हार कर भी जीता अनय

2018-12-22

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ए के खान

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‘मुझ पर लोगों की नजर तो पड़ती है, लेकिन उनका नज़रिया अभी भी नहीं बदला है.’ ये कहना एक ऐसे छात्र का है जो नेत्रहीन है, लेकिन नजर और नजरिये दोनों को ही परख लेता है. नाम अनय कुमार जायसवाल है और इन दिनों इनकी चर्चा कॉलेज के केंपस में खूब हो रही है.
अनय राजधानी रांची में सम्पन्न हुए छात्र संघ चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे थे. वह रांची विश्वविद्यालय और कॉलेजों के अब तक के इतिहास में पहले नेत्रहीन उम्मीदवार थे. चुनाव में 367 उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन केंद्र में अनय कुमार जायसवाल का ही नाम हो रहा था. इन्हें भाजपा के स्टूटेंड्स विंग एवीबीपी  ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि से अपना उपाध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया था.
अनय चुनाव के बारे में कहते हैं, “मैं चुनाव भविष्य की राजनीति या पॉलीटिकल पार्टियों का झंडा ढोहने के लिए नहीं लड़ा रहा हूं, बल्कि विश्वविद्यालय की कुव्यवस्था को बदलने के लिए चुनाव मैदान में हूं. मेरा मानना है कि आज भी लोगों की मानसिकता दिव्यांगों को लेकर नहीं बदली है. रांची विवि के पीजी विभाग और कॉलेजों में छात्रसंघ का चुनाव हुआ. इसके माध्यम से 80 छात्र प्रतिनिधियों का चयन किया गया. मतदान के लिए 182 मतदान केंद्र बनाये गये थे और 1.13 लाख वोटर हैं.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज से पोलिटकल साइंस में पीजी कर रहे है अनय का कहना है कि चुनाव को लेकर मेरा नज़रिया बिल्कुल साफ है. यहां हर छात्र को वो सारी सुविधा मिलनी चाहिए, जिसके वे हकदार हैं. चाहे फिर कोई दिव्यांग हो या फिर समान्य. अगर मैं चुनाव जीतता हूं तो छात्र-छात्राओं के जायज मांगों के लिए लड़ूंगा और उसे पूरा करुंगा. 
अनय के मुताबिक कॉलेज में व्यवस्था की काफी कमी है और उनके मुद्दों की फेहरिस्त लंबी है. वह कहते हैं कि लाइब्रेरी में न तो किताबें है, ना ही जगह. दिव्यांगों के लिए कंप्यूटराइज्ड और टॉकिंग लाइब्रेरी की व्यवस्था भी नहीं है. क्लास का स्ट्रैंथ बहुत ज्यादा, लेकिन शिक्षकों की संख्या बहुत कम. लड़कियों के लिए वाशरूम नहीं है और दिव्यांगों के लिए व्हील चेयर नहीं. और भी समस्याएं है, पर प्रमुख मुद्दा दिव्यांगों का है.
खुद पर हुए अन्याय ने दिया हौसला
अचानक चुनाव लड़ने के प्रश्न पर अनय कहते हैं, चार महीना पहले हॉस्टल को लेकर मैंने एक आवेदन दिया था. एक दिन मैं कॉलेज कैंपस के गड्ढे में गिर गया. तब मैंने हॉस्टल की मांग की थी. इसके लिए आवेदन दिया कि मुझे रोजाना 40 किलोमीटर दूर बुंडू प्रखंड से आना पड़ता है. आने-जाने में काफी परेशानी होती, इसलिए मुझे हॉस्टल दिया जाये, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ. तभी मैंने ठान लिया था कि छात्र संघ का चुनाव लड़ूंगा. दिव्यांगों को लेकर कॉलेज प्रबंधन की मानसिकता को बदलूंगा. महसूस किया कि जब मैं गड्ढे में गिरा तब लोगों की नजर तो मुझ पर पड़ी, लेकिन नजरिया आज तक नहीं बदला है.
अनय कुमार जायसवाल मूल रूप से बुंडू के रहने वाले हैं. इन्होंने बहू बाजार स्थित संत माइकल नेत्रहीन विद्लाय से दसवीं की पढ़ाई की. 12वीं और स्नातक की पढ़ाई पीपीके कॉलेज बुंडू कॉलेज से की. अनय केवल सफेद स्टिक के सहारे और आत्मविश्वास की बदौलत प्रत्येक दिन बुंडू से रांची आते-जाते हैं. वह बताते हैं कि उनकी दोनों आंखें एक दुर्घटना में चली गयी थीं, तब वह छठी क्लास में थे. जिंदगी खत्म हो चुकी थी और घर वालों की मुझसे उम्मीद भी. आंख खत्म हो जाने के बाद घर वालों ने पढ़ाई छुड़वा दी थी, लेकिन उनके जीजा ने पढ़ाई फिर से शुरू करवाई. अनय जायसवाल अपने यहां तक के सफर का श्रेय अपने जीजा को ही देते हैं. परिवार में अनय के अलावा तीन बहन हैं. अंत में अनय ये कहते हुए अपनी बात खत्म करते हैं, कुछ लोग सफलता के लिए संघर्ष करते हैं तो कुछ अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल. लेकिन मैं विश्वविद्यालय व्यवस्था को बदलने के लिए संघर्ष भी करूंगा और प्रतिभा का इस्तेमाल भी.