हस्तशिल्प के सहारे रोजगार सृजन

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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झारखंड में हैंडीक्राफ्ट यानी हस्तशिल्प अब सिर्फ आदिवासियों की संस्कृति तक ही सीमित नहीं है. बल्कि यह रोजगार का एक बड़ा जरिया बनता जा रहा है. इसी साल राजधानी रांची में आयोजित पन्द्रह दिवसीय आदि महोत्सव में हुई लगभग 75 लाख की बिक्री ऐतिहासिक रही. जबकि इससे पहले दिल्ली, भोपाल और रायपुर में लगे इस मेले का कारोबार 50 लाख से अधिक नहीं जा पाया. आदि मेले की खासियत यह है कि वर्षों से देश की ट्राइबल जनजातियों के द्वारा हाथों से बनाई जा रही चीजों का प्रचार-प्रसार कर उसे रोजगार से जोड़ने के लिए गांवों-कस्बों के करीगरों और उनके प्रोडक्ट को मेले तक लाना है. यही काम झारखंड खादी उद्योग बोर्ड और झारक्राफ्ट भी कर रहे हैं.
50 लाख तक है टर्नओवर
केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय की संस्था ट्राइफेड झारखंड के रिजनल मैनेजर एडी मिश्रा कहते हैं कि झारखंड के आदिवासियों की पारंपरिक हस्तकला एवं हस्तशिल्प को पूरी दुनिया में पहचान मिल रही है. संस्था झारखंड के विभिन्न जिलों के गांव में हस्तशिल्प के कामों को बढ़ावा दे रही है. मिश्रा का मानना है कि हस्तशिल्प ग्रामीणों में पार्ट टाइम जॉब है जिससे वो साल में 30-35 हजार रुपया तक कमा सकते हैं.
मिश्रा पिछले दो साल के आंकड़े का जिक्र करते हुए बताते हैं कि ट्राईफेड की देखरेख में राज्य के विभिन्न जिलों और गांवों में 41 समूह चल रहे हैं, जिससे लगभग 4,000 आदिवासी कारीगर जुड़े हुए हैं. राज्य में हस्तशिल्प का करोबार वर्तमान में सलाना 45-50 लाख रुपये का है. ट्राईफेड अलग-अलग राज्यों और जिलों में मेले का आयोजन कर झारखंड के करीगरों को प्लेटफॉर्म मुहैया कराती है, जहां उनसे स्टॉल लगाने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है. संस्था साथ ही इन करीगारों से उनकी सामग्री उचित मूल्य में खरीदती कर उन्हें बजारों में बेचती है.
लोगों में जानकारी का अभाव 
ट्राईफेड से जुड़े हुए दिलेश्वर लोहरा बताते हैं कि संस्था विशेष तौर गांव में जाकर ग्रमीणों को हैंफीक्राफ्ट की ट्रेनिंग देती है और सामग्री भी उपलब्ध कराती है. इस साल झारखंड में लगभग सौ से भी अधिक हैंडीक्राफ्ट मेले का आयोजन हुआ है.
सिसई के पालकी गांव की ज्योति कुजूर सोहराई पेंटिंग से मात्र दो ही मेले से लगभग 15 हजार रुपये जमा कर लेती हैं. वह बताती हैं कि राज्य में तो कई मेले लगते हैं, लेकिन जानकारी हमलोगोंं तक नहीं पहुंच पाती है. हम अगर और अधिक मेलों में जायेंगे तो हमारी आमदनी काफी होगी. ज्योति कहती हैं कि रांची के आड्रे हाउस और राजभवन की दीवारों पर जो पेंटिंग नजर आती है, उसे हमलोगों ने ही बनाया है.
