सिमटते जंगलों में गुम होते बाघ

2018-12-11

|

तस्वीर द्वारा-

|

लेखक-परम

image

image

वर्षों से देश में बाघों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। बाघों की घटती संख्या चिंता का विषय है. झरखंड के एकमात्र टाइगर रिजर्व पलामू में है. विशेषज्ञों की ताजा रिपोर्ट बताती है कि इस टाइगर रिजर्व में बाघों की दहाड़ अब सुनाई नहीं देती. यदा-कदा वन्य जीवों की गणना के क्रम में बाघों के होने की पुष्टि जरूर हो जाती है. लेकिन यह तो मानना होगा कि पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या में खासी कमी आई है. पशु तस्करी, मानव-वन्य जीव द्वंद्व, ग्रामीणों की वनों पर बढ़ती निर्भरता और नक्सली ऑपरेशन समेत तमाम ऐसे कारणों ने इस वन्य जीव की संख्या को कम करने का काम किया है. 
झारखंड में बाघों की संख्या को लेकर कोई सटीक आंकड़ा प्रस्तुत नहीं किया गया, फिर भी 1992 में पलामू में बाघों की संख्या 55 बतायी गयी थी जो कि राज्य गठन यानी सन 2000 तक घटकर 36 हो गयी. इसके बाद नयी तकनीक से 2012 के बाद जब गणना शुरू हुई तो यह आंकड़ा सिमट कर तीन-चार हो गया. वर्तमान में इनकी संख्या छह बतायी जा रही है. बाघों की गणना के सम्बंध में पलामू टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर अनिल मिश्रा बताते हैं कि बाघों की गणना का अब तक कोई सटीक तरीका नहीं अपनाया गया. सिर्फ बाघों के पैरों के मार्क के आधार पर ही गणना होती थी. वर्तमान में गणना नयी तकनीक और वैज्ञानिक पद्धति से की जाती है। बाघों की गणना में डीएनए सैंपल और कैमरा ट्रैप के फोटो को भी शामिल किया गया है. श्री मिश्रा के अनुसार, पहले देशभर में बाघों की संख्या 5000 बताई जाती थी, फिर यह अचानक घटकर 1406 हो गई। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर हुए दो सर्वे में इनकी संख्या 1722 और 2222 बताई गई। उन्होंने कहा कि देहरादून स्थिति वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ने भी झारखंड में छह बाघों के होने की पुष्टि की है। यह कम से कम आंकड़ा है, हमें उम्मीद है कि पलामू में बाघों की संख्या और बढ़ेगी
1974 में बना था पलामू टाइगर रिज़र्व
झारखंड में बाघों के संरक्षण को लेकर 1974 में पलामू टाइगर रिजर्व की स्थापना की गई थी. वन प्रमंडल पदाधिकारी बफर एरिया में 250 के लगभग कर्मी कार्यरत हैं. इस प्रोजेक्ट को पिछले 39 वर्षों से प्रति वर्ष विस्तार मिलता आ रहा है. घोर नक्सल प्रभावित इस क्षेत्र में बाघों को विलुप्त होने से बचाने के लिए इनके देख-रेख और संरक्षण के मद अब तक अरबों रुपये खर्च किए जा चुके हैं. हालांकि इतना खर्च होने के बाबजूद यह आरोप भी लगते रहे कि यहां कितने बाघ मौजूद है इसकी सही-सही जानकारी तक अधिकारियों के पास नहीं है.
सन 1974 में हुए पहले बाघ जनगणना में इनकी संख्या 22 बताई गई थी, जो 1984 में बढ़कर 68 हो गई. जबकि 2004 आते-आते ये घटकर 38 रह गई. वहीं आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी से यह सनसनीखेज खुलासा भी हुआ था कि वर्तमान में इनकी संख्या मात्र 2 है.
हाईकोर्ट की भी नजर
