राइस बियर से रसा तक का सफर

2018-12-11

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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 “सुदूरवर्ती गांव की एक सात वर्षीय बच्ची अपनी मां के साथ ग्राहकों के गिलास में हाड़िया (राइस बियर) भर्ती. पिता नशे में धुत मां को पीटता.सुबह-शाम घर में गाली-गलौज के शोर-शराबे होते. जब इसी बच्ची को एक खेल के खिलाड़ी बनने का शौक चढ़ा तो घर की उलझने आड़े आने लगीं. लेकिन शौक जुनून में बदला तो सफर शुरू हो गया और रास्ते आसान. अब तो यह बच्ची सफलता की मंजिल के काफी करीब है.”
एक सांस में कोच आनंद प्रसाद गोप, शीतल टोप्पो के बारे में ये सब बताकर चुप हो गए. कुछ सेकेंड बाद उन्होंने शीतल की तरफ इशारा करते हुए कहा कि आगे वो खुद अपने संघर्ष  के सफर को बताये तो अच्छा है. 
उन्नीस साल की शीतल एक आदिवासी लड़की है जिसका घर रांची से 20 किलोमीटर दूर ओरमांझी प्रखंड के बरतोली गांव में पड़ता है. गांव में लगभग सभी आदिवासी घरों में झारखंड की पारंपारिक शराब यानी हाड़ियां परोसी जाती है. लेकिन शीतल की मां गांधी देवी ने घर में यह रिवाज 2014 के बाद से छोड़ दिया है और इसकी वजह उनकी बेटी शीतल को मिल रही शोहरत और मकबूलियत है.
दरअसल, शीतल टोप्पो झारखंड में तेजी से उभरती हुई एक ऐसी महिला फुटबॉलर है।  शीतल को उसके खेल की बदौलत फीफा ने रूस में आयोजित फुटबॉल वर्ल्ड कप में बतौर मेहमान मैच देखने के लिए आमंत्रित किया. यहां शीतल ने एक जुलाई को रुस और स्पेन के बीच खेले गए बेहद रोमांचक मैच का बतौर मेहमान लुफ्त उठाया.
राइस बियर से रसा में फीफा की मेहमान
शीतल अपने राइस बियर से रसा (रूस) तक पहुंचने के सफर के बारे में बताती है- “मुझे अभी भी यकीन नहीं होता है कि एक शराब चुलाने वाली लड़की रूस में फुटबॉल विश्व कप का मैच देखने गई थी, वो भी फीफा की मेहमान बनकर. जिस हवाई जहाज को देखने घर से बाहर निकलते थे, उस पर बैठना सचमुच उसके लिए सपने जैसे था.”
झारखंड ने जब अंडमान निकोबार में अंडर-17 नेशनल फुटबॉल कप (2015-16) का खिताब अपने नाम किया था, तो जीत का सेहरा शीतल के सर बंधा था. उन्होंने इस टूर्नामेंट में कुल 13 गोल दागे और मैन ऑफ द टूर्नामेंट बनीं.
शीतल याद करती हैं- “बचपन में जब अपने गांव में लड़कों को फुटबॉल खेलते देखती थी, तब मन में एक इच्छा होती थी कि मैं भी फुटबॉल खेलूं. लेकिन ये सब मुमकिन नहीं था. मां को जब कहती कि मैं भी फुटबॉल खेलूंगी तो पिता की फटकार लगती. घर हाड़िया बेचकर ही चलता था और मेरा काम मां का हाथ बटाना था. थोड़ी बड़ी हुई तो फुटबॉलर बनने की इच्छा और बढ़ गई. इस बार मां का तो साथ मिला, लेकिन गली, मुहल्ले में फुटबॉल खेलने पर लड़के और बुजुर्ग ताना मारते. पर आज वही लोग घर पर आकर मां-पिता को बधाई देते हैं.”
शीतल के पिता बारगी उरांव पुराने दिनों का जिक्र करना नहीं चाहते हैं. तब के अपने आचरण पर उन्हें बहुत अफसोस है. एक बारगी शीतल के सर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं- “अब हमारी बेटी हमारी शान. इसने पूरे परिवार को बदल डाला है. हमने इसी की वजह से पीना छोड़ दिया और इसकी मां ने हाड़िया बेचना बंद कर दिया है.”
परिवार में मां-बाप के अलावा भाई विजय और बहन शीला, शीतल को भी उम्मीद है कि जल्द ही शीतल देश के लिए फुटबॉल खेलेगी.
फुटबॉल संघ ईमानदारी दिखाये
वरिष्ठ खेल पत्रकार सुभाष डे शीतल की उपलिब्ध पर कहते हैं- “विपरित परिस्थितियों में शीतल का यहां तक पहुंच पाना बहुत बड़ी बात है. इतनी बधाओं के बावजूद खेल के प्रति जो प्रतिबद्धता इस लड़की ने दिखाई है, मुझे लगता है कि ऐसी ही ईमानदारी झारखंड फुटबॉल एसोसिएशन दिखाये तो कई और अच्छे खिलाड़ी सामने आयेंगे.” 
