सीख देते हैं अजीज के गीत

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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''पोसल पालल बेटी कांदय जारो जार,  हो...                 
आजू मइयानईहर तो छुटथे,
गुनी दिला टूटथे, तो नईहर तो छूटा थे...
कोरा में खेलाली तोके बहिंए झूलाली, हो...,
अपने नइ खायके खियाली, तो नईहर तो छुटथे,
गुनी दिला टूटे थे, तो नईहर तो छूटा थे.''
नागपुरी के इस बोल में आज भी जब अजीज अंसारी की आवाज आकाशवाणी पर सुनाई देती है तो गांव कस्बों में ग्रामीणों की आंखें डबडबा जाती हैं. सातवीं पास 65 वर्षीय अजीज अंसारी ऐसे नागपुरी गीतकार और गायक हैं जिन्होंने आज तक दूसरों के लिखे हुए गीत नहीं गाये हैं.
अंसारी अपने लिखे इस बोल के बारे में बताते हैं- ''गीत में मां और बेटी के बीच सवाल-जवाब हो रहा है. बेटी विलाप करते हुए कह रही है कि आज मैं ससुराल चली जाऊंगी और आज से ही मेरा मायका छूट जाएगा. इस पर मां कहती है कि तुम्हें पाल-पोस कर इतना बड़ा किया, अपना पेट काटकर तुम्हें खिलाया, आज तुम मेरी नजरों से दूर जा रही हो.'' अंसारी को इस गीत का खयाल गांव की शादियों में रुख़सती यानी बिदाई वाले क्षण को देखकर आया था. उन्होंने नागपुरी भाषा में इसी तरह के लगभग चार हजार सामाजिक गीत लिखे और गाए हैं.
गॉड गिफ्टेड कहे जाने वाले अजीज अंसारी ने नागपुरी में गीत लिखना और गाना किसी से नहीं सीखा. गांव में पिता और दो भाइयों के साथ उन्होंने जो मुफलिसी और गरीबी देखी और झेली वस, उसे कलमबंद करते चले गये और हिंदी भाषा में नागपुरी बोल से फिजा में मिठास घुलता गया. इनके ठेठ और पौराणिक नागपुरी गीतों में गांव का दर्द और मुसीबतें हैं, तो संस्कृति सुवास भी. सद्भभाव का संदेश है तो सामाजिक कुरीतियां पर व्यंग्य भी.
अजीज अंसारी के साथ कई कार्यक्रमों कर चुके हैं शहाबुद्दीन अंसारी बताते हैं कि अजीज अंसारी ने झारखंड के गठन पर जो गीत लिखा और गया था, उसकी चर्चा आज भी आकाशवाणी के कर्मचारियों के बीच होती हैं. 
''केतई सुंदर देश हमर झारखंड डेरा,
जहां करयं रिषी-मुनी सुफी संत फेरा.
सुबरनखा (स्वर्ण रेखा) कोइल कारो,
संख नदी बहे. कोयला तंबा,
चांदी, सोना, माटी हीरा,
चांद सुरज आके पहले डाले जहां डेरा...''
इस गीत में उन्होंने राज्य की खनिज संपदा, आपसी सद्भभाव, संस्कृति और क्रांति के संर्घष को एक साथ समेटा है. यह गीत आज भी ऑल इंडिया रेडियो पर बजता है.
28 वर्ष की उम्र में ही अजीज की मधुर आवाज ने 80 के दशक में गांव से रेडियो-टीवी तक का सफर तय कर लिया. लोगों ने रेडियो पर उन्हें 36 रागों में उनके सैकड़ों सामाजिक गीत सुने. अजीज की इस प्रतिभा को देख भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 1998 उन्हें रजिस्ट्रड लोक गायक का दर्जा दिया, लेकिन इनकी पहचान आज तक गांव के खपरैल घर की सीमा तक ही सिमटी रही. इस पर अजीज कहते हैं कि इतना सब होने के बावजूद  उन्हें राज्य सरकार से 'इनाम' उपेक्षा के रूप में मिला. यही वजह रही कि अजीज ने 2012 के बाद रेडियो-टीवी पर गाने-बजाने को अलविदा कह दिया है और बीते कई सालों से रांची से 20 किलोमीटर दूर रातू प्रखंड के हुरहुरी में गांव में अपने परिवार के साथ जिंदगी बसर कर रहे हैं. 
