मानव तस्करों के आगे बेबस सरकार

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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तस्करी में 78 प्रतिशत आदिवासी
हर साल भारत में एक लाख 55 हजार के आस-पास लड़के-लड़कियों की मानव तस्करी होती है, जिनमें से लगभग एक लाख लोग ही बरामद हो पाते हैं. मानव तस्करी में पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के बाद झारखंड देश में तीसरे स्थान पर है। यहां मानव तस्करी का सबसे अधिक शिकार आदिवासी समाज होता है. इनमें 78 प्रतिशत आदिवासी, 12 प्रतिशत एससी, 8 प्रतिशत ओबीसी और 2 प्रतिशत जनरल कैटेगरी लोग शामिल हैं. यूएनओ-डीसी की रिपोर्ट कहती हैं कि झारखंड से होने वाले ट्रैफिकिंग में 87 प्रतिशत नाबालिग बच्चे-बच्चियां होते हैं. इनमें महिलाओं की संख्या 90 प्रतिशत से भी अधिक है. झारखंड में गुमला, रांची, खूंटी, लोहरदगा, सिमडेगा और चाईबासा से सबसे ज्यादा मानव तस्करी होती है. झारखंड में मानव तस्करी घरेलू काम और फेक मैरिज के नाम पर बहला-फुसला कर की जाती है. वहीं मजदूरी और काम दिलाने का झांसा देकर भी लड़के-लड़कियों को शिकार बनाया जाता है. चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट बैद्यनाथ कुमार कहते हैं कि झारखंड में मानव तस्करी की तस्वीर बहुत भयावह है. झारखंड में मानव तस्करी का सही आंकड़ा मिल पाना सम्भव नहीं है। वह इसलिए, क्योंकि इस तरह के मामलों में 90 प्रतिशत परिवार थाना-पुलिस के चक्कर से बचने के के कारण केस ही नहीं दर्ज कराते है. फिर पुलिस रिकॉर्ड्स में जो दर्ज होता है उसे ही आंकड़ा मान लिया जाता है.
दो माह में हुए 1163 रेस्कयू 
मानव तस्करी पर शिकंजा कसने के लिए झारखंड पुलिस, सीआईडी और कई एनजीओ साथ में काम कर रहे हैं. चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट बैद्यनाथ कुमार कहते हैं कि झारखंड पुलिस और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े काफी चिंताजनक हैं. मानव तस्कर गिरोह राज्य में मजबूत होते जा रहे है. राज्य से 2012 से 2013 अप्रैल तक 180 मानव तस्करों की गिरफ्तारी की गयी थी, इनमें महिला मानव तस्करों की संख्या पुरुषों से अधिक थी. बैधनाथ ने कहा कि अगर सरकारी आंकड़ा ही लें तो 2013 से 2017 मई तक झारखंड में मानव तस्करी और लापता के 2489 मामले दर्ज हुए. इनमें से 1405 को ही रेस्क्यू किया गया. उन्होंने कहा कि एक एनजीओ ने 31 मई से 31 जुलाई 2015 तक देशभर में रेस्क्यू अभियान चलाया. इन दो माह में 11 राज्यों के 35 शहरों से 1330 बच्चे-बच्चियों को रेस्क्यू किया गया, जिसमें झारखंड के 1163 लड़के-लड़कियां थे.
गरीबी के कारण होते टारगेट
झारखंड में चाइल्ड ट्रैफिकिंग पर काम रही 'दिया' सेवा संस्था की सचिव सीता स्वांसी का कहना है कि झारखंड में तेजी से हो रही मानव तस्करी का एक बड़ा कारण गरीबी और आर्थिक तंगी है. आदिवासियों में गरीबी और आर्थिक तंगी काफी है. तस्कर गिरोह आर्थिक तंगी को देखकर इन तक आसानी से पहुंच जाते है और फिर इन्हें काम, शादी कराने के नाम पर बहला-फुसला दूसरे राज्यों में ले उड़ते हैं. सीआईडी रिपोर्ट के अनुसार 2017 में झारखंड से 255 नाबालिग लापता हुए, जिनमें से पुलिस अब तक 164 को ही बरामद कर पाई. इनमें 107 बच्चे और 148 बच्चियां थे. 
नहीं है कारगर कदम
चाइल्ड राइट्स एक्टिविस्ट बैद्यनाथ कुमार कहते हैं कि झारखंड सरकार के द्वारा राज्य में मानव तस्करी पर नकेल लगाए जाने की दिशा में उठाये जा रहे कदम कारगर नहीं हैं. 2010 तक झारखंड में लापता बच्चों का सरकार के पास कोई आंकड़ा ही नहीं था. मैंने इस बाबत 2010 हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल की. कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने बताया कि 24 जिलों से अब तक मात्र 44 लोग ही लापता हैं. इनमें से गुमशुदगी के सिर्फ सात मामले ही दर्ज हुए थे. झारखंड में 2013 में 240 के साथ यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया, लेकिन पुलिस ने मात्र सात केस में पोस्को एक्ट के तहत कार्रवाई की. वहीं राज्य में कोर्ट के आदेश के बाद 2011 में ट्रैफिकिंग रोकने हेतु आठ जिलों में एंटी 'ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (एएचटीयू) गठन किया गया जो मात्र नाम भर ही है.