जैविक खेती की ओर कदमताल

2018-12-22

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-ब्रजेश राय

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खेती को सबसे ज्यादा जिस चीज ने सबसे ज्यादा क्षति पहुंचायी है वह है खेतों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग। इसने न सिर्फ फसलों को दूषित किया है, बल्कि खेतों को बंजर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह बात आज का किसान अब समझने लगा है। अधिक उपज की लालच में रासायनिक खादों को तरजीह देना छोड़कर अब वह जैविक व कंपोस्ट खाद के उपयोग पर ध्यान देने लगा हैं। 
आज का किसान समझने लगा है कि जैविक खेती प्रदूषण मुक्त खेती है जिसमें रासायनिक खादों और रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता। जैविक खेती करने वाले किसानों से अगर आप पूछेंगे तो उनका जवाब होगा कि जब अंग्रेजी दवाएं (कीटनाशक) नहीं थे तो क्या खेती नहीं होती थी? हमारे बाप-दादा भी तो ऐसी ही खेती करते थे। गोबर, गौ-मूत्र, नीम तथा दूसरे अन्य देसी तरीकों से। अब हम लोग फिर से उसी तरह की खेती की तरफ लौट रहे हैं। 
नरेश किस्कू औरों के लिए उदाहरण
पूर्वी सिंहभूम के गांव बालीगुमा, गोड़गोड़ा टोला के रहनेवाले नरेश किस्कू अपनी 10 एकड़ जमीन में खेती-बारी करते हैं। वे खुद तो अपने खेतों में जैविक खाद का ही उपयोग करते हैं और दूसरों को जैविक खेती के लिए प्रेरित भी करते हैं। आज स्थिति यह है कि जैविक खाद के उपयोग को बढ़ावा देने के कारण उन्हें देश व दुनिया में पहचान मिली है। वे लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन गये हैं। नरेश किस्कू के अनुसार, पहले भी वे इतनी ही मेहनत करते थे, लेकिन परिणाम आशानुरूप नहीं आता था। अब कम मेहनत में ज्यादा पैदावार हो रही है।
अच्छी खेती के लिए नरेश किस्कू को गुजरात में आयोजित ग्लोबल एग्रीकल्चर समिट में शामिल होने का मौका मिला। इसमें कृषि के क्षेत्र में किये गये सराहनीय काम के लिए इन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मानित भी किया। पूर्वी सिंहभूम जिले में भी बेहतर कृषि कार्य के लिए सम्मानित हो चुके हैं। कृषि के क्षेत्र में निरंतर बेहतर कार्य करने के कारण उन्हें एक्पोजर विजिट के लिए इजराइल जाने का भी मौका मिला। 
नरेश किस्कू खर-पतवार व गोबर से अपने खेतों के लिए खाद तैयार करते हैं। अपने खेत के पास ही उन्होंने तीन-चार बड़े-बड़े गड्ढे खोद रखे हैं। उसमें मवेशियों का गोबर, पुआल, घास-फूस आदि प्रतिदिन रखते हैं। अपने घर के पास के लोगों से भी मवेशियों का गोबर, पुआल आदि वहीं जमा करवाते हैं। इससे वहां कुछ ही दिनों में काफी गोबर व खर-पतवार जमा हो जाता है, जो कुछ महीनों में ही अच्छी खाद बन जाती है। इस तरह से उन्हें सालोंभर खाद मिलती रहती है।
महिलाओं ने बदल दी गांवों की किस्मत
चतरा का देवरिया, छोटकी देवरिया, तुडाग, लिब्दा  और बाबाघाट गांव राज्य के लिए ही नहीं, देश के लिए भी उदाहरण हैं। बड़े शहरों में जिस जैविक उत्पाद की मांग बढ़ रही है, महिलाओं ने उसे ही समृद्धि का सहारा  बनाया है। यहां की महिलाओं ने वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद की ट्रेनिंग लेकर अपने गांवों की सूरत  ही बदल दी है। 