झारखंड हाइकोर्ट में झारखंड के जंगलों व बाघों की घटती आबादी को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई थी. जस्टिस अपरेश कुमार सिंह व जस्टिस बीबी मंगलमूर्ति की खंडपीठ ने सुनवाई के दाैरान राज्य सरकार के जवाब को देखते हुए मौखिक रूप से पूछा कि झारखंड से बाघ छत्तीसगढ़ चले जाते हैं, तो क्या झारखंड में दूसरे राज्यों से बाघ आते हैं?  पलामू व्याघ्र परियोजना में बाघों की संख्या में वृद्धि क्यों नहीं हो रही है? इस पर सरकार की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया. खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 दिसंबर की तिथि निर्धारित की.
राज्य सरकार की सफाई
इससे पूर्व राज्य सरकार की ओर से खंडपीठ को बताया गया था कि पलामू व्याघ्र परियोजना में वर्तमान में छह बाघ हैं. उग्रवादियों की गोलीबारी के कारण भी कुछ बाघ छत्तीसगढ़ भेजे गये हैं. नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी, राज्य सरकार व पलामू व्याघ्र परियोजना के बीच एमओयू हुआ है. एमओयू के तहत कार्य किया जा रहा है.
इस बात का अध्ययन किया जा रहा है कि झारखंड के जंगलों में बाघ क्यों कम हो रहे हैं. व्याघ्र परियोजना में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की टीम सर्वे कर रही है, जो अक्तूबर-2018 तक पूरा हो जाने की संभावना है. परियोजना के समीप अवस्थित आठ गांव के लोगों के पुनर्वास पर कार्य चल रहा है. चेक डैम भी बनाये गये हैं.  
दलमा अभयारण्य से भी बाघ नदारद
दलमा वन्यजीव अभयारण्य भी बाघों के लिए जाना जाता है पर इन दिनों यहां भी बाघ का टोटा है. जिस जंगल में बाघ पाए जाते हैं, उस जंगल को समृद्ध माना जाता है. दलमा के जंगल में अक्सर बाघ देखे जाते हैं, पर वे कुछ दिनों बाद लौट जाते हैं. आखिरी बार 16 अगस्त 2016 को दलमा में पर्यटकों की नजर बाघ परिवार पर पड़ी थी. कुछ लोगों ने वीडियो बनाया तो कुछ लोगों ने फोटोग्राफी की। सरकारी अफसरों के परिवार ने भी वीडियो बनाकर भेजे थे।तब अधिकारियों ने अधिकृत तौर पर स्वीकार किया था कि दलमा जंगल में कुल चार बाघ हैं। इनमें से दो शावक और दो उनके माता-पिता हैं.
दलमा में बढ़ने वाला बाघ परिवार पिछले महीने ओडिशा के सिमरीपाल जंगल लौट गया। बाघ का जोड़ा इसी जंगल से आया था. दलमा में दो शावकों को जन्म देने के लगभग छह महीने तक परिवार घने जंगल में इतराता रहा. जैसे ही बच्चे चलने लायक हुए तो बाघ परिवार के बच्चे घाटशिला के रास्ते ओडिशा के जंगल लौट गए.
बाघ प्रजनन के लिए उपयुक्त दलमा
दलमा का जंगल बाघ प्रजनन के लिए काफी उपयुक्त माना जाता है. प्रजनन के लिए यहां की शांति बाघ परिवार को भाती है. दलमा में सबसे पहले 1978 में बाघ देखा गया था, तब ग्रामीणों में काफी खौफ था.
बेतला में भी बाघ दिखने के बीत
कभी देश का प्रमुख टाइगर रिज़र्व रहे पलामू के बेतला नेशनल पार्क में लंबे अरसे बाद बाघ की मौजूदगी की पुष्टि हुई है. इस बाघ को सबसे पहले यहां घूमने आए पर्यटकों ने देखा और बाघ की तस्वीर अपने कैमरों में कैद की. पर्यटकों के मुताबिक, बाघ इस इलाके में स्थित नुनाही नाले के पास देखा गया, जिसके बाद उन्होंने तुरंत इसकी खबर नविभाग के कर्मियों को दी. इससे पहले बेतला में आखिरी बार साल 2015 में बाघ दिखा था. इसके बाद उनके दिखने की कोई खबर नहीं आई. बाघों की निशानदेही के लिए वहां सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए, लेकिन उसमें भी कुछ हालिस नहीं हुआ. बाघ को लुप्त होने से बचाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं. इसके लिए वनकर्मियों की लंबी फौज भी यहां तैनात है, लेकिन बाघ नहीं देखे जाने की वजह से इनके औचित्य पर सवाल उठने लगे हैं.