वास्तव में इसे भूख से होने वाली मौत नहीं माना जाना चाहिए? माना जाना चाहिए। हाल के दिनों में हुई कथित भूख से हुई मौतों को ही उदाहरण के रूप में लें। कुछ बातों को हम भले ही न मानें, लेकिन यह तो स्वीकार करना ही होगा कि इन लोगों की मौत के पीछे एक बड़ा कारण कुपोषण तो है ही। जब कोई व्यक्ति लम्बे समय तक कुपोषण का शिकार रहेगा तो जाहिर है कि उसका न्यूट्रीशन लेबल (पोषण स्तर) काफी निम्न हो जायेगा। पोषण स्तर निम्न होगा तो बीमारियों से भी ज्यादा ग्रसित होगा। इस अवस्था के बाद जब उसे कुछ दिन भूखा रह जाना पड़ेगा तो उसकी मौत भूखे रह रहे एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में शीघ्र होगी। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार नहीं करना सचाई से नजरें चुराने वाली बात होगी।
दावा स्वीकार नहीं
आज भी दुनिया में किसी बीमारी या युद्ध से ज्यादा लोगों की मौत भूख से होती है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के भूख से पीड़ितों में से एक तिहाई भारत में हैं। फिर भी देश में सबसे ज्यादा आर्थिक तंगी और संसाधन विहीन आदिवासी आबादी वाले राज्यों में से एक, झारखंड में जब भी कहीं भूख से मौत की बात होती है तो सरकारी तंत्र पूरी तेजी ये साबित करने में जुट जाता है कि मौत भूख से नहीं हुई थी। 
झारखंड में भूख से हुई कथित मौतों पर राज्य के खाद्य सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री सरयू राय भी इन्हें भूख से मौत नहीं मानते हैं। लेकिन उनके पास इस सवाल का जवाब भी नहीं है कि 'आखिर कब और किन लक्षणों को देख माना जाये कि मौत भूख से हुई'। उनके पास सिर्फ यही जवाब है कि अभी विभाग अपनी जांच कर रहा है, इसके लिए कमेटी गठित है जो बताएगी कि भूख से मौत की पुष्टि के लिए किन-किन बिंदुओं की जांच जरूरी है। 
भोजन मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार
भूख से मौत की समस्या सिर्फ हमारे देश में ही नहीं है, बल्कि यह आज पूरी दुनिया में फैली हुई है। भोजन मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस मुद्दे को सबसे पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्ऱेंकलिन रूजवेल्ट ने अपने एक व्याख्यान में उठाया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया और 1948 में आर्टिकल 25 के तहत भोजन के अधिकार के रूप में इसे मंजूर किया। साल 1976 में संयुक्त राष्ट्र परिषद ने इस अधिकार को लागू किया, जिसे आज 156 राष्ट्रों की मंज़ूरी हासिल है और कई देश इसे कानून का दर्जा भी दे रहे हैं। लेकिन तमाम कोशिशों और तमाम दावों के बावजूद लोगों को भरपेट भोजन तक नहीं मिल पा रहा है। हालत ये है कि दुनियाभर में भूख से जूझने वाले लोगों की वालों की तादाद 12 करोड़ 40 लाख हो गई। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसी के प्रमुख डेविड बीसली के मुताबिक भूख से जूझ रहे तकरीबन तीन करोड़ 20 लाख लोग चार देशों- सोमालिया, यमन, दक्षिण सूडान और उत्तर-पूर्व नाइजीरिया में हैं। दुनियाभर में भुखमरी का दंश झेल रहे 81 करोड़ 50 लाख लोगों में से 60 फीसद लोग ऐसे संघर्षरत इलाकों में रहते हैं, जहां उन्हें यह तक मालूम नहीं होता कि उन्हें अगली बार खाना कब से मिलेगा।
हर पांच सेकेंड में भूख से एक मौत
एक अन्य रिपोर्ट की मानें, तो भूख और गरीबी की वजह से रोजाना 25 हजार लोगों की मौत हो जाती है। 92.5 करोड़ लोग भूख और कुपोषण के शिकार है। 85 करोड़ 40 लाख लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है, जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूरोपियन संघ की जनसंख्या से ज्यादा है। भुखमरी के शिकार लोगों में 60 फीसद महिलाएं हैं। दुनियाभर में भुखमरी के शिकार लोगों में हर साल 40 लाख लोगों का इजाफा हो रहा है। हर पांच सेकेंड में एक बच्चा भूख से दम तोड़ता है। 18 साल से कम उम्र के तकरीबन 45 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं। विकासशील देशों में हर साल पांच साल से कम उम्र के औसतन 10 करोड़ 90 लाख बच्चे मौत का शिकार बन जाते हैं। इनमें से ज्यादातर मौतें कुपोषण और भुखमरी से जनित बीमारियों से होती हैं। कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए सालाना राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर है। 
भारत के पड़ोसी देश बेहतर
अमेरिका में नीतियां बनाने वाली संस्था आईएफपीआरआई के रिसर्च में सामने आए नतीजे चौंकाने वाले हैं। संस्था के मुताबिक, 84 देशों की सूची में भारत 67वें नंबर पर है जो एक खतरनाक संकेत है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से चार गुनी बड़ी है और उसने अपने देश में भूखे लोगों की संख्या को कम करने में बड़ी कामयाबी हासिल की है। नतीजा ये हुआ है कि चीन इस सूची में नौवें नंबर पर पहुंच गया है। 2009-10 में भारत की अर्थव्यवस्था का विकास दर 7.4 फीसदी रहा है जबकि इस साल ये दर 8.5 फीसदी रहने की उम्मीद है। चीन ने अर्थव्यवस्था के विकास के साथ ही एक तरफ कृषि क्षेत्र में सुधार किए हैं तो दूसरी तरफ उत्पादन और सेवा क्षेत्र को भी बेहतर बनाया है। इसके विपरीत भारत के विकास की कहानी मुख्य रुप से सेवा क्षेत्र के विकास पर आधारित है उसमें भी आईटी और टेलिकॉम सेवा की इसमें ज्यादा बड़ी भूमिका है। भारतीय खेती आज भी सुधार होने के इंतजार में है.
