भूदान की जमीन से वंचित गरीब

2018-12-10

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-दयानन्द राय

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महामना बिनोवा भावे के भूदान यज्ञ में हिस्सा लेनेवाले भूदानकर्मियों की हालत बदतर है. उन्हें 2010 के बाद से न तो मानदेय मिला है और न ही दूसरी कोई सुविधा. ऐसे में 2010 के बाद से ही भूदान की जमीन भूमिहीनों में बंटवारा नहीं हो पा रहा है. इससे गरीब भूमिहीनों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है. भूदान यज्ञ कार्यकर्ता और रांची भूदान यज्ञ कार्यालय की देखरेख करनेवाले फौजी चौधरी ने बताया कि 2010 के पहले तक गरीब भूमिहीनों में भूदान में मिली जमीन बांटी जाती थी, पर अब सिर्फ कागजात की देखरेख का काम होता है. इसकी वजह यह है कि भूदान यज्ञ कमेटी को सरकार ने बजट देना बंद कर दिया है. 2010 के बाद से बजट का आवंटन भूदान यज्ञ कमेटी को नहीं हुआ है. पहले भूदान यज्ञ को सालाना 22 से 23 लाख रुपये बजट का आवंटन होता था. इसी राशि से भूदान यज्ञ कार्यकर्ताओं को मासिक ढाई से तीन हजार रुपये मानदेय मिलता था.
हालत खराब है ऑफिस की
रांची स्थित भूदान कार्यालय की हालत खराब है. यह अंग्रेजों के जमाने में बने हाजत की दो कोठरियों में संचालित हो रहा है. यहां न तो पीने के पानी की व्यवस्था है और न बिजली है. ऐसे में काम करने में बहुत मुश्किल आ रही है. 2008 से ही भूदान यज्ञ कार्यालय अंग्रेजी राज में बने हाजत के कमरों में चल रहा है. इन दो कमरों में से एक में भूदान में मिली जमीनों के कागज रखे गये हैं और दूसरे में कार्यालय का संचालन होता है.
सपना तो पूरा हुआ पर सरकार भी ध्यान दे
फौजी चौधरी ने बताया कि बिनोवा भावे महामना थे और उनका भूदान यज्ञ का सपना पूरा हुआ. हजारों भूमिहीनों को दान में मिली जमीन बांटी गयी, पर सरकार को भी इसपर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने बताया कि रांची और खूंटी जिले में भूदान यज्ञ के दौरान 21 हजार 558.71 डिसमिल जमीन दान में मिली थी. इसमें से 6215.34 डिसमिल जमीन बांटी जा चुकी है. इसमें से 1301.14 डिसमिल जमीन अयोग्य है और 14042.23 डिसमिल जमीन बांटी जानी बाकी है. इसी तरह लोहरदगा में 8263.82 डिसमिल जमीन दान में मिली थी. इसमें से 2760.58 डिसमिल जमीन बांटी जा चुकी है, वहीं 5503.24 डिसमिल जमीन बंटने के लिए बाकी है.
कोई नहीं चाहता जमीन बंटे
भूदान की जमीन गरीबों को मिले इस प्रयास में जुटे हाईकोर्ट के वरीय अधिवक्ता  और रांची बार काउंसिल के सदस्यक एके राशीदी ने बताया कि भूदान आंदोलन का मकसद बेघरों और गरीबों को जमीन देना था. पर ऐसा न तो सरकार चाहती है और न दानदाता. हाल यह है कि दानदाता के परिजन दान में मिली जमीन बेच रहे हैं. भू माि‍फया भी ऐसी जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं. इससे भूदान यज्ञ का मूल उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है. इस मसले पर हमने झारखंड हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी पर कोर्ट के फैसले के बावजूद इस दिशा में बहुत कुछ नहीं हुआ है. वहीं इस बाबत रांची डीसी राय महिमापत रे ने बताया कि इतने दिनों तक भूदान यज्ञ कर्मियों को मानदेय नहीं मिलना तर्कसंगत नहीं जान पड़ता. अगर ऐसा है तो वे मामले की जांच करायेंगे
तेलांगना में शुरु हुआ था भूदान आंदोलन
गौरतलब है कि भूदान आंदोलन की शुरुआत 1951 में बिनोवा भावे ने की थी. यह तेलांगना के पोचमपल्ली1 गांव से शुरु हुआ था. इसका मकसद कानून के अलावा स्वै्च्छिक तौर पर भूमि जमींदारों से लेकर गरीब भूमिहीनों को उपलब्ध् कराना था.