लगातार गिरता भू-गर्भ जलस्तर चिन्ताजनक

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-परम

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वर्ष-दर-वर्ष राजधानी रांची समेत राज्य के पठारी क्षेत्रों में भू-गर्भ जलस्तर निरंतर गिरता जा रहा है। भू-गर्भ जलस्तर को लेकर केन्द्रीय भू-गर्भ वाटर बोर्ड बार-बार चेतावनी जारी कर सम्भावित खतरे के प्रति सचेत करता रहता है। इसके बावजूद सरकार और इससे संबंधित एजेंसियां इससे समस्या को लेकर अधिक गंभीर नहीं नजर आतीं। पिछले दो दशकों में रांची शहर समेत राज्य के अन्य शहरों और क्षेत्रों का जलस्तर अप्रत्याशित ढंग से नीचे गिरा है। राजधानी रांची की बात करें तो वर्ष 2005 में शहरी क्षेत्र का भू-गर्भ जलस्तर 2.5 मीटर से अधिक नीचे चला गया है। भू-गर्भ जल लगातार गिरते हुए लगभग 11.5 मीटर तक पहुंच गया है। अत्यधिक भू-गर्भ जल का दोहन होता रहा, लेकिन उसके मुकाबले में भू-गर्भ स्तर को संतुलित बनाये रखने को लेकर कोई प्रयास नहीं किया गया। 
फ्लैट कल्चर के कारण स्थिति भयावह
शहरों में फ्लैट कल्चर ने गिरते भू-गर्भ जलस्तर को और खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। रांची में तेजी से आबादी बढ़ी तो कंक्रीट के जंगल भी तेजी से खड़े हुए। फिर शुरू हुआ भू-गर्भ जल का तेजी से दोहन। भू-गर्भ जल दोहन एक हद तो सही है, लेकिन जलस्तर को मेन्टेन करने की न तो तो कभी सकारात्मक पहल हुई, नही सोच दिखी। रांची नगर निगम जलस्तर को मेंटेन करने के लिए बहुमंजिली इमारतों के अलावा छोट मकानों में भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य किया है। बिना रेन वाटर हार्वेस्टिंग के मकान का नक्शा पारित नहीं होगा। लेकिन निगम की इस स्कीम की गति काफी धीमी है। 
भू-गर्भ जलस्तर को बनाये रखने के लिए और नदी-नाले तथा जलाशयों का संरक्षण जरूरी है, जो नहीं हुआ। समय के साथ जलाशयों पर कंक्रीट का निर्माण होता गया। शहर के आसपास फैले ग्रीनलैण्ड में निर्माण भी खूब हुआ। खेत-खलिहान भी शहरीकरण भी भेंट चढ़े और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गये। परिणामस्वरूप भू-गर्भ स्तर नीचे जाता रहा और यहां के तापमान में भी बढ़ोत्तरी होती चली गयी। रांची नगर निगम और आरआरडीए ने कभी जलस्तर को बनाये रखने की दिशा में कभी कोई गंभीर पहल नहीं की। हालांकि पिछले कुछ समय से शहर में तालाबों के सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्धार का काम शुरू किया गया है। मगर यह प्रयास नाकाफी है।
ब्रिटिश भू-गर्भ शास्त्री ने दी थी चेतावनी 
रांची समेत आसपास के पठारी क्षेत्रों में भू-गर्भ जलस्तर विश्वसनीय नहीं है। इसको लेकर ब्रिटिश आर्मी विशेषज्ञ व भू-गर्भ शास्त्रियों ने चेतावनी दी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि रांची का पठारी क्षेत्रों में चट्टानों के ऊपर मात्र 15 से 20 फुट मिट्टी की परत है। यह मिट्टी जब बारिश के पानी को सोखती है तो वह पानी चट्टनों के बीच से कुआं, बोरिंग और दूसरे जल स्रोतों तक पहुंचती है। ब्रिटिश आर्मी ने रिपोर्ट के आधार पर लिखा कि रांची और आसपास के भू-गर्भ जल स्तर निर्भर रहकर कोई बड़ी योजना की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन रांची समेत आसपास के क्षेत्रों में जलस्तर को बेहतर करने के लिए जलाशयों को निर्माण कराया। वर्ष 1946 में ही तत्कालीन ब्रिटिश भू-गर्भ शास्त्री जेबी ऑडेन ने यहां के पठारी क्षेत्रों का दौराकर धिकाधिक जलाशयों के निर्माण करने की सलाह दी थी। ब्रिटिश शासन के बाद केन्द्रीय भू-गर्भ जल बोर्ड भी लम्बे समय से भू-गर्भ जल स्तर को लेकर चेतावनी जारी करता रहा, लेकिन इसे लेकर सरकार के अलावा आमजन भी कभी गंभीरता से नहीं लिया। नतीजा हर साल रांची शहर का जल स्तर एक से तीन मीटर तक नीचे जा रहा है।
अंधी विकास दौड़ किस काम की
विकास की अंधी दौड़ में सभी यह भूल गये की प्रकृति को संतुलित रखे बिना विकास का स्वरूप भयावह हो सकता है। शहर में फ्लैट कल्चर के अलावा भू-गर्भ जल स्तर को बर्बाद करने में हम सभी दोषी हैं। जल का दोहन करते रहे, लेकिन बारिश के जल का संचयन नहीं किया। जमीन के अंदर बारिश का पानी नहीं पहुंचने के कारण जल स्तर प्रभावित होता रहा। पर्यावरणविद् और भू-गर्भ शास्त्री डा. नीतीश प्रियदर्शी  की सलाह है कि नदी-नालों को प्रदूषण मुक्त करते हुए उसके संरक्षण पर ध्यान देना जरूरी है। नदी-नालों पर कम से कम दो सौ मीटर की दूरी पर चेकडैम बनाकर बारिश के पानी को रोककर भू-गर्भ जल स्तर को बेहतर किया जा सकता है। खुले स्थानों पर पेड़-पौधे लगाकर भी बारिश के पानी को आकर्षित किया जा सकता है। यही नहीं, भू-गर्भ जल पर निर्भरता को कम करने की जरूरत है। सरकार जलापूर्ति के माध्यम से लोगों को पानी उपलब्ध करायेगी तो प्राकृतिक रूप से भू-गर्भ जल का दोहन कम होगा। हर व्यक्ति को चाहिए की वह पानी की बर्बादी को रोके तथा अधिकाधिक बारिश के पानी प्राकृतिक संचयन करे तो स्थिति को बहुत हद तक नियत्रंण किया जा सकता है।
झारखंड में भू-गर्भ जलस्तर की स्थिति
वर्ष जलस्तर की गिरावट (मीटर में)
2004 1.5
2005 2.2
2006 2.4
2007 3.5
2008 4.0
2009 5.0
2010 6.0
2011 7.0
2012 7.1
2013 8.5
2014 9.0
2015 9.1
2016 9.3
2017 9.7