झारखंड में निष्क्रिय है अल्पसंख्यकों की संवैधानिक संस्था

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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मांग और आंदोलन के बाद राज्य में अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम का 2012 में गठन तो हो गया, लेकिन अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए सरकार एक रुपये तक की राशि भी नहीं ला पायी है. झारखंड अल्पसंख्यक आयोग को बंगाल और राष्ट्रीय आयोग की तर्ज पर सुनवाई एवं कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं है. वहीं बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 के नियमानुसार उर्दू एकेडमी और मदरसा बोर्ड का गठन अब तक नहीं हो सका है. जबकि अन्य राज्यों की तर्ज पर अल्पसंख्यक मामलों के क्रियान्वयन और निपटारे लिए अल्पसंख्यक निदेशालय का गठन भी नहीं हो पाया है.
ये हाल झारखंड में अल्पसंख्यकों से जुड़ी संवैधानिक संस्था का है. अल्पसंख्यकों के प्रति इस उदासीनता के लिए 18 वर्षों में कमोबेश सभी सरकारें जिम्मेदार हैं. अल्पसंख्यक मामलों के जानकार और आमया के अध्यक्ष एस अली कहते हैं-  “मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 20 अगस्त 2016 को रांची के प्रोजक्ट भवन में राज्य के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी. उनकी समस्याओं को हल और उनके विकास को लेकर आश्वस्त किया था. तब मुसलमानों में ‘सबका साथ सबका विकास’ जैसे नारों को लेकर उम्मीद जगी थी, लेकिन बीते 18 महीनों में तस्वीर बदलने के बजाय और बिगड़ी है.” अली कहते हैं कि उन्हें आज भी सूबे के मुखिया से उम्मीद है कि राज्य में अल्पसंख्यकों का विकास होगा. नियमतः किसी भी संवैधानिक आयोग, समिति या बोर्ड की मियाद समाप्त होने से पहले ही उसके पुनर्गठन को लेकर प्रक्रिया शुरू होती है, ताकि ससमय पुनर्गठन हो जाये, लेकिन झारखंड में ऐसा कुछ भी होता नहीं दिख रहा है.
संपत्ति पर है अवैध कब्जा
झारखंड सुन्नी वक्फ बोर्ड निष्क्रिय है. राज्य के गठन के आठ साल बाद  2008 में वक्फ बोर्ड का गठन हुआ. नियमानुसार पांच साल के कार्यकाल के बाद इसका पुनर्गठन होना चाहिए था, लेकिन डेढ़ वर्ष के विलंब के बाद 2014 में बोर्ड का पुनर्गठन किया गया, लेकिन बोर्ड गठन के चार साल बीते जाने के बाद भी अध्यक्ष का चयन नहीं हो सका है. नतीजा राज्य में करीब एक अरब रुपये की वक्फ जायदाद अवैध कब्जे और अतिक्रमण की जद में है.
वक्फ बोर्ड के लीगल एडवाइजर शोएब रजा बताते हैं कि प्रावधान के तहत गठन के बाद से आज तक वक्फ बोर्ड को स्थाई सीईओ और कार्यलय नहीं मिल पाया है. बोर्ड रांची के आड्रे हाउस में 11 पद की स्वीकृति के बावजूद दो कमरे में दो ही कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है. चार विभागों के इंचार्ज मोईनुद्दीन खान वक्फ बोर्ड में अतिरिक्त पदभार पर है, जो बोर्ड को समुचित समय नहीं पाते हैं. शोएब रजा ने कहा कि वक्फ सम्पत्ति पर अतिक्रमण और अवैध कब्जे की शिकायत तो आती है,  लेकिन चेयरमैन नहीं होने के कारण कोई सुनवाई नहीं हो पाती है. इस वजह से राज्य में वक्फ की सम्पत्ति पर अतिक्रमण और अवैध कब्जा बढ़ता ही जा रहा है.
