बीहड़ में बांसुरी की तान

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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फूस की झोपड़ी, दस बाई आठ का एक कमरा और बेहद तंग औसारा. इसी में दो पत्नियां, पांच बेटे, तीन बहुएं तो रहते ही हैं, फिर सांझ ढलते ही वहां बकरी-बैलों भी बंध जाते हैं। हर रोज का यह दृश्य लाली पंचायत के हेसो गांव के अंतर्गत भुनेश्वर मुंडा के घर का रहता है. रांची के नामकुम प्रखंड का यह गांव घने जंगलों से घिरा पड़ा है और इसकी मद-मस्त शाम भुनेश्वर मुंडा की बांसुरी की धुन में समाई रहती है. बांसुरी बजते ही इस बीहड़ में भीड़ उमड़ आती है. बांसुरी की मधुर धुन पर पशु उमंग के साथ अंगड़ाई लेते लगते हैं, तो पक्षी चहचहाने.
भुनेश्वर ठेठ और पौराणिक झारखंडी गीतों को अपनी बांसुरी में पिरो देते हैं. राग और धुन ऐसी निकालते हैं कि मानों बस झारखंडी संस्कृति के गीत ही सुन रहे हों. यही वजह है कि लोक कलाकार पद्मश्री मुकुंद नायक भी भुनेश्वर की प्रंशसा करने में नहीं कतराते हैं। 54 वर्षीय भुनेश्वर कहते हैं कि 35 सालों से गाने-बजाने के बाद भी लोग उन्हें लोक कलाकार के रूप में जान-पहचान नहीं सके हैं. इसी हसरत को लिए वह जी रहे हैं कि लोग एक लोक कलाकार के रूप में उन्हें जान पायेंगे. परिवार में भुनेश्वर मुंडा की दो पत्नियां, पांच बेटे और दो बेटियां हैं. दोनों बेटी और तीन बेटों की शादी हो चुकी हैं. परिवार की आजीविका का मुख्य स्रोत मजदूरी है.
बिरसा, बांसुरी और बालिका
भारतीय संस्कृति में बांस-बांसुरी का इतिहास लगभग चार हजार वर्ष पुराना बताया जाता है. इतिहासकार कहते हैं, बांसुरी यानी प्रेम भाव. यह एक ऐसा वाद्य-यंत्र है जिसमें कई प्रेम कहानियां छुपी हैं. कहा जाता है कि कृष्ण को शिव ने सर्वेश्रेष्ठ उपहार के रूप में बांसुरी ही भेंट की थी. कृष्णा तीन तरह की बांसुरी रखते थे और बजाते थे. मुरली, वेणु और वंशी. इससे वे अलग अलग राग में राधारानी, पेड़-पौधों और जानवरों को अपनी ओर आकर्षित किया करते थे.
आदिवासी सांस्कृति के जानकार और लेखक अश्विनी पंकज कहते हैं कि झारखंड में बांसुरी यहां का सामाजिक-सांस्कृतिक हिस्सा रहा है. पर्व-त्यौहारों में जनजतीय और आदिवासी गीतों की धुन पर बांसुरी की आवाज मंत्रमुग्ध कर देती है. वे भुनेश्वर मुंडा की बांसुरी की धुन को भी इसी कड़ी में देखते हैं. अश्विनी पंकज कहते हैं, “भुनेश्वर की तरह ही ग्रामीणों में कई और अच्छे बांसुरी वादक हैं, लेकिन ऐसे लोग सीमित हैं, जिन्हें खोजने और आगे बढ़ाने की जरूरत है. रांची के ही लालू शंकर, मनदखन बड़ाइक, सिसाई के रामेश्वर मिंज जैसे अच्छे बांसुरी वादकों की भी स्थिति से समझा जा सकता। ये सभी कई गीतों की धुन पर बांसुरी बजाने में महारत रखते हैं.” 
बताया जाता है कि बिरसा मुंडा भी बेहतरीन बांसुरी बजाया करते थे. उनकी बांसुरी की धुन के किस्से बहुत मशहूर हैं.  “बिरसा मुंडा और उनके आंदोलन’ में सुरेश सिंह लिखा हैं कि बिरसा बांसुरी से कई राग और धुन निकाला करते थे. उनकी बांसुरी की आवाज में एक अजीब-सा जादू था. लड़कियां उनकी बांसुरी की धुन सुन उनपर जान छिड़कती थीं और उनसे विवाह करने को कहतीं. बिरसा ने ये सब देख अंत में बांसुरी बजाना छोड़ दिया था.
