'धीमे जहर' का क्या है इलाज?

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-परम

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भारत में 17वीं सदी में पुर्तगाल के लोगों ने तम्बाकू से दुनिया का परिचित कराया था। 1776 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने नकदी फसल के तौर पर इसे उगाना शुरू किया था और इसे घरेलू उपभोग और विदेशी व्यापार के लिए इस्तेमाल किया जाता था। आज भारत में करीब 0.24 फीसदी या 4.93 हैक्टेयर कृषि योग्य भूमि पर तम्बाकू का उत्पादन किया जाता है। भारत के 15 राज्यों में कम से कम 10 प्रकार की तम्बाकू बोई जाती है और इसका उत्पादन किया जाता है। देश में एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक फसल होने के कारण इसे 'स्वर्णिम पत्ती' भी कहा जाता है। लाभ की दृष्टि से तम्बाकू की फसल को 'स्वर्णिम पत्ती' कहना तो एक हद तक ठीक है। लेकिन विनाश तो इसके उपयोग के बाद शुरू होता हो। इसका उपयोग करने के बाद व्यक्ति का काल किसी भी सूरत में 'स्वर्णिम' नहीं रह जाता। 
एक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नागरिकों को शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रखे। एक स्वस्थ व समृद्ध राष्ट्र के निर्माण के लिए उसके नागरिकों का शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है। पर यह तभी संभव है जब राज्य अपने नागरिकों को उचित स्वास्थ्य उपलब्ध कराने के लिए नशाखोरी पर लगाम कसेगा। स्वास्थ्य के लिए सर्वाधिक रूप से शराब और तंबाकू उत्पाद ही जिम्मेदार हैं और इसके सेवन से हर वर्ष लाखों लोग मौत की भेंट चढ़ जाते हैं।
विडंबना यह है कि तंबाकू उत्पादों का सर्वाधिक उपयोग युवाओं द्वारा किया जा रहा है और उसका दुष्प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। गत वर्ष भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक सर्वेक्षण से खुलासा हुआ कि कम उम्र के बच्चे धूम्रपान की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 70 फीसद छात्र और 80 फीसद छात्राएं 15 साल से कम उम्र में ही नशीले उत्पादों मसलन पान मसाला, सिगरेट, बीड़ी और खैनी का सेवन शुरू कर देते हैं। 
2015-16 में एक रिपोर्ट आयी थी कि पिछले दशक की तुलना में भारतीयों ने तंबाकू का सेवन कुछ कम किया है। लेकिन नवीनतम राष्ट्रीय स्वास्थ्य डेटा बतलाता है कि भारत की तुलना में केवल चीन ही ऐसा देश है, जो तंबाकू का उत्पादन और खपत अधिक करता है। भारत में तंबाकू की खपत भारत के छह पूर्वोत्तर राज्यों- मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा और असम में सबसे अधिक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण वर्ष 2015-16 (एनएफएचएस -4) के आंकड़ों के मुताबिक यहां औसतन 70.7 फीसदी पुरुष किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से 26 प्रतिशत अधिक है।
उत्तर-पूर्व राज्यों की सूची में सबसे ऊपर मिजोरम है। मिजोरम में 15 से 49 साल के बीच के 80.4 फीसदी पुरुष और 59.2% महिलाएं तंबाकू का सेवन करती हैं। तंबाकू का सेवन करने वाले पुरुषों की रैंकिंग में 72.2 फीसदी के साथ मेघालय दूसरे, 70.6 फीसदी के साथ मणिपुर तीसरे, 69.4 फीसदी के साथ नगालैंड चौथे, 67.8 फीसदी के साथ त्रिपुरा पांचवें और 63.9 फीसदी के साथ असम छठे स्थान पर है। मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में औसतन 37.7 फीसदी महिलाएं तम्बाकू का सेवन करती हैं। जबकि इस संबंध में राष्ट्रीय औसत 6.8 फीसदी है।
झारखंड की आधी आबादी को तम्बाकू की लत
झारखंड राज्य के स्वास्थ्य विभाग द्वारा किया गया एक अध्ययन बताता है कि झारखंड में 50 फीसदी से ज्यादा वयस्क तंबाकू का सेवन करते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के 50.10 फीसदी लोग किसी ना किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। जो कि औसत राष्ट्रीय औसत यानी 28.6 फीसद से लगभग दो गुना है। अध्ययन में यह बात भी निकलकर सामने आयी है कि राज्य में तंबाकू का सेवन करने वालों में 47.9 फीसद लोग चबाने वाले तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं। झारखंड में किसी ना किसी रूप में तंबाकू का इस्तेमाल करनेवालों में 63.6 फीसद पुरुष और 35.9 फीसद महिलाएं हैं। बीते वर्षों की तुलना में अध्ययन से यह बात भी सामने आयी है कि पुरुषों में इसके सेवन की दर घट रही है, जबकि महिलाओं में बढ़ रही है।
