बांस के सहारे अर्थव्यवस्था

2018-12-26

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-मो. असगर खान

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साहिबगंज जिले में पहाड़ी व अन्य क्षेत्रों में आदिवासियों को खुशहाल बनाने के लिए वन विभाग बांस की खेती को बढ़ावा दे रहा है। इसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम की भी शुरुआत की गयी है। बांस की खेती को बढ़ावा देने का कार्य स्वयं सहायता समूहों का गठन कर दिया गया है। पहाड़ी इलाके से लेकर अन्य क्षेत्रों के किसानों को इसकी खेती के लिए वन विभाग सुविधाएं भी उपलब्ध कराएगा। जिले में पहाड़ी क्षेत्रों में अभी बांस की कई प्रजातियां पाई जाती है। इसके लिए जमीन भी उपयुक्त है। परंतु कई कारणों से ज्यादा से ज्यादा बांस की खेती करने की योजना वन विभाग की ओर से तैयार की जा चुकी है। इसके लिए प्रशिक्षक की तलाश विभाग कर रहा है। जिले में कई अन्य विभाग बांस उत्पादन के माध्यम से स्वरोजगार दिलाने का प्रयास पहले भी कर चुके हैं। परंतु वन विभाग की ओर से किसानों को स्वरोजगार दिलाने का प्रयास जल्द शुरू किया जाएगा।
जिले के राजमहल की पहाड़ियों के मध्य फैले वन क्षेत्र में बांस की खेती आसानी से की जा सकती है। इसकी संभावना तलाशने के बाद वन विभाग की ओर से डीएफओ ने प्लान बाकर स्वीकृति के लिए सरकार को भेजा था। मिली जानकारी के अनुसार इसकी स्वीकृति भी प्राप्त हो चुकी है। अब विभाग को वनवासियों को इसके लिए प्रशिक्षण देने का कार्य करना है। पतना, बरहेट, बोरियो, तालझारी व मंडरो वन क्षेत्र में आते हैं। इसमें कई स्थानों पर अब भी सघन वन हैं जहां बांस की खेती हो सकती है। जहां सघन वन नहीं है वहां वन विभाग की ओर से संयुक्त वन प्रबंधन समिति के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जाएगा। कृषकों को प्रोत्साहन देने के लिए बांस के पौधे भी लगवाए जाएंगे। 125 समितियों का गठन कर प्रशिक्षण देकर उन्हें बांस के अलावा अन्य व्यवसायिक खेती के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाया जाएगा।
बांस रोजगार से स्वावलंबी हुई दुमका की महिलाएं
दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के लवाडीह गांव की बसंती टुडू आज प्रतिमाह दस हजार रुपये कमा रहीं हैं। 
झारखंड की आदिवासी महिलाएं अब स्वावलंबी हो रही हैं, बांस के रोजगार से जुड़कर वे अच्छी आमदनी पा रही हैं। रोजगार के अभाव में आदिवासी परिवार सहित पश्चिम बंगाल, असम और पंजाब के खेतों में जाकर काम करती थी। पलायन उनकी मजबूरी बन चुकी थी, लेकिन चार साल से उनका पलायन रुका है, आदिवासी महिला व पुरूष अब बांस के सिह्हस्त कारीगर बनकर अपनी आजीविका कमा रहें हैं। दुमका जिले के शिकारीपाडा प्रखंड के लवाडीह गांव की बसंती टुडू आज प्रतिमाह दस हजार रुपये कमा रही हैं, उनके पति सुभाष हासदा एक सिह्हस्त कारीगर के रूप में जाना जाता है। 