यही वो बात है जो भुनेश्वर मुंडा को बिरसा मुंडा से जोड़ती है. भुनेश्वर कहते हैं कि जमुना देवी नाम की एक लड़की उनसे प्यार करती थी. लेकिन जमुना को भुनेश्वर से कहीं ज्यादा उसकी बांसुरी की धुन से प्यार था. भुनेश्वर बताते हैं, “हालांकि मेरा भी जमुना देवी से धीरे-धीरे लगाव बढ़ता गया. परिवार वालों के कहने पर 1987-88 में मैंने पहली शादी संजौती देवी से की, पर एक साल के बाद जमुना से भी विवाह कर लिया.
रामदयाल मुंडा की बांसुरी ने किया प्रेरित
भुनेश्वर मुंडा कहते हैं कि बचपन में ही पर्व-त्यौहारों में बजने वाले पारंपारिक गीतों में वे हिस्सा लिया करते थे. उम्र दस साल की थी और सन् 1977 का था जब पहली बार भुनेश्वर ने बांसुरी खरीदी और खुद से ही बजाना शुरू किया. लेकिन इससे पहले स्वार्गीय रामदयाल डॉ दयाल मुंडा को बांसुरी बजाते देख-सुन ही धीरे-धीरे उन्होंने धुन निकालनी शुरू की. वे 1985 तक सरहुल, जदूर, गेना, मागे और कर्मा जैसे आदिवासी और जनजतीय गीतों की बेहतरीन धुन बांसुरी से निकालने लगे. कई मौकों पर रामदयाल मुंडा ने उनकी बांसुरी की प्रशंसा भी की. गाहे-बगाहे उन्हें कार्यक्रमों के लिए रांची और टाटा तक से आमंत्रण आते. रांची में सरहुल के मौके पर भुनेश्वर ने बतौर बांसुरी वादक प्रदर्शन किया, जिसकी तारीफ पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरन तक ने की. जबकि भुनेश्वर मुंडा बताते हैं कि हर साल बिरसा मुंडा के जन्मदिन पर जमशेदपुर के कदमा में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में बांसुरी बजाते हैं. इसके अलावा भुनेश्वर मुंडा केनरा पर भी इन्हीं गीतों की धुन निकाल लेते हैं. सामाजिक सेविका आलोका कहती हैं कि भुनेश्वर मुंडा के अंदर लोक गायक वाली प्रतिभा है. उन्हें आगे लाने के लिए सामाजिक संस्थाओं को आगे आना चाहिए.
पहचान नहीं मिलने का मलाल
झारखंडी लोक गायक प्रायः किसी सामाजिक या सांस्कृतिक संस्था से जुड़े होते हैं. इन्हें सरकार की तरफ से बीच-बीच में सहयोग राशि या मानदेय भी दिया जाता है और इनकी पहचान लोक कलाकार के रूप में होती है. भुनेश्वर मुंडा को इसी बात का मलाल है कि 30-35 वर्षों में भी उन्हें न तो लोक कलाकार के रूप में पहचान मिल पायी और न ही उन्हें किसी ने यह पहचान दिलाने में उनकी मदद की. भुनेश्वर की बांसुरी से मुकुंद नायक जैसे बड़े लोक गायक भी प्रभावित हुए हैं. बांसुरी की धुन सुन भुनेश्वर की काफी प्रशंसा भी उन्होंने की है. मुंकुद नायक कहते हैं, “इनकी बांसुरी की आवाज गांव-कस्बों में त्यौहार के मौके पर बजने वाले पौराणिक गीत-संगीत की तरह ही है. हमें ऐसा लगता है कि भुनेश्वर मुंडा को इसी तरह से बांसुरी बजाते रहना चाहिए ताकि आने वालों दिनों में इनकी पहचान अन्य राज्यों तक भी जा फैले.”
पूरी बातचीत के दौरान मजदूरी और थोड़ा बहुत खेती कर अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले भुनेश्वर मुंडा का चेहरा यह एहसास करा जाता है कि वह कभी-कभार शहरों में अपनी बांसुरी की धुन से लोगों का दिल जीत तो लेते हैं, लेकिन एक लोक कालाकार के रूप में नहीं. बल्कि उनकी पहचान आज भी जंगलों और पहाड़ों तक ही सिमटी है.