जब जागो तभी सवेरा

2018-12-10

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-प्रमोद जायसवाल

image

image

'जल, जंगल व जमीन' का नारा झारखंड की अस्मिता से जुड़ा हुआ है। सच पूछा जाये तो यह नारा पूरे देश का नारा होना चाहिए। क्योंकि ये सिर्फ तीन शब्द नहीं, बल्कि हमारे जीवन से जुड़े प्रमुख स्रोत हैं। देर से ही सही झारखंड सरकार जागी है और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बेहतर पहल की है। राज्य के 24 जिलों के 24 नदियों को नवजीवन देने के लिए इनके 140 किलोमीटर लम्बे किनारों पर करीब ढाई करोड़ पेड़ लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। इस वृक्षारोपण अभियान में सरकार के सभी एजेंसियों और अन्य गैर सरकारी संगठनों को भी लगाया गया है। मुख्यमंत्री ने अपील की है कि इतना बड़ा अभियान बिना किसी जन भागीदारी के पूरा नहीं हो सकेगा। इसलिए सबको साथ देना चाहिए। रांची के नामुकम में स्वर्णरेखा के तट पर मुख्यमंत्री ने आम का पौधा लगाकर इसकी शुरुआत की है। इस अवसर पर उन्होंने पेड़ लगाने के फायदे भी गिनाये। उन्होंने कहा कि नदियों के किनारे ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने से भूमि का कटाव रुकेगा। वृक्षों को पानी भी मिलता रहेगा। वनों से काफी लाभ है। विज्ञान और अध्यात्म दोनों में पेड़ का महत्व है। आर्थिक दृष्टिकोण से भी पेड़ का महत्व है। साल, सागवान, टीक आदि के पेड़ लगाकर भविष्य में होने वाले खर्च के लिए राशि सुरक्षित कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले साल 19,700 हेक्टेयर भूमि पर 2.75 करोड़ पौधे लगाये गये और 4600 हेक्टेयर प्राकृतिक वनों का पुनरुद्धार किया गया। इस वर्ष वन विभाग द्वारा कुल 2.40 करोड़ पौधे लगाए जाएंगे। प्राकृतिक वनों का पुनरुद्धार भी 35000 हेक्टेयर करने का लक्ष्य है। इनमें 70 लाख वृक्ष की ऐसी प्रजातियां रहेंगी, जो वनों में प्राकृतिक रूप से पायी जाती हैं। जिन पर स्थानीय लोगों की निर्भरता है। इसे योजना के 750 से ज्यादा गांवों को सीधे जोड़ा जाएगा।
हम सभी जानते हैं कि देश की सबसे लम्बी और पवित्र नदी झारखंड से भी होकर गुजरती है। इस अभियान के तहत साहेबगंज में गंगा के तट पर सबसे अधिक वृक्ष लगाने का लक्ष्य है। झारखंड में गंगा तट पर 2 लाख 36 हजार पेड़ों को लगाने का लक्ष्य रखा गया है। 
सरकार का यह अभियान जोर-शोर से शुरू हुआ है। वन एवं पर्यावरण विभाग के जिम्मे इस बड़े अभियान को पूरा करने की जिम्मेवारी है। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सरकारी और निजी स्कूलों के बच्चे भी शामिल हुए। स्कूली बच्चों को इस अभियान में शामिल करना एक अच्छी सोच है। क्योंकि एक अच्छी परम्परा की नींव उनके शुरुआती दौर में ही पड़ जायेगी। स्कूली बच्चों को सलाह भी दी गयी कि वे अपने-अपने जन्मदिन के मौके पर एक वृक्ष अवश्य लगायें। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति से अपेक्षा की गयी है कि वे 5-5 पेड़ अवश्य लगायेंगे। 
लोगों को वृक्षरोपण से जोड़ने के लिए मुख्यमंत्री जन वन योजना के तहत पौधों के लिए अनुदान की राशि भी निर्धारित की गयी है। पहले की तुलना में इस राशि को 50 फीसदी से बढ़ाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया है। वर्ष 2019 में विभाग 16,000 हेक्टेयर में कुल 2.50 करोड़ पौधे लगाएगा। हाथियों से संवेदनशील 14 वन प्रमंडलों में लगभग 6000 हेक्टेयर उजड़े बांस के जंगलों का पुनरुद्धार किया जाएगा। वनों को बचाने के लिए जन भागीदारी जरूरी है। इसके लिए वन विभाग द्वारा वनों के समीप स्थित 5000 ग्रामों में सहभागी वन प्रबंधन के तहत माइक्रोप्लान बनाने के लिए ग्राम वन समितियों को सहायता दी जा रही है। ग्रामीण महिलाओं के छोटे समूहों द्वारा आसानी से चलाये जा सकने वाले लघु वन पदार्थों के प्रसंस्करण के लिए छोटे-छोटे उद्योग स्थापित करने में ग्राम वन समितियों को सहायता दी जा रही है। इसमें बांस, इमली, चिरौंजी, कुसुम, बीज आदि पर आधारित कुटीर लघु उद्योग होंगे।