नाबार्ड की मदद से स्वयंसेवी  संस्था अखंड ज्योति के माध्यम से पंचायत में गठित पंद्रह महिला समूहों का  वर्मी कंपोस्ट और जैविक खेती के प्रशिक्षण के लिए चयन हुआ। इन समूहों की 154 महिलाओं को  एक वर्ष तक देवरिया गांव में ही प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान ही महिलाओं ने वर्मी कंपोस्ट और जैविक खेती को खेतों में आजमाना शुरू कर दिया। नतीजा  बेहतर आया तो उत्साह परवान चढ़ा। बस इन पांचों गांवों में पूरी तरह से  जैविक खेती होने लगी। उत्पादन दुगना हुआ। बंजर जमीनें भी लहलहा उठीं। गांव  में तो अब उसर जमीन भी अब खाली नहीं है। पहले मोटे तौर पर सिर्फ धान की फसल उगती थी। अब महिलाएं तीनों मौसम में खेती कर रही है। महिलाओं के प्रयास से ही इन पांचों गांवों में आर्थिक समृद्धि आयी है। वहां की महिला समूह को इसके लिए मुख्यमंत्री रघुवर दास ने  सम्मानित भी किया है। इसके अलावा और भी कई पुरस्कार उन्हें मिला है।
सिल्ली की प्रभा देवी दे रहीं प्रेरणा
झारखंड के सिल्ली प्रखंड के बाह्मनी गांव की एक महिला कृषक हैं प्रभा देवी खुद तो जैविक खेती करती ही हैं और दूसरी सैकड़ों महिलाओं को खेती के लिए प्रेरित भी करती हैं। सखी मंडल से जुड़ी प्रभा देवी एक कृषक मित्र हैं। वो कहती हैं, हमारे इलाके में महिलाओं को बहुत कम कैंसर होते थे, लेकिन अब तो उनके गांव के आसपास कई महिलाओं को कैंसर है। क्योंकि हम जो जमीन में अंधाधुंध उर्वरक डालते हैं, वो मिट्टी में होकर हमारे खाने में पहुंच रहा है।  झारखंड स्टेट लाइवलीवुड प्रमोशनल सोसायटी के जरिए बनाये जा रहे सखी मंडलों की वे सक्रिय सदस्य हैं। उनकी प्रतिभा और खेती के प्रति लगन को देखते हुए जेएसएलपीएस ने उन्हें विशेष ट्रेनिंग भी दिलवाई हैं। उन्हें कई वर्कशॉप और कृषि से जुड़े आयोजनों में भेजा जाता है। जहां से मिली सीख और ज्ञान को वो दूसरी महिलाओं में बांटती हैं।
कैदी भी जैविक कृषक
पूर्वी सिंहभूम के घाघीडीह सेंट्रल जेल मेंं कैदियों को स्वरोजगार और स्वावलंबी बनाने के लिए प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं। इसके लिए उन्हें साधन उपलब्ध कराए जा रहे है। यहां स्थिति यह है कि इस जेल में अब सब्जी खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती। जेल परिसर में उगाई गई सब्जियों से ही उनकी जरूरतें पूरी हो जाती हैं। इस 
जेल के कैदी सब्जी उगा रहे हैं और बागवानी भी कर रहे हैं। लेकिन सबसे खास बात यह है कि जेल में सब्जी का उत्पादन जैविक खेती पर आधारित है। सब्जी का उत्पादन कर जेल प्रशासन अपने मेस का खर्च भी व्यवस्थित कर रहा है। गोभी, पत्ता गोभी, पालक, मूली, बैगन, टमाटर, हरी मिर्च, धनियापत्ता का उत्पादन किया जा रहा है। जिसका उपयोग जेल के कैदी खाने के लिए करते हैं। इससे उनके भोजन का स्वाद दोगुना हो जाता है। कैदियों को प्रतिदिन ताजी हरी सब्जियां तथा सलाद भोजन में मिल रहा है। वहीं सब्जी का खर्च निकालने में जेल प्रशासन अपने बूते सक्षम हैं। जेल प्रशासन सब्जियों के उत्पादन के लिए बकायदा प्रशिक्षण भी दे रहा है। जिससे बंदी स्वरोजगार भी पा रहे हैं।
सरकार भी सक्रिय
राज्य में जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार भी सक्रिय हो गयी है। रांची के होटवार स्थित खेलगांव में ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड समिट के दौरान जैविक खेती को बढ़ावा देने के सम्बंध में कृषि मंत्री रणधीर कुमार सिंह ने कहा था कि 2028 तक झारखंड पूर्ण रूप से जैविक खेती वाला राज्य होगा। इसके बाद राज्य में यूरिया, डीएपी और रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं होगा। कृषि मंत्री ने तो यहां तक कहा कि हमारी प्राचीन परंपरा काफी समृद्ध रही है। हमें अपनी जीवन शैली सुधारने के लिए प्राचीन पारंपरिक व्यवस्था में लौटना होगा। जायेगा। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी घोषणा की है प्रदेश में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने सभी 24 जिलों में ऑर्गेनिक क्लस्टर स्थापित किए हैं। इन उत्पादों को ‘झारखंड जैविक’ के ब्रांड के तहत बेचा जाएगा।