सरकारी खर्च पर इलाज की सर्वाधिक सुविधा देगा झारखंड

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्र पांडेय

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वतर्मान में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा हालात को देखते हुए इसके बेहतर से और बेहतर हो जाने की बात मात्र कोरी कल्पना ही नजर आती है। वर्तमान में अपवाद को छोड़कर तमाम सदर अस्पतालें सुविधाहीन हैं। शायद ही कहीं विशेषज्ञ चिकित्सक हैं। हैं भी तो ड्यूटी नहीं करते। जांच की सुविधाएं नदारद हैं। अधिसंख्य प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में चिकित्सक जाते तक नहीं। इन पीएचसी में चिकित्सकों की पोस्टिंग है, पर वे शहरों में अपने क्लीनिक चलाते हैं। महिला स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति तो और भी बदतर है। 3.30 करोड़ की आबादी वाले झारखंड की करीब 70 फीसदी आबादी बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। विभाग के अधिसंख्य पद रिक्त चल रहे हैं। राज्य की नाक माने लाने वाले अस्पताल रिम्स में नर्सों के करीब 3600 पद सृजित हैं, पर कार्यरत मात्र 440 हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां के अन्य अस्पतालों की स्थिति क्या होगी? उधर, सभी जिलों के सदर अस्पताल से रोगियों को मामूली बीमारी में भी रिम्स रेफर कर दिया जाता है, जिससे रिम्स में क्षमता से तीन-चार गुणा मरीज हमेशा भरे रहते हैं। चिकित्सकों के पास भी सभी मरीजों की बेहतर जांच का समय नहीं मिल पाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तैयार हो रहा तंत्र
इन हालात से निपटने के लिए राज्य सरकार ने एक वृहत कार्य योजना तैयार की है। स्वास्थ्य विभाग एक ऐसा तंत्र विकसित करने में लगा है, जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य एवं सामाजिक स्वास्थ्य का एक साथ समावेश है। स्वास्थ्य विभाग की तकनीक, आधारभूत संरचना, कार्य संस्कृति में बदलाव लाया जा रहा है। विभाग स्वास्थ्य सेवा का ऐसा तंत्र बनाने में लगा है, जिससे लोगों को यहां आने पर संतोषप्रद इलाज के साथ आत्मसंतुष्टि मिले तथा अस्पतालों में जाने पर भय, क्रोध व विरोध का नामोनिशान न रहे। हाल के तीन वर्षों में ग्रामीण क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए 150 नये स्वास्थ्य उपकेन्द्र एवं 30 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के भवनों का निर्माण कराया जा चुका है। पूर्व से मौजूद सभी स्तर के स्वास्थ्य केन्द्रों को सक्रिय किया जा रहा है, ताकि ग्रामीणों को उनके द्वार पर ही स्वास्थ्य सुविधा मिल सके तथा रास्ते में कोई मरीज दम न तोड़े। सभी जिलों के सिविल सर्जन समेत सभी स्वास्थ्य पदाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि जरूरत होने पर ही मरीजों को रिम्स रेफर करें। अधिक से अधिक मरीजों का इलाज सदर अस्पतालों में ही हो। सदर अस्पताल में जो कमियां हैं, उनकी सूची मांगी जा रही है, ताकि उन्हें दूर किया जा सके। सभी 24 जिलों के सिविल सर्जन अपनी आवश्यकताओं की सूची तैयार कर रहे हैं। इसका उद्देश्य यह है कि जैसे ही सदर अस्पतालों में अधिकतम मरीजों का इलाज शुरू होगा, रिम्स में भीड़ कम हो जायेगी, जिससे रिम्स की गुणवत्ता में सुधार हो जायेगा। 
रिम्स में भीड़ कम करने एवं राज्य में चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने की दिशा में योजना बनाते हुए राज्य सरकार ने पलामू, दुमका एवं हजारीबाग के सदर अस्पतालों को 200 बेडेड अस्पतालों में उत्क्रमित करते हुए तीनों जगह मेडिकल कॉलेज का निर्माण शुरू कराया है। तीनों कॉलेजों में भी 500-500 बेड के अस्पताल होंगे। इन तीनों मेडिकल कॉलेजों में शैक्षणिक सत्र 2019-20 से पढ़ाई शुरू हो जाने की उम्मीद है। हाल ही में यहां पहुंचे केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने कहा कि चालू शैक्षणिक सत्र में एमसीआई ने इन तीन नये मेडिकल कॉलेजों के लिए एमबीबीएस की पढ़ाई की मान्यता नहीं दी है। लेकिन अगले सत्र से इसकी मान्यता मिल जायेगी। इसके अलावा राज्य सरकार ने चाईबासा एवं बोकारो में 500-500 बेडेड अस्पताल के साथ मेडिकल कॉलेज खोलने की दिशा में कार्य शुरू कर दिया है। महिला एवं शिशुओं के इलाज के