नदी                           पौधों की संख्या
गंगा नदी, साहेबगंज         236000
बराकर, जामताड़ा         30000
मयूराक्षी, दुमका                 30000
गेरुआ, गोड्डा                 30000
बांस लोई, पाकुड़                 30000
अजय, देवघर                 48000
सकरी, कोडरमा                 500
केवट, हजारीबाग         30000
खेड़ुआ, हजारीबाग         18000
पुरैनी, बासा व हेरु, चतरा 30000
स्वर्णरेखा, गोला, रामगढ़ 18000
उसरी, गिरिडीह                  21000
गरगा, बोकारो                  30000
बराकर, दामोदर, धनबाद  64000
स्वर्णरेखा, जमशेदपुर          72000
रोरो, चाईबासा                  17520
स्वर्णरेखा, रांची                  42000
कांची, खूंटी                  500
पालमाड़ा, सिमडेगा          18000
कांस, नागफनी, गुमला  6000
शंख, लोहरदगा                  30000
औरंगा, लातेहार                  30000
दानरो, गढ़वा                  30000
उत्तरी कोयला, मेदनीनगर 30000

पूर्व की योजनाओं की तरह न हो हश्र
वर्तमान की झारखंड सरकार की सोच कितनी सार्थक है, यह तो आने वाला वक्त बतायेगा। ऐसा खयाल मन में इसलिए आ रहा है क्योंकि झारखंड सरकार पहले भी 'जन-वन योजना', 'हरमू नदी सौंदर्यीकरण' जैसी योजनाएं पहले भी ला चुकी है। ये योजनाएं काफी चर्चित भी रही हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि राज्य में पौधरोपण से जुड़ीं इन योजनाओं का हाल खस्ता है। मुख्यमंत्री रघुवर दास और नगर विकास मंत्री सीपी सिंह ने संयुक्त रूप से हरमू नदी के सौंदर्यीकरण कार्य का शिलान्यास 15 मार्च 2015 को किया था। इसके तहत नदी के किनारे फूल-पौधे और सोलर लाइट लगाने की योजना काफी चर्चित रही थी। इस योजना के तहत नदी सौंदर्यीकरण के लिए चारों तरफ हरे-भरे पौधे लगाये जाने थे। योजना के तहत कई पौधे लगाये भी गये, लेकिन पौधों की सही देखभाल नहीं हो पाने के कारण या तो सभी पौधे सूख गये हैं या टूटकर गिर गये हैं। दूसरी ओर योजना के कार्य में लगे जुडको के अधिकारी इस दुर्दशा का दोष आसपास रहनेवाले लोगों पर ही थोप रहे हैं।
इससे पहले मुख्यमंत्री जन-वन योजना की शुरुआत सीएम रघुवर दास ने वर्ष 2015 के नवंबर में किया था। हालांकि, योजना का विधिवत कार्यान्वयन वित्तीय वर्ष 2016-17 में  हुआ। आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान पूरे वर्ष में कुल 3,33,030 पौधे लगाये गये। वर्ष 2017-18 में यह आंकड़ा घटकर आधे से भी कम 1,40,269 पर पहुंच गया। योजना का यह हश्र देखते हुए वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग को प्रोत्साहन राशि 75 फीसद तक बढ़ाने का प्रस्ताव दिया गया जिसे सरकार ने अपनी मंजूरी दे दी थी।