पद्मश्री मुकुंद नायक भी हैं मुरीद
अजीज अंसारी की आवाज और उनकी सलाहियत के कायल पद्मश्री लोक गायक-नृत्यकार मुकुंद नायक और मधुर मंसूरी जैसे लोकप्रिय कलाकार भी हैं. मुकुंद नायक, अजीज अंसारी को बेमिसाल बताते हैं. वह कहते हैं, ''उनके गाए नागपुरी गीतों पर आज भी गांव में लोग झूम उठते हैं. उनके साथ मैंने कई कार्यक्रम किये हैं जो मेरे जीवन के सुखद पल हैं.'' वहीं अजीज अंसारी बातचीत के क्रम में बताते हैं कि वह मुकुंद नायक से पहली बार 1987 में एक कार्यक्रम के दौरान मिले थे. उसमें, ''चढ़लय अषाढ़ सुदी सावन अवसरे... गुनी-गुनी सूखे चीर रहली निभोरे... ए साजन इसन समय पिया नखयं घरे...'' गाए उनके इस गीत की उन्होंने बहुत सरहाना की थी. इसके बाद से अक्सर उनसे रांची नागपुरी कला संगम में मुलाकात होने लगी. लेखक अश्विनी पंकज आजीज अंसारी के गीत सुनकर कहते हैं कि ये झारखंड की बेमिसाल धरोहर हैं. महावीर नायक, मधु मंसूरी और अजीज अंसारी जैसे कलाकार वीडियो एलबम और नई टेक्नोलॉजी के कारण सिमटते जा रहे हैं. शायद इनके मीठे बोलों को इतिहास के पन्नों में संजोये रखने की जरूरत है.
1983 में रेडियो में मिला ब्रेक
कांके प्रखंड के गागी गांव के एक छोटे से घर में जब कभी वालिद गुलाम रसूल अंसारी लोगों के साथ गजल या शायरी पढ़ा करते, तब 13 साल के अजीज अंसारी उनकी जमात में शामिल हो जाते. गायी जा रही पंक्तियां को दोहराने लगते. बचपन से ही गीत-संगीत के तरफ झुकाव देख पिता अजीज को अक्सर कार्यक्रमों में साथ लेकर जाते. बात 1972-74 की है और अब अजीज की उम्र करीब 17 की. वह शादी-विवाह में बजने वाले नागपुरी गीत पूरे मन से सुनते और गुनगुनाते. अजीज अपनी कथा सुनाते हुए आगे कहते हैं- ''उन्हें बचपन से ही नागपुरी गीत गाने और लिखने का भी शौक था. एक बार बचपन में दोस्तों के साथ मुड़मा मेले में गया तो वहां नागपुरी गीत की किताब को दुकानदार गाकर बेच रहा था. मन किया कि ढेर सारी किताबें खरीद लूं. लेकिन पास में एक किताब खरीदने का भी पैसा नहीं था. उस दिन से मेरा मन नागपुरी गीतों की तरफ और मजबूती से माइल (खिंचाव) हो गया. इसके बाद से ही मन ही मन जैसे-तैसे अपने ही बोल बनाकर गाने लगा.''
अजीज के लिखने और गाने में धीरे-धीरे कुछ सुधार हुआ तो गांव में उनकी चर्चा होने लगी. अब वह गांव, स्कूल में बेहिचक गाते थे. एक बार गांव में नगड़ी हाई स्कूल के शिक्षक आए हुए थे, जिन्होंने अजीज को गाते सुनकर अपने स्कूल के बच्चों को प्रशिक्षण देने का आमंत्रण दिया. अजीज अंसारी कहते हैं कि इसी शिक्षक की मदद से पहली बार इमरजेंसी (1977) में मैंने दो गीत की किताबें लिखीं और इसकी 1000 कॉपियां छपवाईं. 17 रुपये की इस छपाई से मुझे पांच सौ रुपये की आमदनी हुई. नाम, शोहरत और पहचान मिली सो अलग. हालांकि बाद में मैंने नागपुरी गीत पर एक किताब भी लिखी जो काफी लोकप्रिय हुई.
इन सबके बीच अब अजीज अंसारी को लोग लोक गायक के रूप में जानने लगे थें. अंसारी बताते हैं कि उसी दौरान नाटककार और गायक शहाबुद्दीन अंसारी से मेरी मुलाकात हुई और हम दोनों ने ऑल इंडिया रेडियो, रांची में दरखास्त दी. ऑडिशन के बाद उनलोगों का चयन हो गया. और इस तरह 1983 में उन्होंने पहली बार ऑल इंडिया रेडियो में अपना ही लिखा हुआ गीत गया. जिसके बोल थे...  
''हाय रे हाय मिलते ऋण,
सरकारी बीडिओ ठिन देबय कागजदारी.
मिलते सरकारी ऋण खेत में लगबय बिहिन मकई से मोरत बारी,
गेंहू के लगबय केयारी केयारी...