महुए से शराब नहीं, बन रहे सेहत के लड्डू

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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सुशीला बार:बार बिट्टू (तीन वर्ष का बच्चा) को खिलौना देकर उसे किनारे करती, तो आरती 'दीदी जल्दी आओ' की पुकार लगाती. पास में सामिया, सिलमनी, बांगी, मानती, सविता समेत कई और चकल्लस करती, लड्डू बनाने में लगी रहतीं.
ये नजारा हर शाम मांडर के चटवल गांव में सुशीला खलको के घर के आंगन का रहता, जहां दर्जनों महिलाएं महुए के लड्डू बनाने में मसरूफ रहतीं. वही महुआ जिसका इस्तेमाल दो साल पहले तक ये सभी शराब बनाने में करती थीं, लेकिन अब नहीं, क्योंकि इनके रोजगार का तरीका बीते एक साल से बदल गया है.
दरसअल, मांडर के मल्टी, सोसाई मरिया टोली, करगे, हातमा, चटवल और कोजिया गांव की लगभग 70 महिलाएं शराब बनाना छोड़कर महुए के लड्डू बना रही हैं. इनके मुताबिक अब इनके घरों में वो शोर-शराबा और मारपीट नहीं होता है जो पहले हुआ करता था. गांव की ही सुमन कहती हैं कि जिस भी घर में शराब चुलाया जाता है वहां से गाली-गलौज और आपस में लड़ाई आम बात है.
दूसरे राज्यों से भी आते हैं लड्डू के ऑडर
बीते दो वर्षों ये महिलाएं महुए के लड्डू बनाती आ रही हैं, लेकिन पिछले साल इन्होंने लगभग दो लाख लड्डू बनाए जिनमें से अधिकतर बाजारों में बिक गए. लड्डुओं को बाजारों तक पहुंचाने का काम करने वाली लैटिफोलिया इंटरप्राइजेज कंपनी की मार्केटिंग ऑफिसर आलोका बताती हैं- 'एक सीजन में 15-15 महिलाओं का एक ग्रुप 40 हजार लड्डू बना लेता है. सभी गांव मिलकर लगभग दो लाख. पिछले साल नवंबर में ही गुजरात जाकतनगर के राजपिपला में लगे मेले से 50 हजार लड्डुओं का ऑर्डर मिला था. बाजारों में एक लड्डू की कीमत 10-20 रुपये तक की होती है.''
इनके बनाए हुए लड्डुओं की चर्चा गुजरात से लेकर दिल्ली और छत्तीसगढ़ तक  है. चटवल के समूह की प्रमुख सुशीला साथी सभी महिलाओं की ट्रेनर हैं, जिन्हें देखना होता है कि लड्डुओं की क्या साइज है और किसमें क्या मैटेरियल देना है. चार तरह के महुए के लड्डुओं में सफेद तिल, कागजी बादाम, मूंगफली के दाने, चावल और गुड़ मिलाये जाते हैं. सुशीला बताती हैं कि लड्डु को बनाना आसान नहीं है. महिलाएं बाजार से महुआ खरीदकर उसे अच्छी तरह धोती-सुखाती हैं. तब उसे घी में भूना और फिर पीसा जाता है. वे दस किलो महुए से लगभग तीन सौ लड्डू बना लेती हैं. सामिया कच्छप कहती हैं कि दो साल पहले देवघर के सोनाराम ने गांव की महिलाओं को महुए के लड्डू बनाने की ट्रेनिंग दी थी. तभी महिलाओं ने ठान लिया था कि अब वे महुए से शराब नहीं, लड्डू बनाएंगी.