इतना ही नहीं आर्थिक मामले में पिछड़ा होने के बावजूद पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश और श्रीलंका ने अपने नागरिकों की भूख मिटाने में अच्छी सफलता पाई है। इस सूची में श्रीलंका 39वें नंबर पर है जबकि म्यांमार 50वें नंबर पर और पाकिस्तान 52वें नंबर पर। बांग्लादेश भारत से सिर्फ एक स्थान नीचे है 68वें नंबर पर।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में 77 करोड़ लोग भूख पीड़ित थे जो 2016 में बढ़कर 81 करोड़ हो गए। इसी तरह 2015 में अत्यधिक भूख पीड़ित लोगों की संख्या 8 करोड़ और 2016 में 10 करोड़ थी, वह 2017 में बढ़कर 12.4 करोड़ हो गयी है। यह आंकड़ा रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि संयुक्त राष्ट्र समेत अन्य वैश्विक संस्थाओं के पास भूखमरी से निपटने का कोई ठोस रोडमैप नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की मानें तो संवेदनहीनता के कारण भूख और कुपोषण की समस्या लगातार गहरा रही हैं। विडंबना यह है कि अगर इस पर काबू नहीं पाया गया तो 2035 तक दुनिया की आधी आबादी भूख और कुपोषण की चपेट में होगी। 
अन्न की बर्वादी में भारत आगे
भारत की ही बात करें तो अन्न बर्बाद करने के मामले में यह दुनिया के संपन्न देशों से भी आगे है। आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल उतना अन्न बर्बाद होता है जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। भारत में कुल पैदा किए जाने वाले भोज्य पदार्थ का 40 प्रतिशत बर्बाद होता है। अर्थात हर साल भारत को अन्न की बर्बादी से तकरीबन 50 हजार करोड़ रुपए की चपत लगती है। साथ ही बर्बाद भोजन को पैदा करने में 25 प्रतिशत स्वच्छ जल का इस्तेमाल होता है और साथ ही कृषि के लिए जंगलों को भी नष्ट किया जाता है। इसके अलावा बर्बाद हो रहे भोजन को उगाने में 30 करोड़ बैरल तेल की भी खपत होती है। यही नहीं बर्बाद हो रहे भोजन से जलवायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है। उसी का नतीजा है कि खाद्यान्नों में प्रोटीन और आयरन की मात्रा लगातार कम हो रही है। फिलहाल देश में खेती को सुधारने के लिए कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं चलाया जा रहा। खासतौर से सेवा और आईटी क्षेत्र के लिए जितना कुछ किया जा रहा है उसके मुकाबले तो खेती कहीं टिकती ही नहीं। 
यूनाइटेड नेशन के फूड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट से उद्घाटित हो चुका है कि सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद भारत में पिछले एक दशक में भुखमरी की समस्या में तेजी से वृद्धि हुई है। देश में आज भी 30 करोड़ लोग हर रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं जबकि सरकारी गोदामों में हर वर्ष हजारों करोड़ रुपए का अनाज सड़ जाता है। अगर गोदामों के अनाजों को गरीबों में वितरित किया जाए तो भूख और कुपोषण से निपटने में मदद मिलेगी। गौरतलब है कि विश्व बैंक ने कुपोषण की तुलना 'ब्लैक डेथ' नामक उस महामारी से की है जिसने 18वीं सदी में यूरोप की जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। विश्व बैंक के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में कुपोषण की दर लगभग 55 प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीका में यह 27 प्रतिशत के आसपास है।
119 देशों में भारत सौवां
अक्टूबर 2017 में जारी इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 119 देशों में भारत का 100वां स्थान था। एक स्वतंत्र एजेंसी की यूएन को सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 25 लाख मौतें भूख या इससे जुड़ी बीमारियों से होती हैं, मगर रिकॉर्ड पर ये भूख से मौत के रूप में दर्ज नहीं होती। यह एक कड़वी सचाई है कि हमारे देश में आजादी के बाद से अब तक गरीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गयीं, लेकिन लाल फीताशाही की वजह से वे महज़ कागजों तक ही सिमट कर रह गईं। एक तरफ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है, तो दूसरी तरफ भूख से लोग मर रहे होते हैं। ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है? भुखमरी के स्थायी समाधान के लिए लोगों को रोजगार मुहैया कराना होगा। प्रसिद्ध शायर दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां प्रासंगिक हैं : 
कई फाके बिताकर मर गया जो, उसके बारे में, 
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा।