सर्वशिक्षा अभियान : नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़

2018-12-22

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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एक निश्चित समयावधि में प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण को प्राप्त करने के लिए शुरू किया गया सर्वशिक्षा अभियान अपने उद्देश्य से भटकने लगा है। इस अभियान के 2010 तक अपने उद्देश्य को पूरा कर लेना था। अर्थात 2010 तक राज्य के आठ वर्ष तक के सभी बच्चों को जरूरी शिक्षा अनिवार्य रूप से मिल जानी चाहिए थी। परंतु 2018 तक झारखंड सरकार यह नहीं तय कर पायी है कि कितने स्कूलों को चलाया जाये, कितनों को बंद किया जाये, पारा शिक्षकों को किस रूप में रखा जाये और रसोइया के साथ क्या किया जाये। राज्य के प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों और सर्वशिक्षा अभियान के तहत खोले गये स्कूलों में मध्याह्न भोजन बनाने वालीं रसोइया-संयोजिकाएं करीब तीन महीने से आंदोलन कर रही हैं। राज्य सरकार ने यह कह दिया है कि इतने रसोइया-संयोजिकाओं को नौकरी नहीं दी जा सकती, फिर भी वे सभी राजभवन के पास बैठी हुर्इं। दूसरी ओर राज्य के पारा शिक्षक अपने स्थायीत्व के लिए चरणबद्ध आंदोलन कर रहे हैं, पर राज्य सरकार उनकी सुन नहीं रही है।
2001-02 में शुरुआत
वर्ष 2001-02 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संविधान में 86वां संशोधन कर सर्वशिक्षा अभियान (एसएसए) की शुरुआत की थी। यह संवैधानिक, कानूनी और राष्ट्रीय घोषणा थी, जिसमें देशभर के 6-14 आयुवर्ग के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया था। इसमें संतोषजनक गुणवत्तावाली प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के लिए 2010 तक लक्ष्य तय किया गया था। इसमें 8 कार्यक्रम तय किये गये थे। उसमें 2010 तक 8 वर्ष तक सभी बच्चों को अनिवार्य शिक्षा दे देना था। इस अभियान की शुरुआत से ग्रामीण शिक्षित बेरोजगारों को लगा कि रोजगार के लिए बेहतर मौका है। हर गांव में ग्रामीण शिक्षा समिति का गठन किया गया तथा एसएसए को लागू करने की जिम्मेवारी इन्हीं समितियों को दे दी गयी। फिर स्कूल के प्रति आकर्षण बढ़ाने के लिए बच्चों को मध्याह्न भोजन की व्यवस्था की गयी। उसके लिए एक अलग कमेटी बनी और रसोइयों की नियुक्ति की गयी। बच्चों को पढ़ाने के लिए अतिरिक्ति शिक्षकों के रूप में पारा शिक्षकों की बहाली की गयी। इसमें हर वर्ष अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैं। इसके साथ ही लापरवाही भी शुरू कर दी गयी। पारा शिक्षकों की धड़ाधड़ हो रही नियुक्तियों के कारण नियमित शिक्षकों की नियुक्ति की गति अत्यंत धीमी पड़ गयी। इस कारण राज्य में नियमित शिक्षकों की 50 फीसदी से अधिक पद रिक्त हैं। दूसरी ओर पारा शिक्षकों की बहाली पैरवी पर होने लगी। योग्यता को नजरअंदाज कर दिया गया। ग्रामीण शिक्षा समिति के नाम पर गांवों में गुटबाजी होने लगी। तब से अब तक झारखंड में करीब 70,000 पारा शिक्षक बहाल कर दिये गये। सभी को प्रशिक्षण दे दिया गया और अब पारा शिक्षकों ने स्थायीकरण की जंग छेड़ दी है। शुरू से ही लापरवाही बरत रहे अधिकारियों ने अब यह कह कर अपना पल्ला झाड़ दिया है कि पारा शिक्षकों के साथ सरकार का नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध नहीं है। क्योंकि इनकी बहाली ग्रामीण शिक्षा समितियों ने की है और सभी ग्रामीण शिक्षा समितियों के अधीन 20 से कम पारा शिक्षक कार्यरत हैं। चूंकि राज्य के 70,000 पारा शिक्षकों के परिवार के वोट बैंक का सवाल है, इस कारण राजनीतिक दलों के लिए खास मुद्दा बन गया है। सत्ताधारी पार्टी के लिए भी यह मुद्दा गले की हड्डी बन गयी है। एक ओर जहां राज्य सरकार स्कूलों की संख्या अधिक बताते हुए कई स्कूलों को मर्ज करने की कार्रवाई शुरू कर दी है, वहीं दूसरी ओर वोट बैंक के कारण सत्ताधारी दल के विधायक और सांसद भी स्कूलों को बंद करने की प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। क्योंकि जिन स्कूलों को बंद किया जा रहा है, उनके पारा शिक्षकों को दूसरे स्कूलों में तो एडजस्ट कर दिया जा रहा है, परंतु रसोईया का सामंजन दूसरे स्कूलों में नहीं हो पा रहा है। क्योंकि हर स्कूल में रसोइया का एक ही पद है।
लापरवाही और अदूरदर्शिता बड़ी वजह
इस अधिनियम को लागू करने वाले अधिकारियों की लापरवाही और अदूरदर्शिता के कारण देश में सर्वशिक्षा अभियान पहले ग्रामीण विवाद अभियान और अब शिक्षा विभाग के सबसे बड़े विवाद के रूप में तब्दील हो चुका है। झारखंड में तो इस अभियान ने ग्रामीण स्कूलों में अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है। इससे 6-14 आयुवर्ग के बच्चों का भविष्य ही अंधकार में जाने लगा है। पारा शिक्षकों के आंदोलन के लंबा खींचने और उसी क्रम में 8 नवंबर, 2011 को मुख्य सचिव और झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद के साथ हुई वार्ता के बाद जारी हुए आदेश ने स्थिति को और भी दिशाहीन बना दिया है। राज्यभर के पारा शिक्षकों, रसोईया-संयोजिकाआें के आंदोलन बच्चों की शिक्षा पर ग्रहण लगाने की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। शिक्षाधिकारी और राज्य सरकार भी इस मामले में ठोस निर्णय लेने की स्थिति में नजर नहीं आ रहे हैं। 
 सबसे दुखद पहलू यह है कि झारखंड सरकार ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था के लिए कोई निश्चित मापदंड ही तैयार नहीं की है। राज्य में हर वर्ष मैट्रिक और इंटर का रिजल्ट खराब हो रहा है। इसका प्रमुख कारण स्कूलों में शिक्षकों का अभाव है। हाई स्कूलों में कई विषयों के शिक्षक ही नहीं है। इसे ठीक करने की कवायद शुरू होने से पूर्व ही प्राथमिक स्कूलों की व्यवस्था ध्वस्त होती दिख रही है। और जब प्राथमिक कक्षाओं में ही बच्चों का आधार कमजोर हो जायेगा, तब हाई स्कूलों और इंटर में इन बच्चों का रिजल्ट बेहतर हो ही नहीं पायेगा। यह पूरी प्रक्रिया राज्य के आधार को कमजोर करने की दिशा में बढ़ रही है। राज्य मानव संसाधन को बेकार बनाने की दिशा में बढ़ रही है।