किसानों की आय दोगुनी कर सकते हैं सीएफआर मॉडल्स

2018-12-26

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लेखक-स्निग्धा अग्रवाल

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वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत समुदायों की आय को दोगुना करने के लिए विचार किया जा रहा है कि समुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) किस प्रकार इसमें भूमिका निभा सकते हैं।
गौरतलब है कि भविष्य में कृषि भूमि में वृद्धि संभव नहीं है, इसलिए मधुमक्खी पालन, बांस, महुआ,  तेंदु आदि जैसे आय के वैकल्पिक स्रोत ऐसे स्रोत हैं जो किसानों के जीवन को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।
ग्राम सभाओं और लोगों को सशक्त बनाना होगा कि  कैसे तेंदुपत्ता, महुआ, बांस और अन्य वन उत्पाद से अतिरिक्त आय कमाकर लोगों के जीवन में सुधार ला सकते हैं। कैसे आय को दोगुना करने के लिए इनका इस्स्तेमल किया जा सकता है।
महाराष्ट्र के गोंडिया और गढ़चिरौली जैसे सफल सीएफआर मॉडल का अध्यन कर के झारखण्ड में भी वनाश्रित समुदायों की आमदनी दोगुनी की जा सकती है।  गौरतलब है कि महाराष्ट्र ने 24.40 लाख एकड़ जंगल के वितरण के अंतर्गत 6,524 खिताब को मंजूरी दी है, हालांकि इस लिहाज़ से झारखण्ड के आंकड़े काफी कमज़ोर हैं।
सीएफआर गांवों में  यह पता लगाने की कोशिश करने कि जरूरत है कि सामूहिक वन अधिकार हासिल करके कैसे समुदाय वन-प्रबंधन, संरक्षण, संवर्धन  के साथ-साथ अपनी आजीविका में सुधार ला सकते हैं। महाराष्ट्र के गोंडिया और गढ़चिरौली में सफल सीएफआर मॉडल के रूप में झारखण्ड को प्रेरणा लेनी चाहिए जहां  72 सीएफआर गांव तेंदु पत्ता, महुआ, बांस, और भाड़ा को निकालने से अद्भुत काम कर रहे हैं। इन गांवों को सीएफआर के तहत 28,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र दिया गया है।
पिछले 5 सालो में तेंदु पत्ता संग्रह और बिक्री में आमदनी में गुणात्मक वृद्धि हो गयी है, क्योकि ज्यादा गांव इसमें जुड़ गए हैं और वन संरक्षण के साथ-साथ आजीविका की दिशा में भी काम कर रहे हैं। आज झारखण्ड में भी लघु वनोपज की बिक्री व्यापारियों और बिचौलियों के द्वारा होती है जिसमें व्यापारी इनका फायदा उठाते हैं । ऐसे में यदि ग्रामसभा को सशक्त किया जाये और उनको वनोपज का मालिकाना हक दिया जाये तो बिचौलियों की भूमिका नगण्य हो जाएगी और मुनाफा सीधे गांव और ग्रामीणों को मिलेगा। ग्रामीण ग्राम सभाओं का समूह बना कर और निविदा के माध्यम से अपने स्वयं के उत्पादन की नीलामी करके अपने अधिकारों के लिए जोर दे सकते हैं।
सामुदायिक वन अधिकारों  जीवन पूरक आय के साथ बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। ग्रामसभा समूह  मिलकर सामुदायिक वन अधिकार के बाद की प्रक्रिया में भागीदारी करके लोगों को बेहतर आय के साथ अच्छी सुविधाएं जैसे जल निकायों और जंगल की रक्षा और प्रबंधन में विशेष भूमिका निभा सकते हैं । अपने जंगल के लिए अपनत्व और हक की भावना समुदायों को इनके संरक्षण के लिए जवाबदेह बनायेगी। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र के गोंडिया और गढ़चिरौली में बांस नर्सरी विकसित की गई है और गांव ने पिछले साल 8,000 पौधों को बांस को आजीविका के विकल्प के तौर पर बढ़ावा दिया है। इस तरह के मॉडल झारखण्ड में भी कारगर हो सकते हैं,  क्योंकि यह विकास और संरक्षण के दो उद्देश्यों को एकीकृत करता है। साथ ही वन भूमि पर अतिक्रमण के मुद्दा को भी सीएफआर के तहत लोगों को बेहतर ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है।