अपना आशियाना व राह ढूंढ रहे गजराज

2018-12-22

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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एक बड़ी सच्चाई से पूरी व्यवस्था ने मुह मोड़ रखा है कि वास्तव में हाथी इंसानों की राह में नहीं आ रहे हैं, बल्कि इंसान ही हाथियों की राह में रोड़ा बनता जा रहा है। हाथी स्वभावत: अपने प्राकृृतिक रास्ते पर भोजन की तलाश में आगे बढ़ते हैं, लेकिन उनकी राह में मानव ने या तो अपना घर बना लिया है या फिर खेती शुरू कर दी है। हाथियों की राह में जब इंसानी घर अथवा खेत मिलते हैं, तब वे उसे रौंदते हैं या फिर भटक कर मानव बस्तियों में पहुंच जाते हैं। यह स्थिति इस कारण बनी है, क्योंकि इंसानों ने प्रकृति को बेतरतीब ढंग से और बेहिसाब रौंदना शुरू किया है। पारिस्थितिकी को इंसानी गतिविधियों के कारण नुकसान पहुंचा है। इसी कारण वन्य जीवन और मानव के बीच जंग शुरू हो गयी है। इसे रोकने के लिए तैयार वन विभाग पूरी तरह से नकारा साबित हुआ है।  
भारत के 28 में से 16 राज्यों में हाथियों का आश्रय है। देश में हाथियों की संख्या 27,785 से 31,365 तक है। देश में हाथियों के केन्द्रीय आश्रय स्थल झारखंड, ओडिशा, एवं पश्चिम बंगाल का दक्षिणी हिस्से सभी 20 कॉरिडोर (रास्ता अथवा गलियारा) मानवीय गतिविधियों के कारण बाधित हो गये हैं। इस कारण हाथियों का स्वतंत्र विचरण संभव नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि हाथी राह से भटक कर इंसानी बस्तियों में पहुंच जा रहे हैं। देश में हाथियों के 88 कॉरिडोर चिह्नित हैं। इनमें 20 केन्द्रीय भाग में हैं, जो 17000 वर्ग किमी में फैले हैं। इन 20 कॉरिडोर पर 2400-2700 हाथी विचरण कर रहे हैं। इनमें हाथियों की सर्वाधिक संख्या उड़ीसा में 1800-2000, झारख्ांड में 600-700 एवं पश्चिम बंगाल (मात्र दक्षिणी हिस्से में, नॉर्थ वेस्ट बंगाल का हिस्सा हाथियों के दृष्टिकोण से अलग है) में करीब 400 है। झारखंड में हाथी मुख्यत: पलामू व्याघ्र आरक्ष्य के जंगल और सिंहभूम के जंगलों में रहते हैं। पलामू के हाथ छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की ओर तथा दलमा के हाथी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर, बांकुड़ा, रूपनारायण, पंचेत, पुरुलिया, कंगसाबत्ती आदि की ओर जाते हैं। फिर उधर से इधर आते भी हैं। प्रमुख कॉरिडोर में झारखंड में दलमा से चांडिल, डुमरिया से न्यायग्राम, डुमरिया से कुंडारिका, लेदा से बेड़ा, अंकुआ से अंबिया, अंजादबेरा से बिछाबुरु आदि हैं। झारखंड को पश्चिम बंगाल से जोड़ने वाले प्रमुख हाथी गलियारों में महिलौंग-कारीमाटी, चांडिल-माठा, झुनझाका-बंदुआ, तालापानी-कांकराझोर तथा झारखंड को ओडिशा से जोड़ने वाले कॉरिडोर में कारो-करमपाला, बादाम पहाड़-धोबाधोबन, बादाम पहाड़-करीदा पूर्वी आदि हैं। इनके अलावा गुमला व सिडेगा से छत्तीसगढ़ के जंगलों में कई हाथी गलियारे हैं। ये सभी गलियारे अब कागजों पर अधिक और व्यवहार में नगण्य हैं। खनिजों के उत्खनन, रेल परियोजनाओं के विस्तार, सड़क निर्माण, वनों की कटाई, नक्सली गतिविधियों, फायरिंग रेंज, कृषि कार्य समेत अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण बाधित हो गये हैं। उदाहरण के लिए दलमा-चांडिल छोड़कर सभी गलियारे बुरी तरह प्रभावित हैं। लेदा-बेड़ा और चांडिल-माथा गलियारा खेत में तब्दील हो चुके हैं। दलमा-चांडिल गलियारे के बीच में स्वर्णरेखा प्रोजेक्ट तथा एनएच गुजरता है। दलमा-रुगई रूट में खेत से परेशानी आती है। झुंझाका-बंदुआ गलियारे में बाधा नहीं है, परंतु डुमरिया-न्यायग्राम गलियारा खेत में तब्दील हो चुका है। 
