झारखंड की हवा खराब

2018-12-22

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-प्रमोद जायसवाल

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कभी मिनी शिलॉन्ग के नाम से जानी जाने वाली झारखंड की राजधानी रांची अब प्रदूषण के लपेटे में है। देशभर में बढ़ रहे प्रदूषण के बीच रांची की हवा में भी जहर घुलने लगा है। वहीं झारखंड के दूसरे जिलों में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है। हाल के दिनों में विकास के नाम पर हुई पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और सड़कों पर बढ़े बेइंतहा ट्रैफिक की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई है। रही-सही कसर प्रदूषण रोकने में सरकारी विभागों की कोताही ने पूरी कर दी। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो हाल के दिनों में सांस से संबंधित बीमारी के मरीजों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। इनमें बच्चों और बूढ़ों की संख्या काफी ज्यादा है।
रांची की आबोहवा महज कुछ दशकों पहले इतनी अच्छी थी कि दूर-दराज से लोग स्वास्थ्य-लाभ के बाद रांची आते थे। जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर यहां के वातावरण को जीवनदायिनी माना जाता था, लेकिन बीते कुछ दशकों से विकास के नाम होनेवाली पेड़ों की कटाई और कमजोर प्रदूषण मानकों ने यहां की हवा में जहर घोलने का काम किया। वहीं इसके लिए सरकार की योजनाएं भी जिम्मेदार हैं, जिसमें एक तो प्रदूषण को रोकने के लिए किये जानेवाले उपायों का समावेश नहीं होता। जिसकी वजह से आम-नागरिक को अब सांस लेने के लाले पड़ रहे हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए अगर सरकार नहीं चेती तो आनेवाले दिनों में यहां की स्थिति दिल्ली और यूपी के शहरों की मानिंद बनते देर नहीं लगेगी।
प्रदूषण पर ब्रेक की कोशिश
वायु प्रदूषण पर ब्रेक लग सके इसके लिए रांची नगर निगम परिवर्तन की ओर अग्रसर है। रांची की मेयर आशा लकड़ा कहती है कि राजधानी को प्रदूषण मुक्त बनाने का प्रयास जारी है। रांची पेट्रोल-डीजल से मुक्त होकर एक ईको-फ्रेंडली 'स्मार्ट सिटी' बने इसके लिए सरकार को एक प्रस्ताव तैयार कर भेजा जाएगा। साथ ही लोगों के बीच सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के साथ साइकिल का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करने की योजना है। सबसे ज्यादा जरूरी जंगलों के बचाना है। इसलिए झारखंड में जंगलों के कटाव को रोकने के लिए वन संरक्षण समिति गठित हुई है। सरकार ने अमृत योजना शुरू की है इसके तहत रांची में पार्कों के निर्माण हो रहे हैं। उन्होंने ने सीड से अनुरोध किया कि औद्योगिक जगत में जितने भी कारखाने चलाने वाले लोग हैं, उनके साथ एक कार्यशाला का आयोजन करें, जिससे वायु प्रदूषण के रोकथाम में मदद मिलेगी।
वाहनों ने बढ़ाई राजधानी रांची की चिंता
कभी मौसम के लिहाज से बेहतर शहर माना जाने वाला रांची इन दिनों प्रदूषण के कारण बदनाम हो चुका है। रांची में प्रदूषण अलार्मिंग लेवल तक पहुंच चुका है। झारखंड प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के एक सर्वे के अनुसार, राजधानी में हवा प्रदूषण पिछले 15 सालों में 20 गुणा बढ़ा। बोर्ड ने नगर निगम और परिवहन विभाग को इस बाबत कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन शहर में हमेशा सुबह हो या शाम प्रदूषण का लेवल लगातार बढ़ता रहता