जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा पलामू किला

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-दयानन्द राय

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घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच अपने गौरवशाली अतीत को समेटे खड़ा पलामू किला अपने जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है। जनप्रिय राजा मेदिनी राय ने इस किले का निर्माण कराया था। राजा मेदिनी राय के समय में जनता बहुत खुशहाल थी। 'धन्य-धन्य राजा मेदिनीया, घर-घर बाजे मथनिया' यह कहावत उनके राज्य को लेकर कही जाती है। पलामू किला लातेहार के बेतला में अवस्थित है। किला पलामू प्रमंडलीय मुख्यालय से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर है। इसलिए यह पलामू और लातेहार दोनों जिलों की शान है। पलामू किला दो हिस्सों में बंटा है। इसका पहला हिस्सा पुराना किला कहलाता है। इसकी भव्यता देखते ही बनती है। 
मेदिनी राय ने करवाया था निर्माण
पलामू किले का निर्माण प्रसिद्ध चेरो राजा मेदिनी राय ने करवाया था। पलामू किला चारों ओर से पांच से आठ फीट चौड़ी दीवारों से घिरा है। किले में घुसने के लिए एक विशाल प्रवेश द्वार है। द्वार बेहद भव्य और खूबसूरत है। किले के चारों ओर ऊंची दीवार पर चढ़कर इसकी सुरक्षा घुडसवार सैनिक करते थे। किले की सुरक्षा के लिए जगह-जगह पर वाच टावर बनाये गये हैं। किले के भीतर घुसने पर सैनिक छावनी है। किले में एक राज दरबार भी है जहां जनता की फरियाद सुनी जाती थी। राज्य चलाने के लिए नीति और सिद्धांत यहीं तय किये जाते थे।
इस किले में एक कुआं भी है जो बहुत गहरा है। किले में कुछ दूर चलने पर राजा का शयन कक्ष दिखाई देता है। यह दो मंजिला है और इसके साथ एक भंडार गृह और गुप्त भवन भी है। वर्तमान में इसका अधिकांश हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है और यहां जगह-जगह पर झाडियां और पेड़ उग आये हैं। किले के कई हिस्से ध्वस्त हो चुके हैं, लेकिन तब भी यह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। यहां पहुंचने पर पलामू के जीवंत इतिहास के दर्शन होते हैं।
भव्य और नक्काशीदार है बनावट
पलामू किले को बने लगभग चार सौ साल बीत चुके हैं, फिर भी यह अपनी गौरव गाथा बयां करता है। पलामू किले की बनावट नक्काशीदार और भव्य है। किले की स्थापत्य कला मुगल शैली से मेल खाती है। बिहार के रोहतासगढ की तरह इस किले में जगह-जगह गुंबद बनाये गये हैं। शांत वातावरण में अवस्थित इस किले में पक्षियों का कलरव और जंगली जानवरों की आवाजें सुनाई देती हैं। पलामू किला पत्थर और सुर्खी चूने से बना है। इसका एक हिस्सा कच्चा है। राजा मेदिनी राय ने इसे आपातकाल के लिए बनवाया था। इस रहस्य को गिने-चुने लोग ही जानते थे । राजा से बगावत करने वालों ने इसका सुराग विरोधियों  को दे दिया। इसके बाद किले के इस हिस्से में हमला करके दुश्मनों ने किले को अपने कब्जे में ले लिया।
शाहपुर का चलानी किला भी जर्जर
पलामू में एक और किला है जिसे शाहपुर किले के नाम से जाना जाता है। यह किला कोयल नदी के तट पर स्थित है। स्थानीय लोग इसे चलानी किला कहते हैं। इस किले का निर्माण चेरो राजा गोपाल राय ने 1770 में करवाया था। 21 मार्च 1771 को यह किला अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। अभी इस किले की स्थिति जर्जर है। कहा जाता है कि इस किले से पलामू किले तक एक सुरंग जाती है। यह किला भी  अपने जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है।
राज्य के जिन सात पुरातात्विक महत्व की इमारतों का जीर्णोद्धार किया जाना है उनमें पलामू किला भी शामिल है। इसके लिए पहले चरण में 48 करोड़ रुपये आवंटित भी कर दिये गये हैं, पर अभी काम आगे नहीं बढ़ पाया है। अन्य छह धरोहरों जिनका संरक्षण किया जाना है उनमें नवरतन गढ़, टांगीनाथ, इटखोरी, ईचाक टेंपल तथा अन्य शामिल हैं।