सिमडेगा के नरेश सिंह मुंडा बम्बू क्राफ्ट यानी जंगली बांसों से डालिया, टोकरी समेत कई तरह की अन्य सामग्री बनाते हैं. उनके मुताबिक इन्हें राज्य में लगने वाले सभी मेले को जानकारी नहीं मिल पाती है. वह कहते हैं कि इसके कारण हमारी बनानी चीजें बाजारों तक नहीं पहुंच पाती हैं.
वहीं, रांची के पुंदाग की रहने वाली मनोनीत रेबिका टोप्नो कहती हैं कि हमारे समूह का काम झारखंडी ट्राइबल फूड बनाना है. समूह में 13 लोग हैं जिनकी सालभर राज्य में लगने वाले मेलों से प्रति करीगर 20 हजार रुपये आमदनी हो जाती है. ट्राइबल व्यंजन में खासकर ढूमु, पीठा, धुसका, दूधत्तू, छिलका रोटी शामिल हैं. ये सब चावल और मडुवा दोनों के ही बनते हैं.
झारखंड के प्रमुख हस्तशिल्प
झारखंड में गुमला, जमशेदपुर, साहेबगंज, रांची, लातेहार, खूंटी, दुमका, लोहरदगा, पाकुड़, सिमडेगा, देवघर और गोड्डा जिला आदिवासी हस्तशिल्प और हस्तकला का प्रमुख केंद्र है. इन जगहों में आदिवासी करीगरों द्वारा कई मशहूर चीजें बनाई जाती हैं. इनमें बम्बू क्राफ्ट के आइटम रांची, खूंटी, जमशेदपुर में बनाये जाते हैं, जिनमें बांस की डालिया, टोकरी, स्टैंड आदि शामिल हैं. वुड आइटम में इसी तरह की चीजें बनाई जाती हैं. झारखंड में पाये जाने वाली लाह से बनने वाली झारखंडी ज्वेलरी भी बहुत मशहूर है जिन्हें लोग झारखंडी टेरा-कोटा के नाम से जानते हैं. इसके अलावा डोकरा, हैंडलूम, व्यंजन समेत कई सामग्री गांवों में स्थानीय संसाधनों से बनाई जाती है.
सरकारी मदद और कारगर होंगे
ट्राइफेड समेत अन्य संस्थाओं के द्वारा झारखंडी हस्तशिल्प को पहचान देने के लिए जो भी प्रयास हो रहे हैं, वे सराहनीय है. अगर इसके साथ राज्य सरकार की खास पहल जुड़ जाये तो इसका दायरा और बढ़ सकता है. हम उत्तराखंड का उदाहरण ले सकते हैं. उत्तराखंड की सरकार ने रुद्रप्रयाग की अनुसूचित जनजाति के लोगों को प्रशिक्षण देकर रिंगाल की टोकरियों का निर्माण करवा रही है. इन टोकरियों का उपयोग बद्रीनाथ और केदारनाथ में प्रसाद देने के लिए किया जा रहा है. जाहिर है, इन टोकरियों की बहुतायत खपत हो रही है. खपत हो रही है तो मुनाफा भी खूब हो रहा है. झारखंड सरकार भी राज्य के विशेष हस्तशिल्प का चयन कर, विशेष प्रशिक्षण देकर नये बाजार का सृजन कर सकती है।
झारखंड सरकार ने राज्य के 32 हजार गांवों में आदिवासी और ग्राम विकास समितियां बनाने का निर्णय लिया है. राज्य सरकार का यह निर्णय झारखंड में ग्रामीण विकास में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है यानी छोटे-छोटे विकास कार्य ये विकास समितियां देखें. राज्य कैबिनेट ने भी इसे अपनी मंजूरी दे दी है. अपने इस फैसले के बाद सरकार अब विवादों में घिर गयी है. उस पर आरोप लगने लगे हैं कि वह पंचायती राज व्यवस्था को और मजबूत करने के बजाय उसे समाप्त करने का 'कुप्रयास' कर रही है, जबकि उसे ऐसा करना का अधिकार प्राप्त ही नहीं है.