लिए रांची सदर अस्पताल में 200 बेडेड अस्पताल शुरू किया गया, इससे भी रिम्स में भीड़ कम हो चुकी है। रांची जिले के ब्रांबे में सरकार कैंसर का अस्पताल शुरू करने वाली है। रिम्स में ही एक डेंटल कॉलेज की शुरुआत की गयी है। गढ़वा जिले में एक निजी डेंटल कॉलेज चल रहा है। इनके अलावा एक मेडिकल सिटी के निर्माण की योजना है। वर्तमान के तीन मेडिकल कॉलेजों में धनबाद मेडिकल कॉलेज की स्थिति सुधारने के लिए केन्द्र सरकार स्वयं पहल कर रही है। उस पर करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं। जमशेदपुर के मेडिकल कॉलेज की भी स्थिति सुधारने की दिशा में राज्य सरकार पहल कर रही है। राज्य सरकार ने राज्य में कई निजी अस्पताल खोलने की अनुमति दी है एवं उस दिशा में अनुकूल नीति तैयार की है। राज्य में दो निजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल भी एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू कराने के लिए एमसीआई के पास अनुमति का आवेदन दे चुके हैं। इन सबके बीच केन्द्र एवं राज्य सरकार ने देवघर में एम्स की स्थापना पर कार्य शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में उसकी नींव रखी है। इस तरह झारखंड नौ सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल होंगे। यदि यही रफ्तारी रही तो तीन-चार वर्षों बाद से सभी मेडिकल कॉलेज चालू स्थिति में होंगे। राज्य में मात्र सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पतालों की बात करें तो तीन वर्षों बाद यहां एक साथ 10,000 से अधिक मरीजों के एक साथ भर्ती करने की क्षमता होगी, जो अपने किसी भी पड़ोसी राज्य के पास नहीं है। इसके अलावा यहां एमबीबीएस की सीटों में भी इजाफा होगा, जिससे यहां चिकित्सकों की संख्या में हर साल वृद्धि होगी। फिर निजी अस्पतालों की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। 
दूर की जा रही चिकित्सकों की कमी
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री रामचन्द्र चन्द्रवंशी ने यहां के चिकित्सकों की वेतन विसंगतियों को दूर किया। वर्षों से लंबित प्रोन्नति की समस्या को हल किया। फिर चिकित्सकों के रिक्त पदों को भरने की दिशा में 145 नियमित विशेषज्ञ चिकित्सकों एवं 272 नियमित सामान्य चिकित्सकों की नियुक्ति करायी। साथ ही चिकित्सकों के 538 पदों का सृजन कराया। एनएचएम के तहत 180 विशेषज्ञ चिकित्सों को नियुक्ति पत्र दिये गये। 155 दंत चिकित्सों की बहाली के लिए जेपीएससी को अधियाचना भेजी जा चुकी है। सदर अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिए चिकित्सकों की बहाली की प्रक्रिया जेपीएएसी में चल रही है। 
ये तमाम प्रक्रियाएं तेजी से चल रही हैं। ऊपर से लोगों को यह सामान्य लग रहा है, लेकिन इन कार्यों का दूरगामी परिणाम निकलेगा। जैसे एम्स के शुरू होते ही संथाल परगना के करीब 500 उन मरीजों का इलाज वहीं हो जायेगा, जो प्रतिदिन रिम्स पहुंचते हैं। दुमका में मेडिकल कॉलेज शुरू होते ही वहां के मरीज वहीं रुक जायेंगे। इस तरह एम्स, दुमका कॉलेज एवं रिम्स तीनों की गुणवत्ता में एक साथ सुधार होगा। पलामू, जमशेदपुर, हजारीबाग और धनबाद के मरीज अपने ही क्षेत्र के मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में रुक जायेंगे। यह सर्वविदित है कि एक अच्छी संस्थान के साथ कई अन्य संस्थान भी शुरू हो जाते हैं। जहां-जहां ये मेडिकल कॉलेज शुरू होंगे, वहां अन्य मेडिकल सुविधाएं भी स्वत:स्फूर्त उपलब्ध हो जायेंगी। इसका लाभ झारखंड के अलावा इसके पड़ोसी राज्य के लोगों को भी मिलेगा। 
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1948 में एक परिभाषा दी थी कि स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों की अनुपस्थिति का नाम नहीं है। दैहिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ होना अर्थात समस्या विहीन होना ही स्वास्थ्य है। झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री रामचन्द्र चन्द्रवंशी के अनुसार, झारखंड सरकार उसी सिद्धांत के अनुरूप काम कर रही है। हमलोग एक बेहतर आधार तैयार कर रहे हैं, जिस पर झारखंड का स्वस्थ्य भविष्य तैयार होगा। इस आधार पर झारखंड सामाजिक रूप से भी स्वस्थ्य राज्य होगा। देश में एक उदाहरण बनेगा।