वहीं शीतल का कहना है कि उनका अगला लक्ष्य है झारखंड अंडर-19 के लिए जमकर प्रैक्टिस करना और भविष्य में भारतीय महिला फुटबॉलर टीम के लिए खेलना. उन्हें उम्मीद है कि जब वो देश लिए खेलना शुरू करेंगी तब भारत फुटबॉल वर्ल्ड कप में क्वालीफाई कर चुका होगा.
शीतल फुटबॉलर बनने का श्रेय अपनी मां के साथ-साथ ऑस्कर फाउंडेशन को भी देती हैं. उनके मुताबिक मां का साथ और ऑस्कर की मदद उन्हें नहीं मिल पाती तो शायद वो यहां तक नहीं पहुंच पाती.वो कहती हैं कि जब वो ऑस्कर फाउंडेशन के आनंद प्रसाद गोप और हीरालाल के संपर्क में आयीं तब उन्होंने उनसे फुटबॉल खिलाड़ी बनने की अपनी इच्छा बतायी. इसके बाद संस्था से जुड़कर पढ़ाई के साथ-साथ फुटबॉल की ट्रेनिंग लेनी शुरू की. ऑस्कर फॉउंडेशन रांची के आठ पंचायतों से लगभग 600 लड़के-लड़कियों को पढ़ाई के साथ-साथ फुटबॉल का प्रशिक्षण दे रहा है. फिलहाल मैट्रिक, इंटर फर्स्ट डिवीजन पास करने के बाद शीतल रांची केमरवाड़ी कॉलेज के बीकॉम में फर्स्ट ईयर की छात्रा हैं.
हर टूर्नामेंट का चेहरा बनी
डिस्ट्रिक्ट लेवल पर फुटबॉल खेल चुके और शीतल के कोच आनंद कहते हैं कि शीतल में फुटबॉल के प्रति गजब का जुनून है. वो प्रैक्टिस के दौरान मैदान पर नये-नये शॉट का एक्सपेरिमेंट किया करती है. 2013 में वह संस्था के संपर्क में आयी और पांच साल के अंतराल में उसने राष्ट्रीय स्तर के कई टूर्नामेंट खेले. जिन टूर्नामेंट में झारखंड विजेता, उपविजेता और तीसरे स्थान पर रहा उनमें शीतल ही प्रमुख चेहरा रही.
झारखंड नेशनल वीमेंस फुटबॉल फेडरेशन कप (2014-15) में उपविजेता रहा, जिसमें शीतल ने कुल 7 गोल दागे. स्कूल गेम्स फेडरेशन ऑफ इंडिया कप (2015) का झारखंड ने खिताब जीता, तो पांच गोल शीतल के नाम रहा. इसी तरह ऑल इंडिया फेडरेशन जूनियरनेशनल फुटबॉल चैंपियनशिप (2017-18) में 7 गोल और नेशनल इंक्लूजन कप (2017) में टीम विनर रही तो शीतल टूर्नामेंट में 12 गोल के साथ टॉप पर थी. उनके कोच बताते हैं कि ऐसे तो शीतल इन साइड और आउट साइड फॉरवर्ड से भी अच्छा खेलती है. लेकिन इन टूर्नामेंट में सेंटर फॉरवर्ड से खेलते हुए ही इतने गोल किए हैं.
फीफा फुटबॉल वर्ल्ड कप का मैच देखने के लिए भारत से 13 खिलाड़ी रूस गये थे. झारखंड में जब ऑस्कर फाउंडेशन को ये मौका प्राप्त हुआ, तब संस्था ने सर्वश्रेष्ठ 30 खिलाड़ियों का ट्रायल करवाया. सबको पछाड़ते हुए शीतल टोप्पो और सोनी मुंडा ने इसके लिए क्वालीफाई किया.
संघ और विभाग को नहीं है जानकारी
झारखंड फुटबॉल संघ को शीतल टोप्पो की प्रतिभा का संज्ञान तो है, लेकिन संघ के सचिव गुलाम रब्बानी कहते हैं कि इसमें संघ कोई हस्तक्षेप नहीं करता है. उनका कहना है कि संघ सिर्फ ओपन नेशनल टूर्नामेंट देखता है. जबकि शीतल टोप्पो स्कूल नेशनल टूर्नामेंट खेलती है जिसे खेल विभाग देखता है. इसलिए संघ के पास इसकी ज्यादा जानकारी नहीं होती है. इधर राज्य के खेल निदेशक कहते हैं कि उन्हें इस तरह के किसी खिलाड़ी के बारे में मालूम नहीं है.