जल प्रबंधन और महिलाएं

2018-12-26

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-परम

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राष्ट्रीय महिला आयोग ने पानी की व्यवस्था करने में महिलाओं द्वारा उठाए जाने वाले कष्टों पर किए अध्ययन से पता चलता है कि घरेलू उपयोग के लिए पानी का प्रबंध करने में 15 करोड़ महिला दिवस और करीब 10 करोड़ रूपए के बराबर श्रम खर्च हो जाता है। महिलाओं को कई-कई किलोमीटर पैदल चलकर सिर पर पानी ढोकर लाना पड़ता है। पानी लाने के लिए जहां गांवों की महिलाओं को 9-10 किलोमीटर तक चलना पड़ता है, वहीं झुग्गी-झोपड़ी की औरतें घंटों नल पर लाइन में लगकर पानी जमा करती है।
वहीं दूसरी ओर कई महिलाओं ने 'गंगा' बनकर कई गांवों की तस्वीर भी बदली हैं। महिलाओं ने अपने श्रम से पुराने जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया है वहीं बर्बाद होते पानी को उपयोगी बना डाला है। 
ये परिस्थितियां महिलाओं के परिश्रम की कहानी बताती है। दर असल, हर भारतीय घर चाहे वह गांव, कस्बा, नगर, शहर और महानगर का हो, दिन की शुरुआत उस घर की महिला से ही होती है। अपने देश में गरीब, निम्न व मध्यमवर्गीय परिवारों की बहुलता है, जहां जल प्रबन्धन वाकई एक प्रमुख घरेलू व्यवस्था के रूप में मायने रखता है।
परिवारों की संरचना पर गौर करें तो एक बात साफ होती है कि पानी का इंतजाम महिलाओं के हिस्से में आता है। चाहे पीने का पानी कई किलोमीटर दूर से ही क्यों न लाना पड़े। नियमित दैनिक कार्यों के लिये उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से भारतीय महिलाएं सदियों से ग्रामीण सुदूर इलाकों में नदियों, तालाबों या कुओं अथवा अन्य किसी साधन से अपने सिर पर रखकर पानी को अपने घरों में लाती आ रही हैं, वहीं थोड़े परिष्कृत ग्रामनुमा कस्बों और शहरों में भी चौराहों पर लगे सार्वजनिक नलों से पानी लाने की किल्लतों में महिलाएँ ही अधिक जूझती दिखती आई हैं।
पानी और महिलाओं का रिश्ता सदियों से चला आ रहा है। बदलते पर्यावरण के साथ महिलाओं की दिक्कतें कम होने के बजाए बढ़ती गई हैं। इन दिक्कतों से निजात पाने के लिए महिलाओं को जब भी सत्ता मिली, वे इन समस्याओं के कारगर हल में जुट गई। पिछले कुछ दशकों से महिलाओं को राजनीतिक सशक्तीकरण के कारण पंचायती राज व्यवस्था में प्रतिनिधित्व मिल पाया है। अपनी कुशल प्रबन्धन क्षमता के बल पर भारतीय महिलाओं ने अपने घर के पानी प्रबन्धन के अनुभवों से अपनी पंचायतों की प्यास बुझाने में भी बड़ी भूमिका निभाई है।
पानी के अभाव या कमी की पीड़ा को समझने या फिर पानी की कम उपलब्ध मात्रा में सकल घरेलू कार्यों को सुचारु ढंग से निपटाने में भारतीय महिलाएं एक कुशल प्रबन्धक इसलिये साबित हो पाती हैं, क्योंकि उनके इस प्रबन्धन में कोई निजी स्वार्थ या राजनीति या आर्थिक मोह नहीं होता। वे सिर्फ  -और-सिर्फ  पानी की मानवीय महत्ता का प्रबन्धन करती हैं।
रांची की आरती ने पेश की मिसाल
यद्यपि पानी को लेकर झारखंड की स्थिति राजस्थान और गुजरात जैसी नहीं है। फिर भी झारखंड में भी महिलाओं ने पानी के संरक्षण में अद्भुत काम किया है। राजधानी रांची से सटी पंचायत खिजरी के नया टोला की आरती देवी की जिंदगी अब घर-परिवार तक सीमित नहीं है। आरती अब गांव में जल प्रबंधन का काम देखती हैं। उनके सरोकार अब एक सामान्य गृहिणी से बड़े हैं। वे लोगों को पानी का बिल भी थमाती हैं और शुल्क की वसूली भी करती हैं। दरअसल उनके गांव में ग्रामीण पेयजलापूर्ति योजना संचालित होती है और जल सहिया होने के कारण उनके ऊपर यह जिम्मेवारी है कि वे पेयजल आपूर्ति के प्रबंधन को संभालें।
उल्लेखनीय है कि झारखंड देश का पहला और एकमात्र राज्य है, जहां राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की सहिया के तर्ज पर पेयजल एवं स्वच्छता विभाग ने राज्य में जल सहिया बनाने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके लिए हर राजस्व ग्राम में ग्रामसभा की गई व जल सहिया का चयन किया गया। जल सहिया के चयन के लिए यह अनिवार्य किया गया कि महिला गांव की बहू हो व उसे इस काम में रुचि हो और अपेक्षाकृत कम उम्र की हो। राज्य में लगभग 32 हजार जल सहियाएं चुनी गई। इससे जमीनी स्तर पर पानी के लिए काम करने वाले व्यक्तियों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार हुआ है।
यह बदलाव राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के उस दिशा-निर्देश जिसमें पेयजल के लिए जमीनी स्तर पर लोगों की सहभागिता बढ़ाने व पंचायत प्रप्रतिनिधियों की भागीदारी बढ़ाने की बात कही गयी है, पर झारखंड के रणनीतिक ढंग से अमल करने के कारण ही आया है। झारखंड देश का पहला और एकमात्र राज्य है, जहां राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की सहिया के तर्ज पर पेयजल एवं स्वच्छता विभाग ने राज्य में जल सहिया बनाने की प्रक्रिया शुरू की। इसके लिए हर राजस्व ग्राम में ग्रामसभा करायी गयी व जल सहिया का चयन किया गया। इस प्रक्रिया में राज्य में गठित पंचायत निकायों को भी इसका भागीदार बनाया गया। जल सहिया के चयन के लिए यह अनिवार्य किया गया कि महिला गांव की बहू हो व उसे इस काम में रुचि हो और अपेक्षाकृत कम उम्र की भी हो। राज्य में लगभग 32 हजार जल सहिया हैं। इससे पेयजल एवं स्वच्छता विभाग ने बिना बड़े पैमाने पर नियुक्ति किये जमीनी स्तर पर पानी के लिए काम करने वाले लोगों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर लिया।
यह तो एक बानगी भर है। महिलाओं ने पानी को सहेजने के लिए अपने तरह के प्रबंधन की प्रक्रिया को अपनाया। इससे देशभर में महिलाएं पानी के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए जुटी हुई हैं। ग्रामीण स्तर से लेकर राज्य एवं केन्द्रीय स्तरों तक के विभिन्न पदों पर बैठीं भारतीय महिलाएं अपनी नितान्त पारिवारिक एकान्तता में सिर्फ  एक घरेलू महिला ही होती हैं, जो कभी भी अपनी पानी की व्यवस्था करने के उत्तरदायित्व को भूलना नहीं चाहतीं।