सूखे की मार झेल रहे अन्नदाताओं की आह!

2018-12-11

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक- ब्रजेश राय

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पहले मॉनसून ने दगा दिया फिर माननीय नेताओं ने उससे बड़ा जख्म दे दिया. भूमि अधिग्रहण बिल को वापस लेने के साथ धर्मांतरण और ईसाई मिशनरियों को निशाना बनाने के आरोप को लेकर विपक्ष गला फाड़ता रहा. सत्ता पक्ष इसपर हंसी ठिठोली के साथ मजा लेता रहा. शायद धरना-प्रदर्शन राज्य के सबसे बड़े पंचायत सदन की नियति बन गई है. इसका सबसे तकलीफदेह पहलू यह है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास भी यह जानते हैं कि सिंचाई के अभाव में झारखंड के किसान खेती को लेकर भारी चिंता में डूबे हैं. बावजूद इसके सदन में न तो कृषि और किसानों के साथ खाद्यान्न उपलब्धता पर कोई चर्चा हुई और न ही कोई प्लानिंग. मतलब साफ है, पलायन और किसानों के आंसू एक बार फिर देखना तय है.
पद्मश्री किसान सिमोन उरांव से लेकर दूसरे किसान वो चाहे दिलेश्वर महतो हों, मो. एजाज हों या फिर कारो मुंडा, सभी नेताओं के व्यवहार और सोच को लेकर आहत हैं. किसानों के मन में पीड़ा है कि जहां घर में अनाज अब खत्म होने को है वहीं बाहर दैनिक रोजगार की किल्लत है. ऐसे में कैसे पेट भरेंगे? इन परिस्थितियों के लिए राज्य के किसान अपनी किस्मत के साथ-साथ माननियों को भी कोस रहे हैं.
18 लाख हेक्टेयर लक्ष्य के विपरीत अब तक 2.38 हेक्टेयर पर धान की रोपनी
गुमला और पश्चिम सिंहभूम जिले को छोड़कर पूरे राज्य में अब तक धान की रोपनी (बुआई) महज 13 से 14 प्रतिशत ही हो सका है. कृषि विभाग ने इस साल का लक्ष्य 18 लाख हेक्टेयर रखा है जबकि धान की रोपनी महज 2.38 लाख हेक्टयर भूमि पर ही हुई है. कृषि मंत्री ने 31 जुलाई तक बारिश के समय का इंतजार करने की बात कही है.
झारखंड में मॉनसून की बारिश नहीं होने से किसानों के सामने गंभीर संकट पैदा हो गया है. इन दो जिलों (गुमला और पश्चिम सिंहभूम) को छोड़ कर कहीं भी धान की रोपनी शुरू नहीं हुई है. जुलाई के प्रथम सप्ताह तक मात्र 1.11 लाख हेक्टेयर भूमि में रोपनी हो पाई है. गुमला में 40 और पश्चिमी सिंहभूम में 71 हजार हेक्टेयर भूमि में रोपनी की गई है. विलंब से बारिश होने पर किसान धान की रोपनी तो कर लेंगे, लेकिन उसका सीधा असर पैदावार पर पड़ेगा. कृषि विभाग 31 जुलाई तक हालात पर नजर रखने की बात कह रहा है.
पिछले साल जुलाई के प्रथम सप्ताह तक अधिक रोपनी हुई थी. इस वक्त तक राज्य के आधे से अधिक जिलों में धान की रोपनी शुरू हो गई थी. विभाग ने 17.70 लाख हेक्टेयर भूमि में रोपनी का लक्ष्य रखा था, जिसके विरुद्ध पिछले साल इस समय तक 1.51 लाख हेक्टेयर में रोपनी हो चुकी थी. इस साल कृषि विभाग ने 18 लाख हेक्टेयर भूमि में धान की बुआई का लक्ष्य रखा है, लेकिन हालात देखकर कहा जा सकता है कि यह लक्ष्य हासिल करना दूर की कौड़ी है.
कृषि प्रधान झारखंड में इस साल कम बारिश से तय लक्ष्य से काफी कम क्षेत्र में धान की बुआई हो सकी है
