बिरसा के सच्चे अनुयायी

2018-12-22

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-रूपेश साहु

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बिरसा! तुम्हें कहीं से भी आना होगा. घास काटती दराती हो या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी. यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण से. कहीं से भी आ मेरे बिरसा! खेतों की बयार बनकर. लोग तेरी बाट जोहते.
कवि भुजंग मेश्राम की ये पंक्तियां धरती आबा बिरसा मुंडा के अनुयायी बिरसाइतों की दिनचर्या जिंदगी को चरितार्थ करती हैं. जिस किसी की नजर इन पर पड़ती है ठिठक कर देखने लगता है. इनकी जिंदगी औरों से जुदा और धरती के भगवान बिरसा मुंडा से मिलती-जुलती है. ये कहानी उनकी है, जो आदिवासियों के योद्धा-पुरखा, जिन्हें भगवान का दर्जा हासिल है. ये कहानी है बिरसा मुंडा के सच्चे अनुयायियों की.
अनुशासन और नियम-कानून के पालन के लिए बना संगठन
आदिवासियों का संघर्ष अट्ठारहवीं शताब्दी से चला आ रहा है.1766 के पहाड़िया-विद्रोह से लेकर 1857 के ग़दर के बाद भी आदिवासी संघर्षरत रहे. सन् 1895 से 1900 तक बिरसा या बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ऊलगुलान चला. बताया जाता है कि इसी दौरान बिरसा ने एक संगठन बनाया ताकि अनुशासन और नियम-कानून का पालन हो सके. बाद में यही संगठन आगे चलकर पंथ बन गया, जिसका नाम बिरसाइत पड़ा. झारखंड में इनकी आबादी लगभग एक हजार बताई जाती है. ये अधितकर खूंटी जिला के इलाकों में रहते हैं.
बिरसाइत सफेद पगड़ी और गांधी के समान सफेद धोती पहनते हैं. जबकि महिला साड़ी. बिरसाइत बाहर का भोजन नहीं करते. खुद का बनाया हुआ ही खाते हैं.  बीते महीने 14 नवंबर को राज्य के स्थापना दिवस के मौके पर करीब 250 बिरसाइत रांची पहुंचे थे. इस मौके पर इन्होंने भगवान बिरसा मुंडा की समाधि पर फूल चढ़ाया. ये बिरसा को दिलोजान से चाहते हैं. उन्हें भगवान की तरह मानते हैं. उनके बताए मार्ग पर चलना इनके जीवन का लक्ष्य है. इसके साथ ही इनका नाम कहीं गुम न हो जाए,  इसलिए नाम तक बिरसा ही रखते हैं. हर 10 बिरसाइत में एक व्यक्ति का नाम बिरसा होता है. इन्हीं में एक बिरसा मुंडा नामक बिरसाइत ने बताया कि उनके पुरखे बिरसाइत पंथ नहीं मानते थे. लेकिन जब गांव के युवा नशे में आकर भटकाव का शिकार हो गए, तो उन्हें धरती आबा का सहारा मिला. अब समाज में नशा, मांसाहार पूरी तरह प्रतिबंधित है. मजबूरी में ही दूसरे समाज के हाथ का बना भोजन बाहर करते हैं. शादी-विवाह भी बिरसाइत में ही करते हैं.
दिनेश मुंडा कहते हैं कि अबुआ दिशुम, अबुआ राज के लिए उनका संघर्ष जारी है. उन्होंने बताया कि उनके गांव में स्कूल नहीं है. अस्पताल की भी दूरी 30 से 60 किमी है. बिजली का दूर-दूर तक पता नहीं और साक्ष्ररता की दर महज 30 फीसदी ही है. इन सभी सुविधाओं के लिए इनलोगों ने समय-समय पर सरकार से गुहार भी लगायी है. इनके खेत ही जीविकोपार्जन के साधन हैं, पर सिंचाई के लिए वर्षा पर ही निर्भर रहना पड़ता है.
बिरसा मुंडा बताते हैं कि तीन साल पहले देवा गांव में उन लोगों ने आपसी सहयोग से एक स्कूल खोला. अभी इस स्कूल में लगभग40 बच्चे पढ़ते हैं. इन्हें अंग्रेजी, हिंदी, मुंडारी के अलावा अन्य विषय भी पढ़ाए जाते हैं. चंपा बताती हैं कि उनका गांव चाईबासा के सुदूर जंगल-पहाड़ में बसे रामोसाई में है. वोह पढ़ने के लिए गांव से शहर जाती हैं. फिलहाल वोह बी-कॉम ऑनर्स कर रही हैं. पिता नही,लेकिन मां की प्रेरणाा से इनके भाई-बहन पढ़ लिख गए. बड़ा भाई नौकरी करता है. वो कहती हैं कि यदि सुविधाएं मिल जाएं, तो ये भी पढ़-लिखकर देश सेवा करना चाहती हैं.