इधर वक्फ बोर्ड के सदस्य मौलाना तहजीबुहल हसन ने कहा है कि राज्य की करोड़ों रुपये की सम्पत्ति पर सरकार का ही अवैध कब्जा है. क्योंकि मामला सरकार का है इसलिए वक्फ बोर्ड के अधिकारी इस पर कुछ नहीं बोलते हैं. मौलाना ने कहा एक उदाहरण पलामू जिले की जपला सीमेंट फैक्ट्री का भी है,  जहां सौ से भी अधिक एकड़ जमीन पर कब्जा है. इस जमीन को लेकर मामला कोर्ट में भी है. इसके पूरे कागजात हैं और ये प्रॉपर्टी संयुक्त बिहार में वक्फ के नाम से रजिस्टर्ड है.
प्रॉपर्टी की फाइलें बोर्ड के पास नहीं
करीम मेंशन साकची, ईदगाह कब्रिस्तान धतकीडीह, जामा मस्जिद जुगसलाई, जामा मस्जिद चक्रधरपुर (जमशेदपुर), गिरिडीह का कादरिया मुसाफिर खाना, मस्जिद मदरसा (गिरिडीह), चिमनी शाह की दरगाह (धनबाद), हजरत मुरादशाह की मजारशरीफ और टाउन मस्जिद (हजारीबाग), जामा मस्जिद पलामू (पलामू), जामा मस्जिद (पाकुड़), ईदगाह मजार मखदूम शाह जहानिया (देवघर) के अलावा ऐसे ही कई और वक्फ संपत्ति का ब्यौरा झारखंड वक्फ बोर्ड के पास नहीं है. जबकि ये संपत्ति संयुक्त बिहार में वक्फ के नाम से रजिस्टर्ड है. वर्तमान में झारखंड वक्फ बोर्ड में 152 रजिस्टर्ड सम्पत्ति है, जबकि 11 सम्पत्ति रजिस्टर्ड नहीं हो सकी हैं. इसपर बोर्ड के लीगल एडवाइजर शोएब रजा का कहना है कि इनमें से कुछ प्रॉपर्टी के कागजात बिहार वक्फ बोर्ड से लाये जा चुके हैं. जबकि बाकी जांच कर लाये जायेंगे. वहीं अल्पसंख्यक मामलों के जानकार एस अली कहते हैं कि इनमें से अधिकतर जायदाद पर कब्जा हो चुका है.
800 करोड़ की राशि लैप्स
एनएमडीएफसी यानी अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम, इसका गठन कम्पनी एक्ट 1956 के तहत 30 सितंबर 1994 में हुआ. इसी के तहत विभिन्न राज्यों ने इसका गठन किया गया, लेकिन झारखंड में 12 साल के विलम्ब से इसका गठन हुआ. निगम का कार्य अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को स्वावलंबी बनाने हेतु व्यवसाय और तकनीकी शिक्षा के लिए न्यूनतम दर पर लोन उपलब्ध कराना है. राज्य अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम, अल्पसंख्यक आबादी और जरूरत के अनुसार ऋण राशि के लिए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम को हर साल बजट प्रस्ताव भेजता है, पर झारखंड में इसके गठन के बाद भी अल्पसंख्यकों को इसका लाभ नहीं मिल सका. राज्य में एनएमडीएफसी का गठन 2012 में हुआ, लेकिन बीते छह सालों में एक रुपये की राशि भी नहीं आ सकी. जबकि झारखंड के पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल को 2017-18 में एनएमडीएफसी के तहत 200 करोड़ रुपये की राशि मिली है.
झारखंड अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ शाहिद अख्तर का कहना है कि एनएमडीएफसी की ऋण प्रक्रिया प्रारंभ करने के लिए उन्होंने सीएम को पत्र तक लिखा. विभागीय मंत्री,  नेशनल और स्टेट एनएमडीएफसी के एमडी के साथ कई बार बैठकें कीं. हर बार आश्वस्त किया गया, लेकिन वैसी कोशिश नहीं की गई, जैसी मुझे उम्मीद थी. डॉ अख्तर के मुताबिक हर साल राज्य न्यूनतम 50 करोड़ की राशि से वंचित रहा. अल्पसंख्यक समुदाय के हक का अनुमानित 800 करोड़ रुपया लापरवाही और अनदेखी की वजह से लैप्स हो गया.