बसंती पहले खदान में पत्थर तोड़ती थी, उसका पति भी उसी काम में लगा था, लेकिन उसे टीबी. की बीमारी हो गई और काम छुट गया। गांव में तभी ई.एस.ए.एफ. नामक संस्था ने उसे बांस के रोजगार के बारे में बताया और उसे प्रशिक्षण के लिए केरल के त्रिचुर भेजा। वहां से लौटकर जब आया तो उसकी जिंदगी ही बदल गई, उसने अपने गांव में ग्रुप का गठन किया और घासीपुर, रामपुर, लखीकुंडी, पिपरा, बरगाछी, केन्दुआ सहित कई गांवों के आदिवासी परिवारों को जोड़ा और अब ये लोग रोजगार के लिए पलायन नहीं करते हैं। उत्पादन केन्द्र के पास ही मजदूरों के बच्चों के लिए बाल शिक्षा केन्द्र खोले गए हैं, जहां इनके बच्चे पढ़ भी रहें हैं। बांस के कारीगर लाल टुडू बताते हैं कि वे एक बांस से वह कई प्रकार के आईटम एक सप्ताह में बना लेता है।
उर्मिला मोहली बताती है कि उनकी हुनर की जब कोई तारीफ करता है तो सुकुन मिलता है। डेनियल मोहली बताता है कि वह मास्टर ट्रेनर सुभाष से बहुत कुछ सीखा है। परिवार चार लोग काम करने वाले हैं। तो उनकी आमदनी ज्यादा है। आज कई आदिवासी परिवार बांस के व्यवसाय से जुड़कर स्वरोजगार पा रहे हैं, इस दिशा में संस्था उनकी मदद कर रहा है। आज शिकारीपाडा प्रखंड में 20 ग्रुप बने हैं, जिस्से दो सौ महिला व पुरूष जुड़े हैं और उनके बनाए हुए सामान महानगरों तक जा रहें हैं। बांस की कला निखर रही है, कारीगरों के द्वारा बनाए गए बॉस के डस्टबीन और लाउंड्रीबीन की माँग विदेशों में हो रही है। बॉस के काम मुख्यतः मोहली जनजाति के द्वारा किया जाता है, जिनकी आबादी 40 लाख से कहीं ज्यादा है। राज्य में 23605 स्कवायर किलोमीटर क्षेत्र में जंगल है, जो 30 प्रतिशत है, जिसमें बॉस 843 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ है। राज्य के गिरीडीह, गोडडा, दुमका, पाकुड, साहेबगंज जामताड़ा और बंगाल के मोहम्मदबाजार में ईसाफ के बांस प्रशिक्षण केन्द्र हैं, जहां बांस हैंडिक्राट उत्पादन केन्द्र कार्यरत है। इन केन्द्रों से लगभग दो हजार परिवारों को रोजगार मिल रहा है। स्वरोजगार की दिशा में बांस व्यवसाय से जुड़कर वे कई अनुठी चीज बना रहें हैं, वे हुनरवान हो चुके हैं। वे परिवार सहित अपने घरों में रहकर कमाई कर रहें हैं। उन्हें बिक्री की चिंता नहीं है, वे तो अपना उत्पाद संस्था को देकर अपनी मजदूरी ले लेते हैं।
संस्था इन उत्पादों को झारक्राफ्ट, रांची, फैब, चेन्नई, हिताशी, कोलकाता को बेच रहें हैं। नार्वे में भी बांस के बने उत्पाद की मांग है, वह भी यहीं से जाता है। ईसाफ संस्था के सुधीर बताते हैं कि नाबार्ड के सहयोग से उन्हें स्वाबलंबी बनाया जा रहा है, ईसाफ ने आदिवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाया हैं। उनके उत्पाद चेन्नई, कोलकाता, केरला, रांची, दिल्ली और बेंगलूरू सहित कई जगहों पर जा रहें हैं। उन्होंने बताया कि इस वर्ष आठ उत्पादन केन्द्र से 17 लाख रुपये के उत्पाद बिके। चेन्नई स्थित फैब उनका उत्पाद का बड़ा खरीददार है, बांस के उत्पाद ईको फैंडली है, वह प्लास्टिक का विकल्प भी है। संस्था महानगरों में लगनेवाले मेला में भी उत्पाद का प्रदर्शन करता है। संस्था गरीब आदिवासी परिवारों के चेहरे पर जब खुशी देखती है तो लगता है उनका प्रयोग सफल है, क्योंकि उनकी खुशी में मेरा योगदान है और ये बदलाव आना समाज के लिए शुभ संकेत है।