लड्डू से बनेगा शराबमुक्त गांव
पास के ही सोसाई गांव की पुनिया 14 माह पहले तक महुए से शराब चुलाती थीं. उस दिन को याद करते हुए वह अपने देहाती लहजे में बताती हैं-  'सबकुछ तो पैसा नहीं है. इज्जत की एक वक्त की रोटी, जिल्लत के कई वक्त की सुखी जिन्दगी से अच्छी हैं. इस काम के लिए बहुत संघर्ष करती रही हूं. मुश्किल तो है, लेकिन ठान लिया है कि रुकना नहीं है.'
अलग-अलग समूहो और संस्थाओं से जुड़कर अब मांडर के कई गांव की महिलाओं ने शराबमुक्त गांव बनाने की मुहिम छेड़ दी है. मल्टी गांव की सुनीता उरांव कहती हैं- 'उन्हें समझ में नहीं आता कि महुआ यानी दारू ही क्यों? इसके फल में तो आयरन की भी मात्रा बहुत होती है. मैं चाहती हूं कि झारखंड की आदिवासी महिलाएं महुए से शराब बनाना छोड़कर इसके लड्डू बनाए. इसमें समाज और सरकार दोनों ही सहयोग करे.
शराब वाला बदलता रिवाज
ऐसे तो महुआ काफी उपयोगी माना जाता है, लेकिन आज भी इसका जिक्र होते ही लोगों के जेहन में शराब की ही बात उभरने लगती है. झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासियों की आजीविका का स्रोत महुआ से आने वाली आमदनी पर भी निर्भर है. और इसमें शराब का प्रतिशत अन्य कामों से अधिक बताया जाता है. यही वजह है कि बहुतरे गांवों में आदिवासी महिला महुए की शराब बेचती मिल जायेंगी.
वरिष्ठ पत्रकार नीरज सिन्हा कहते हैं, 'आदिवासी समाज में शराब को जिस तरह की मान्यता मिली हुई शायद ही किसी अन्य भारतीय समाज में देखने को मिलेगी, लेकिन शराब के कारण पैदा होने वाले सामाजिक-आर्थिक दुष्प्रभावों का भी इनपर काफी बड़ा असर पड़ा है. बीच-बीच में इस समाज की महिलाएं शराबबंदी को लेकर सामने भी आती रही हैं.' झारखंड में शराब की बिक्री राज्य सरकार करती है. राज्य में महुआ या हाड़ियां यानी चावल को सड़ाकर शराब बनाना और बेचना गैरकानूनी है.
मांडर की महिलाएं इस मानसिकता को बदलने और समाज को सशक्त करने में लगी हुई हैं जो अबतक इनके प्रति संकुचित और संकीर्ण सोच रखता आया है. ब्लॉक से पांच किलोमीटर की दूरी पर कारगे गांव में सविता लकड़ा रहती हैं जो हर शाम अपने परिवार के साथ महुए का लड्डू बनाने बैठ जाती हैं. ये पूछने पर कि 'लड्डू बनाकर कितना कमा लेती हैं?', खड़ी जुबान में कहती हैं कि 'इतना कि घर की बाहरी जरूरतें पूरी हो जाती हैं. इतना कि शराब नहीं बेचना पड़ता है. इस साल 18 हजार रुपये की आमदनी हुई'. तब सविता को निहारती मां बेतिया कच्छप कहती हैं- 'बिटिया सही बोल रही है. हमलोगों की जिंदगी पहले से बदल चुकी है. सविता को इस काम में पूरा परिवार हाथ बंटाता है.'
कुपोषित, एनीमिया के लिए फायदेमंद
झारखंड में 47 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. जबकि 15-40 साल के 65 प्रतिशत महिलाओं को एनीमिया है. जानकारों और डॉक्टरों का मानना है कि महुए से बना पौष्टिक आहार झारखंड जैसे राज्य के लिए काफी मुफीद होगा. डॉक्टरों का कहना है कि महुए में काफी मात्रा में आयरन और कार्बोहाइड्रेट्स होता है. इसे गुड़ और बादाम में मिलाकर खायें तो बेहद फायदेमंद हैं. खासकर लड़कियों के अधिक.