गौरतलब है कि 2011 जनगणना के अनुसार राज्य में 3.25 करोड़ की जनसंख्या में अल्पसंख्य समुदाय की आबादी 63 लाख बताई जाती है. अल्पसंख्यकों में सबसे अधिक 47 लाख मुस्लिम हैं, जिनमें 45 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं.
कई बार मांगने पर भी नहीं दिया सरकार ने जीजी लेटर : सीएमडी
राष्ट्रीय अल्पसंख्य वित्त एवं विकास निगम के सीएमडी मोहम्मद शहबाज अली ने कहा कि झारखंड को राशि आवंटित करने हेतु कई बार सरकार से गवर्नमेंट गारंटी (जीजी) लेटर मांगा गया, लेकिन अभी तक सरकार ने लेटर नहीं दिया है. ऋण की राशि आवंटित करने से पहले राज्य सरकार को जेनरल लोन एग्रीमेंट करना होता है, जो कि किया जा चुका है, लेकिन जीजी लेटर अब तक नहीं दिया गया. उन्होंने कहा कि लेटर क्यों नहीं दिया जा रहा है, इस बाबत अलगे महीने रांची जाकर अधिकारियों से बात करूंगा.
सरकार घोर उदासीन
जुलाई 2001 को झारखंड स्टेट हज कमेटी का गठन हुआ, जिसके अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा बने थे. 2008 में इसका पुनर्गठन हुआ. अध्यक्ष पूर्व अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हाजी हुसैन अंसारी बनते हैं. 2011 में इसका फिर पुनर्गठन होना चाहिए था, परंतु 2014 तक हाजी हुसैन अंसारी अध्यक्ष बने रहे. लगभग एक साल के विलंब के बाद अक्टूबर 2015 में कमेटी का पुनर्गठन हुआ. जिसके अध्यक्ष हाजी मंजूर अहमद अंसारी चुने जाते हैं. वर्तमान में पिछले सात महीने से कमेटी का पुनर्गठन नहीं हुआ. हज कमेटी के कार्यपालक पदाधिकारी परवेज इब्राहिमी का मानना है कि कमेटी के न रहने पर परेशानी तो हो रही है, लेकिन आजमीनों की रवानगी में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होगी.
वहीं, कमेटी के पूर्व सदस्य खुर्शीद हसन रूमी कहते हैं कि झारखंड में ही ये मुमकिन है कि स्टेट हज कमेटी बिना पुनर्गठन, बिना स्थाई कार्यालय और बिना पदाधिकारी के चल सकता है. क्योंकि यहां की सरकार अल्पसंख्यकों के प्रति घोर उदासीन है. मरहबा ह्यूमन सोसाइटी के महासचिव एवं हज सेवक नेहाल अहमद ने कहा कि आजमीनों को कमेटी के न रहने के कारण हज ट्रेनिंग के दौरान काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है.

आयोग सिर्फ सिफारिश तक सीमित
झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग को,  राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक के तर्ज पर न्याधिक अधिकार देने मांग होती रही है. इस बाबत आयोग के चेयरमैन रहते हुए डॉ शाहिद अख्तर ने मुख्यमंत्री और केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय को पत्र भी लिखा. शाहिद अख्तर का कहना है कि आयोग को सुनवाई और कार्रवाई करने को अधिकार होना चाहिए, ताकि अल्पंसख्यक से जुड़े मामलों का निपटरा हो सके. उन्होंने कहा कि झारखंड में आयोग का काम सिर्फ सरकार से सिफारिश करने तक ही सीमित है.
