गोरगाम : यहां होते हैं सबसे ज्यादा बाल विवाह

2018-12-22

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए के खान

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गोड्डा जिला का गोरगाम गांव सर्वाधिक बाल विवाह के लिए जाना जाता है. यह गांव गोड्डा प्रखंड में ही आता है. यहां लगभग 250 घर हैं, जहां की अधिकांश जातियां पिछड़ी जाति केचपोता समुदाय से आती हैं. यहां होने वाले बहुतायत संख्या में बाल विवाह के बारे में इस गांव की एक महिला कहती है, यहां के बड़े-बड़े घरों के लड़के-लड़कियां भाग जाते हैं और "बर्बाद" हो जाते हैं. इसलिए यहां 15 साल होते-हाेते यहां के लड़के-लड़कियों की शादी कर दी जाती है.
गोरगाम गांव की लड़कियों की 15 वर्ष की उम्र में शादी कर दी जाती है. ग्रामीणों के मुताबिक गोरगामा में बाल विवाह समास्या नहीं, बल्कि परंपरा और पूर्वजों की पहचान है.
बाल विवाह के मामले में गोड्डा जिला झारखंड में अव्वल है और देश में झारखंड का स्थान चौथा. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (एनएफएचएस) के मुताबिक गोड्डा में 63.5 फीसदी बाल विवाह होते है. गढ़वा 58.8 प्रतिशत और देवघर 52.7 प्रतिशत के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर है. झारखंड में 38 प्रतिशत बाल विवाह ही बताता है कि यहां यह समस्या कितनी विकट है.
गोरगामा के पड़ोस में एक गांव है रतनपुर. यहां के निवासी कैलाश की एक सात साल की बेटी और दो विवाहित भतीजियां हैं. दोनों भतीजियों की शादी इन्होंने कर दी है, अब इनकी विदाई (गौना) करना चाहते हैं. लोगों ने बताया कि बच्चियों की उम्र 13-14 साल की हो रही और ये दोनों छठी क्लास में पढ़ती हैं, लेकिन कैलाश  फिरयत अगले साल तक पढ़ाई छुड़वाकर इनकी विदाई कर देंगे. 
कैलाश फिरयत आगे कहते हैं, “इन बच्चियों की शादी दस वर्ष की उम्र में हो गई थी अब अगले साल इनका गौना और फिर छोटकी का ब्याह करना है जिसके जुगाड़ में अभी से ही लगना पड़ेगा. गांव वालों के लिए खेत ही जीविकोपार्जन का साधन है. मगर इस बार खेती पे निर्भर नहीं रह सकते हैं, क्योंकि धान की फसल ठीक नहीं हुई है.
वह कहते हैं, “क्या करें, हमलोगों के समाज में 10 साल के बाद कोई लड़की से शादी नहीं करेगा. दूसरे समाज में लड़की नहीं दे सकते हैं. इसलिए दस साल में ब्याह और 14-15 तक गौना कर देते हैं. और आजकल लड़के-लड़कियों के भागने का भी डर लगा रहता है.”
गांव के एक व्यक्ति ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि हमलोग पुलिस के सामने ही बाल विवाह कर देते हैं. गांव की समस्या यह नहीं है, बेरोजगारी और गरीबी असल कारण है. 
सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में 31 प्रतिशत लड़कियां स्कूल सिर्फ इसलिए छोड़ देती हैं, क्योंकि 14-19 वर्ष तक की उम्र में उनकी शादी करवा दी जाती है. 
जिला बाल सरंक्षण पदाधिकारी रितेश कुमार कहते हैं, “गांवों में बाल विवाह पहले की तुलना में काफी कम हुए हैं. हमलोग समुदाय के साथ मिलकर-बैठकर इसके विरुद्ध लोगों को जागरूर कर रहे हैं. शपथ दिलाते हैं कि ना वे बाल विवाह करेंगे और न किसी को करने देंगे. कोई चीज धीरे-धीरे खत्म होती है, न कि अचानक. लगातार प्रयास से ही बाल विवाह की प्रथा समाप्त होगी.
बाल विवाह में बहुत कमी नहीं
वहीं, झारखंड बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्षा आरती कुजूर कहती हैं कि राज्य में बाल विवाह में बहुत कमी नहीं आई है. सैकड़ों ऐसे मामले हैं जिनकी रिपोर्टिंग नहीं होती है. बाल विवाह की रोकथाम के लिए जिला प्रशासन की टीम लगी हुई, इसके रोकथाम के लिए ग्राउंड लेबल पर काम करने की जरुरत है. 
गोड्डा के सदर प्रखंड के गोरगामा के अलावा रतनपुर, बड़ी कल्यानी, राजपुरा, चारकाकोल, तरवारा, मंझवारा, ढ़ोडरी परासी समेत लगभग एक दर्जन गांव ऐसे हैं जहां 30-50 फीसदी चपोता जाति की आबादी है.स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि सरकार इसके रोकथाम के लिए जितना प्रचार-प्रसार करती है, वैसा दिखता नहीं है. जब कभी खबर छपती है तब पुलिस की धड़-पकड़ शुरू हो जाती है. 
पड़ोसी गांव की भी ऐसी समस्या 
गोरगाम से कुछ ही दूरी पर राजपुरा गांव है जहां की समस्या भी ऐसी ही है. यहां के सीता राम कहते हैं, उनकी जाति में कम उम्र में शादी हो जाती है. क्योंकि बड़ा होने पर ना लड़का मिलेगा, ना लड़की. गांव वालों के मुताबिक बड़े होने का मतलब दस वर्ष है, और पंद्रह की उम्र के बाद तो शादी की उम्र पार हो जाती है. गांव में चपोता के अलावा मुस्लिम, मंडल और यादव जाति की यहां मुख्य आबादी है.
यहां के सुधीर मंडल बताते हैं कि “लड़कियां भागने लगी हैं, लव मैरेज करने लगी हैं. बड़ा होकर ना लड़का मिलेगा ना लड़की. सूबे के गठन के बाद से अब तक 27 लाख बाल विवाह हो चुके हैं. राज्य में प्रति वर्ष 3.5 लाख विवाह होता है, जिनमें से 1.5 लाख बाल विवाह हैं.