कई कारणों से राह भटक रहे गजराज
करीब से रेलगाड़ी गुजरने पर उसकी आवाज से हाथी बहुत घबराते हैं। रेलगाड़ी की आवाज सुनते ही वे इधर-उधर भागते हैं और इसी क्रम में राह भटक जाते हैं। और यदि ये एक बार भटक जाते हैं तो फिर इन्हें अपना मूल रास्ता पकड़ने में काफी वक्त लग जाता है। इस क्रम में इंसानों से इनका टकराव हो जाता है। इससे ये और भी घबरा जाते हैं तथा फिर इनका भटकाव और भी बढ़ जाता है। इस क्रम में कई हाथी मानसिक रूप से चिड़चिड़े भी हो जाते हैं। तब ये मकानों को ध्वस्त करना और फसल रौंदना शुरू कर देते हैं। हाथी एक बार चलना शुरू करते हैं, तो 40 मील तक की सफर तय करते हैं। ये भोजन की तलाश में निकलते हैं। इस कारण इस जंगल से उस जंगल चलते हुए 40 मील बाद आराम करते हैं। इनके आराम की जगह मुख्य रूप से वन्य जीव आश्रयणियां ही हैं। इस दौरान इनके मार्ग में बाधा आने पर ये भटक जाते हैं।
पहले न बताया, न बचाया, अब कृत्रिम कॉरिडोर का प्रयास
हाथियों के गलियारे के बारे में वन विभाग के अधिकारियों ने ग्रामीणों को पहले न तो बताया और न ही उन रास्तों को बचाने की कोशिश की। इसका परिणाम यह हुआ कि जहां से पहले हाथी गुजरते थे, वहां अब नजर नहीं आते और जहां कभी भी हाथियों की आवाजाही नहीं रही, वहां अब वे भटक कर पहुंच रहे हैं। अब जब मानव एवं हाथी में झड़पों की संख्या बढ़ने लगी, तब हाथियों की वर्तमान गतिविधियों को देखते हुए कॉरिडोर बनाने की चर्चा शुरू की गयी है। हालांकि एक सच यह भी है कि झारखंड के वनाधिकारियों ने हाथी गलियारे पर कोई ठोस कार्य अभी तक नहीं किया है। जहां झड़प होती है, वहां के राह ढूंढे जा रहे हैं। इसी वर्ष 23 फरवरी को सिमडेगा के गोईलकेरा प्रखंड के ग्रामीणों ने हाथी गलियारा बनाने का विरोध किया। करीब डेढ़ दर्जन गांवों के लोगों ने इकजूट होकर इस प्रकिया का विरोध किया। यह इस कारण हुआ कि पहले ग्रामीणों को न तो हाथियों के प्राकृतिक रास्ते की जानकारी है और न ही मानव-हाथी संबंध और हाथियों की उपयोगिता का ज्ञान। यह इस कारण है कि वन विभाग और ग्रामीणों के बीच कभी समन्वय रहा ही नहीं। और अब जब ग्रामीणों ने विरोध किया, तब एक वनाधिकारी को सामने आकर कहना पड़ा कि हाथी गलियारा बनाने की कोई योजना ही नहीं है। 
उधर, साहेबगंज जिले से एक वन प्रमंडल पदाधिकारी ने खबर दी कि वन विभाग ने पहाड़ी जंगलों में हाथी गलियारा बनाने का निर्णय लिया है। इसके लिए विभाग को प्रस्ताव भेजा गया है। इस प्रस्ताव के अनुसार विभाग ने लालबथानी, फुलभंगा, जोकमारी, बड़ा पचरूखी, बेतौना, घोघी, दुगार्टोला, तेतरिया, दलदली, मुंडे पहाड़, भतभंगा, कैरासॉल, गोगा पहाड़, देवटिकरी पहाड़िया गांवों से होकर हाथी कॉरिडोर बनाने का निर्णय लिया है। इससे पूर्व भी वन विभाग ने धनबाद के टुंडी में हाथी गलियारा बनाने का प्रस्ताव तैयार किया था, पर उस पर कोई निर्णय नहीं हुआ। बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, जामताड़ा, दुमका, गोड्डा, पाकुड़ आदि जिलों की भी यही स्थिति है। दरअसल, वनाधिकारियों ने पूरे राज्य के लिए कोई योजना तैयार ही नहीं की है। इस कारण न हाथियों को चैन मिल रहा है और न ही इंसानों को।