इधर, तीन साल के कार्यकाल वाले झारखंड अल्पसंख्यक आयोग के पुनर्गठन को लेकर विलंब मसला हमेशा से चस्पा रहा. पहली बार आयोग का गठन तीन नवम्बर 2001 में किया गया. अध्यक्ष कमाल हुए. दूसरा पुनर्गठन 3 दिसंबर 2004 को हुआ, जिसके अध्यक्ष निर्मल चटर्जी बने, लेकिन फिर आयोग का पुनर्गठन 14 महीने के विलंब के बाद 24 फरवरी 2009 को हुआ. अध्यक्ष गुलफाम मोजीबी हुए. चौथी बार पुनर्गठन में एक साल बाद के 9 जनवरी 2013 को हुआ और अध्यक्ष डॉ शाहिद अख्तर बनाए गए. आयोग का पांचवां पुनर्गठन भी 14 माह विलंब के बाद 18 अप्रैल 2017 को हुआ और एक बार फिर कमाल खान को अध्यक्ष बनाया गया.
अल्पसंख्यक योजनाएं धरातल पर नहीं
झारखंड में अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए अधिकतर स्कीम और योजनाएं केंद्र सरकार की ही संचालित हो रही हैं. इसमें मल्टी सेक्टोरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (एमएसडीपी), इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट मइनॉरटी इंस्टिट्यूशन (आईडीएमआई), नई रौशनी, सीखो-कमाओ जैसी कई महत्वपूर्ण योजनाएं हैं. इन सभी योजनाओं को सच्चर कमेटी की सिफारिश के बाद 11 एवं 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत लागू किया गया था. झारखंड में इस योजनाएं की वस्तुस्थिति पर एस अली कहना हैं कि केंद्र सरकार की अधिकतर योजनाएं झारखंड में लागू ही नहीं हुई हैं. जो हुई हैं, वो धरातल पर नहीं उतरीं. वे कहते हैं कि इस राज्य का दुर्भाग्य कहें या यहां के अल्पसंख्यकों का कि झारखंड में न्यू प्रधानमंत्री 15 सूत्री कार्यक्रम के तहत अन्य योजनाओं एवं स्कीमों के लाभ से भी वे वंचित हैं. 2009 से इसके तहत सरकार को गैर अल्पसंख्यक योजनाओं का भी 15 प्रतिशत लाभ अल्पसंख्यकों देना था, जिसकी प्रतिवर्ष समीक्षा रिपोर्ट के माध्यम से सरकार को सुनिश्चित करना होता है, लेकिन आज तक इसकी समीक्षा नहीं हुई. आरटीआई से मांगी गई सूचना में  कहा गया कि योजना विभाग से मांगी जा रही है.
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता रतन तिर्की कहते हैं कि सरकार अल्पसंख्यकों से संबंधित स्कीमों और योजनाओं का केंद्र सरकार या अपने विभाग को यूटिलाइजेशन रिपोर्ट नहीं सौपती है, जिससे पता नहीं चल पाता है कि योजनाओं की राशि खर्च हो पाई या नहीं.
अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय हो रहा है : रतन तिर्की
सामाजिक कार्यकर्ता व आदिवासी जनजातीय परामर्श परिषद के सदस्य रतन तिर्की कहते हैं कि अल्पसंख्यकों को राज्य और केंद्र दोनों ही सरकार नजरअंदाज कर रही है, जो देश हित में नहीं. झारखंड में जिस तरह से अल्पसंख्यकों से जुड़ी संस्था को ठप रखा जा रहा, इससे सरकार की नीयत पर सवाल उठता है. अल्पसंख्यक के लिए योजनाओं की पर्याप्त राशि के बावजूद विकास क्यों नहीं हो पा रहा है. केंद्र जो पैसा देता है, राज्य सरकार उसके इस्तेमाल का ब्यौरा केंद्र सरकार को जानबूझ कर नहीं देती है, ताकि अगली बार राशि आवंटित ही नहीं हो. ये अन्याय है. 
काम प्रोसेस में है : मंत्री
झारखंड अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री लुईस मरांडी राज्य में ठप पड़ी अल्पसंख्यक संस्था के मसले पर एक ही बात कहती हैं कि काम प्रोसेस में है. सरकार की नीयत सबका साथ, सबका विकास करने की है. अन्य प्रश्नों के जवाब मंत्री लुईस मरांडी का जवाब रहता है कि कार्यालय आकर पूछे. वहीं सूत्रों की माने तो कल्याण विभाग ने हज कमेटी की फाइल सीएम कार्यालय को बढ़ा दी है.