है। पर्यावरणविद् नितिश प्रियदर्शी बताते हैं कि जिस तरह से लगातार प्रदूषण का लेवल बढ़ रहा है उसको रोकने का कोई उपाय नहीं किया गया तो आने वाले समय में मुश्किल बढ़ जाएगी। राजधानी रांची की सड़कों पर दौड़ते बेहिसाब वाहन वायु प्रदूषण के लिए बेहद खतरनाक हैं। इन वाहनों से कार्बन डाइऑक्साइड बड़ी मात्रा में निकलता है जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता हैं। आंखों का जलना, त्वचा रोग आम हैं। अन्य वाहनों के साथ रांची की सड़कों पर दौड़ते ऑटो की संख्या भी एक बड़ा कारण है। आईआईएम के सर्वे के अनुसार, 2340 ऑटो ही शहर के लिए पर्याप्त हैं। झारखंड हाईकोर्ट और मानवाधिकार आयोग ने भी इस बाबत निर्देश दिए थे, इस कारण परिवहन विभाग ने 2340 ऑटो के बाद ऑटो को परमिट देना बंद कर दिया है। 
घट गयी औसत आयु
वायु प्रदूषण को लेकर ‘दी लैंसेट प्लैनेट्री हेल्थ’ की एक रिपोर्ट आयी थी जिसमें बताया गया कि 2017 में भारत में वायु प्रदूषण के कारण 12.4 लाख लोगों की मौत हो गयी जो कि 70 वर्ष से कम उम्र के थे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वायु प्रदूषण के कारण औसत आयु करीब 1.7 वर्ष घट गयी है।
कार्बन उत्सर्जन में भारत विश्व में चौथा 
कार्बन उत्सर्जन के मामले में भारत दुनिया में चौथे नंबर पर है। ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के मुताबिक-2017 के मुताबिक कार्बन उत्सर्जित करने वाले टॉप-चार देश मिलकर विश्व के कुल उत्सर्जन को 58% कार्बन उत्सर्जित करते हैं। देश में अगर हर महीने एक लाख से ज्यादा मौतें सिर्फ वायु प्रदूषण के कारण हो रही हों, तो यह वाकई चौंकाने वाली बात है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) और पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया ने मिलकर देश में एक अध्ययन कराया था। इसमें पता चला कि राजधानी दिल्ली में रोजाना चौंतीस लोग ऐसी बीमारियों से मर रहे हैं जो हवा के जहरीली होने से हो रही हैं। इन बीमारियों में सांस नली और फेफड़े के संक्रमण और कैंसर, दिल का दौरा और मधुमेह जैसी बीमारियां हैं। पिछले साल देश भर में वायु प्रदूषण की वजह से बारह लाख लोग मारे गए। इनमें करीब सात लाख लोग दूषित हवा और पांच लाख से ज्यादा लोग घर में होने वाले प्रदूषण की वजह से मारे गए थे। ये आंकड़े यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि प्रदूषण से निपटने के मोर्चे पर हमारा तंत्र विफल रहा है। हालात देखकर तो यही लग रहा है कि इस समस्या से निपटने के लिए सरकारों ने अपने को एक तरह से लाचार घोषित कर डाला है। 
सर्वोच्च अदालत भी चिंतित
वायु प्रदूषण को लेकर पिछले कुछ सालों में जिस तरह से सर्वोच्च अदालत तक चिंता जाहिर कर चुकी है, वह हालात की गंभीरता को बयान करता है। दिल्ली में हर साल ऐसी स्थिति पैदा होना सामान्य बात हो गई है जब पूरा महानगर और इससे सटे शहर धुएं की चादर में लिपट जाते हैं। वायु प्रदूषण से निपटने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कड़ा रुख अख्तियार किया और सरकारों व संबंधित महकमों को सख्त दिशा-निर्देश जारी किये। लेकिन स्थिति जिस तेजी से भयावह होती जा रही है, उसे देखते हुए लग रहा है कि प्रदूषण रोकने की सारी कवायदें बेअसर साबित हो रही हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है कि इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस और दूरगामी योजना नहीं है।