अभी तक सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश हुई है और मात्र 11 प्रतिशत धान की रोपाई हो पाई है. चिंता की बात है कि राज्य के 12 जिलों में बुआई का काम शुरू भी नहीं हुआ है. पिछली बार 6 जुलाई तक 82.9 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जबकि इस बार 49.4 मिलीमीटर ही बारिश हुई है. पिछले साल जून में 196 मिमी सामान्य बारिश होने का अनुमान था, लेकिन 97.8 मिमी बारिश हुई थी. इस बार जून में पिछले साल की तुलना में 29.97 मिमी कम बारिश हुई है. 196 मिमी सामान्य बारिश के अनुमान के विरुद्ध 67.03 मिमी कम वर्षापात दर्ज किया गया है.
पिछले वर्ष से इस बार राज्य में कम हुई है बारिश
रांची बेड़ो प्रखंड के कृषि सलाहकार बिंदेश्वर महतो बताते है पिछले वर्ष 17 जुलाईं तक 190 एमएम वर्षा हुई थी. मगर इस वर्ष 17 जुलाई तक मात्र 88.4 एमएम वर्षा हुई है. गत वर्ष की तुलना में इस साल 112.4 एमएम कम बारिश हुई है. जल पुरुष किसान पद्मश्री सिमोन बताते हैं कि क्षेत्र में 17 जुलाई तक धान की रोपनी हो जाती है, लेकिन इस साल बरसात नहीं होने से खेतों में पानी नहीं है. दीगर बात यह भी है कि 15 अगस्त से बारिश कम होने लगती है. धान की रोपनी नहीं होने से क्षेत्र के किसान परेशान हैं.
फिलहाल हालात को देखकर रघुबर सरकार भी फिक्रमंद है और किसानों के राहत के लिए विचार-विमर्श कर रही है. कृषि मंत्री ने बताया कि सरकार जल्द ही किसानों के लिए वैकल्पिक खेती को प्रोत्साहन देने की योजना बनाएगी, लेकिन 31 जुलाई तक का इंतजार करना पड़ेगा. सरकार की मानें तो डेयरी फार्मिंग से लेकर मुर्गी पालन और सब्जी उत्पादन की दिशा में प्लानिंग की जा रही है.
पठारी क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा हमेशा से एक चुनौती है जो झारखंड में भी दिखता है. बावजूद इसके अलग राज्य बनने के 18 साल बाद भी झारखंड में जल संचयन पर कोई ठोस पहल नहीं हो सका है. आनन-फानन में पिछले साल सरकार ने 4 लाख डोभा यानी छोटा तालाब बनाने का दावा किया. देश के प्रधानमंत्री ने भी कागजी रिपोर्ट पर राज्य सरकार की पीठ थपथापाई थी पर जमीनी सच्चाई यही है कि आज भी महज 19 प्रतिशत सिंचाई सुविधाओं के साथ झारखंड के किसान इंद्रदेव की कृपा पर ही निर्भर है. मॉनसून कमजोर और समय से बारिश नहीं तो सब कुछ चौपट. 
मॉनसून का असर दूसरे फसलों पर भी पड़ा है. इस साल धान के अलावा 3.12 लाख हेक्टेयर भूमि में मक्का, 6.12 लाख हेक्टेयर में दलहन और 60 हजार हेक्टेयर में तिलहन की खेती करने का लक्ष्य निर्धारित है, जबकि मक्का 54 हजार हेक्टेयर, दलहन 27 हजार हेक्टेयर और तिलहन मात्र 4 हजार हेक्टेयर में ही लग पाया है. खरीफ में नकदी फसल जैसे बैंगन, मकई की खेती करने वाले किसान बताते है कि बर्षा नहीं होने से फसल मर रहे हैं और तैयार फसल में कीटाणु लग रहे हैं. वहीं हरी सब्जियों की कीमत में गिरावट आने से आर्थिक रूप से किसान टूटते जा रहे हैं. 
किसान अभी से टूटने लगे हैं यह बात अंदाजा लगाने के लिए काफी है. दुर्भाग्य है कि कृषि प्रधान देश में हमारे अन्नदाता भी ओछी राजनीति के शिकार हो जाते हैं. ऐसा लगता है कि झारखंड में किसान दया और सहानुभूति के पात्र बनकर रह गए हैं. जो न तो वर्तमान के लिए ठीक हैं और न ही भविष्य के लिए.