झारखंड में तम्बाकू सेवन करने वालो की संख्या घटने का दावा
झारखंड में तम्बाकू सेवन करने वालों की ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (जीएटीएस) के द्वितीय चरण के आंकड़ों की रिपोर्ट जारी हुई। इसमें बताया गया कि झारखंड में तम्बाकू सेवन करने वालों की संख्या 50.1% से घट कर 38.9% हो गया है।  वहीं धूम्रपान करने वालों की संख्या 9.6 प्रतिशत  से 11.1 प्रतिशत  हो गयी है। झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी का कहना है कि झारखंड को तंबाकू मुक्त प्रदेश बनाना है और इसमें सभी का सहयोग चाहिए। राज्य सरकार तंबाकू के खिलाफ जागरूकता अभियान को और अधिक बेहतर तरीके से क्रियान्वित करेगी ताकि इसके दुष्परिणामों से लोग बचें और तंबाकू मुक्त झारखंड का सपना जल्द साकार हो। 
हर दिन 5500 नये शुरुआती
दरअसल 93 फीसद लोगों को यह जानकारी होती है कि तंबाकू के उपयोग से कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी होती है। फिर भी लोग इसका सेवन धड़ल्ले से करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक देश में हर दिन 5500 लोग तंबाकू सेवन शुरू करते हैं,  इनमें बच्चे भी शामिल हैं। वहीं 90 फीसद ओरल कैंसर तंबाकू के सेवन से होते हैं। इनमें सबसे गंभीर बात ये है कि झारखंड में कैंसर मरीजों की संख्या का कोई अधिकृत आंकड़ा नहीं है, लेकिन आसन्न खतरे को देखते हुए राज्य में बहुत जल्द कैंसर पंजीकरण केंद्र की स्थापना करने की बात कही जा रही है।
कैंसर में 30 फीसदी मौते तम्बाकू के सेवन से
दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों में 30 फीसदी लोगों की मौत तंबाकू उत्पादों के सेवन से होती है। भारत मे कैंसर से मरने वाले 100 रोगियों में 40 रोगी तंबाकू सेवन के कारण मरते हैं, वहीं 90 प्रतिशत लोग मुंह का कैंसर तंबाकू के कारण होता है। हमारे देश में तंबाकू का सेवन एक महामारी की तरह फैल रहा है। इसे समय रहते नहीं रोका गया तो इसके दुष्परिणाम काफी भयंकर होंगे। स्वास्थ्य विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अगर विभिन्न देशों की सरकारें सिगरेट कंपनियों के खिलाफ राजनीतिक इच्छा शक्ति दिखाएं और कठोर कदम उठाएं तो विश्व 2040 तक तंबाकू और इससे उत्पन होने वाले भयानक बीमारियों से मुक्त हो सकता है। आकलैंड विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ रॉबर्ट बिगलेहोल का कहना है कि सार्थक पहल के जरिए तीन दशक से भी कम समय में तंबाकू को लोगों के दिलोदिमाग से बाहर किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए सभी देशों, संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को एक मंच पर आना होगा।
प्रतिवर्ष 60 लाख लोगों की मौत
दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों में 30 फीसदी लोगों की मौत तंबाकू उत्पादों के सेवन से होती है। लोगों को तंबाकू सेवन से उत्पन्न बीमारियों से निपटने पर अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ रहा है। अच्छी बात है कि भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के तहत देश में तंबाकू उत्पादों के सेवन में 2020 तक 15 प्रतिशत और 2025 तक 30 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब इसके लिए कारगर कदम उठाए जाएंगे।
जागरूकता की कमी और सरकारी लचीलापन
जागरूकता की कमी और सिगरेट कंपनियों के प्रति नरमी का नतीजा है कि तंबाकू सेवन से मरने वाले लोगों की तादाद बढ़ रही है। देश की जीडीपी का यह हिस्सा जो तंबाकू जनित बीमारियों पर खर्च हो रहा है अगर उसे गरीबी और कुपोषण मिटाने पर खर्च किया जाये तो उसका सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेगा। संतोषजनक बात यह है कि कि देश में 2016-17 के दौरान तंबाकू का सेवन करने वालों की संख्या में तकरीबन 81 लाख की कमी आयी है और इनमें किशोर और युवाओं की संख्या सर्वाधिक है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वेक्षण द्वितीय की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2009-10 के दौरान तंबाकू सेवन के मामले जहां 34.6 प्रतिशत थे वही 2016-17 में यह 6 प्रतिशत घटकर 28.6 प्रतिशत पर आ गया है। अच्छी बात है कि इस दौरान 15 से 24 वर्ष के युवाओं में तंबाकू सेवन में औसतन 33 प्रतिशत, 15 से 17 वर्ष के वर्ग में 54 प्रतिशत और 18 से 24 वर्ष के वर्ग में 28 प्रतिशत की कमी आयी है।