फ्री एम्बुलेंस फॉर इन्जर्ड

2018-12-11

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-साक्षी अग्रवाल

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ऑटो एम्बुलेंस! जी हां। सही पढ़ा! यह सरकार द्वारा शुरू की कोई नयी सुविधा नहीं है, बल्कि हमारे बीच से ही निकले एक साधारण आदमी की नेक पहल है...
रांची के 55 वर्षीय अल्लाउद्दीन अंसारी ऑटो चालक हैं, और पिछले कई वर्षों से ऑटो चलाकर अपना और परिवार का गुज़र-बसर कर रहे हैं। पर इन दिनों अल्लाहउद्दीन लोगों के लिए मिसाल बने हुए हैं और उनका ऑटो सड़क पर पड़े घायलों के लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं। उनके ऑटो के पीछे अंकित यह चार शब्द 'फ्री एम्बुलेंस फ़ॉर इन्जर्ड', ना जाने कितनों की उम्मीद है। अल्लाहउद्दीन अपने ऑटो को मात्र  कमाई का जरिया नहीं समझते हैं। वो इससे लोगों की निशुल्क मदद भी करते हैं। सड़क हादसे में घायल जिस भी व्यक्ति पर उनकी नज़र पड़ती है वो बिना कुछ सोचे उसे नज़दीकी अस्पताल ले जाते हैं।
एक धारावाहिक से मिली प्रेरणा
अल्लाहउद्दीन बताते हैं कि वो ऑटो एम्बुलेंस सेवा पिछले चार वर्षों से दे रहे हैं और उन्हें इसकी प्रेरणा धारावाहिक सत्यमेव जयते से मिली। उसमें यह बताया गया कि भारत में अधिकांश मौतें सड़क दुर्घटनाओं में होती है। सड़क पर पड़ा घायल सही समय पर अस्पताल नही पहुंचा पाता है, क्योंकि पुलिस के डर से लोग मदद के लिए सामने नहीं आते हैं। शो से प्रेरित होकर अल्लाहउद्दीन ने ठान लिया कि वे ऑटो एम्बुलेंस की सुविधा शुरू करेंगे।
परमिट के बिना होती है दिक्कत
अल्लाहउद्दीन के इस नेक काम के बीच परमिट रोड़ा बना हुआ है.. प्रशासन की ओर से परमिट नहीं दिया जा रहा.. जिस वजह से कई बार उनकी गाड़ी को पुलिस थाने के चक्कर भी लगाने पड़ते हैं। अल्लाहउद्दीन बताते हैं कि एक बार मरीज को रिम्स ले जाने को दौरान पुलिस ने उनकी गाड़ी पकड़ ली और मिन्नतों के बाद भी नहीं छोड़ा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था। ऐसा उनके साथ अकसर होता रहता है... उनका कहना है कि अगर परमिट बन जाये तो वे आसानी से बिना किसी डर के जरूरतमंदों को ऑटो एम्बुलेंस की सेवा दे पाएंगे...
मानव ही मानव के काम आएगा
अल्लाहउद्दीन मानते हैं कि दूसरे के काम आकर ही हम मानव जीवन को सार्थक बना सकते हैं। वे बताते हैं कि हर रोज़ सुबह ऑटो निकलने से पहले उनकी यही दुआ रहती है कि आज जिस भी जरूरतमंद को उनकी जरूरत हो, वे वहां मौजूद रहें। अल्लाहउद्दीन का कहना है कि लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा करके जो सुकून मिलता है, उसकी तुलना पैसों से नहीं की जा सकती, इसलिए कई बार तो उन्होंने यात्रियों को छोड़ घायल को अस्पताल पहुंचाया है।
परिवार का भरपूर सहयोग
अल्लाहउद्दीन  के परिवार में बूढ़े मां-बाप, पत्नी और तीन बच्चे हैं। वे बताते हैं कि उनके इस काम को परिवार का पूरा सहयोग मिला। अल्लाहउद्दीन यह काम ताउम्र करना चाहते हैं।