बांस से बना डाला कोल्ड स्टोरेज
हजारीबाग में अब किसानों की फसल बर्बाद नहीं होगी। रघुवर सरकार ने महिलाओं को ट्रेनिंग दी और अब महिलाओं ने बांस की मदद से कोल्ड स्टोरोज तैयार किया है जो किसानों के लिए काफी मददगार साबित हो रहा है। आलू-टमाटर जैसी सब्जियों के लिए बांस से बना देसी कोल्ड स्टोरेज किसी राहत से कम नहीं है। यह कोल्ड स्टोरेज हजारीबाग के टाटीझरिया प्रखंड की महिलाओं की देन है।
कोल्ड स्टोरेज के इस देसी तकनीक का मॉडल डिजिटल ग्रीन संस्था ने तैयार किया है। रघुवर सरकार की पहल पर झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसायटी भी इस अभियान से जुड़कर महिला स्वयं सहायता समूहों को ट्रेनिंग दे रही है और अब इस मुहिम से जुड़ने वाली महिलाएं बांस से कोल्ड स्टोरेज बनाकर अच्छा-खासा कमा रही हैं। किसान दयाल कुमार ने बताया कि बांस का बना कोल्ड स्टोरेज छोटे किसानों के लिए काफी बेहतर है। बारिश के समय आलू सड़ जाते हैं। यहां आलू स्टोर कर सकते हैं। यहां आलू, प्याज, लहसून पूरी तरह सुरक्षित रह जाते हैं।
पहली बार बनाए गए इस तरह के कोल्ड स्टोरेज से दर्जनों गांवों में खुशहाली आ गई है। बांस के बेत से बने इस कोल्ड स्टोरेज की खासियत यह है कि इसमें पूरे एक सीजन तक आलू, प्याज, लहसुन को सुरक्षित रखा जा सकता है। कम लागत वाला यह देसी कोल्ड स्टोरेज किसानों में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और अब घर-घर ऐसे कोल्ड स्टोरेज बनाए जा रहे हैं। इस देसी कोल्ड स्टोरेज की खासियत ये है कि यह किसी भी हवादार कमरे में तैयार हो सकता है। यह आलू-प्याज को नमी से बचाता है। बांस में फंगस नहीं लगता है और यही वजह है कि सब्जियां सड़ती नहीं है।
देसी कोल्ड स्टोरेज साइज में छोटा और पोर्टेबल है। इसका पहला मॉडल अक्टूबर 2017 में तैयार किया गया था। इसे बनाने में करीब 2200 रुपये की लागत आती है और इसकी क्षमता नौ क्विंटल है और इसे तीन-चार साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है। दयाल कुमार आगे बताते हैं कि 2200 रुपये के खर्च में बना यह कोल्ड स्टोरेज 7 से 8 साल तक ये चलेगा। इसे फोल्ड कर हटाया भी जा सकता है।
रघुवर सरकार की कोशिश है कि साल 2022 तक झारखंड में किसानों की आमदनी दोगुनी की जा सके और इस मुहिम में देसी कोल्ड स्टोरेज बड़ी भूमिका निभा सकता है।
दूसरे राज्यों को भी सहारा
बांस झारखंड के किसानों की आर्थिक मदद कर ही रहे हैं साथ ही पड़ोस के राज्य के किसानों का आर्थिक सम्बल बन रहे हैं। आदिवासी बाहुल्य जशपुर जिले में रहने वाली बंसोड़ जनजाति की भावना अपने पारंपरिक पेशे से जुड़ी हुई है। यह वजह है कि बांस की कमी के बावजूद भी वे झारखंड से बांस लाकर अपने पूर्वजों के व्यवसाय को वे बचाकर रखे हैं। जिले के मनोरा तहसील के घाघरा और जशपुर तहसील के तुर्री लोदाम, झोलंगा, पिल्खी, सिटोंगा समेत कुछ अन्य जगह में इस जनजाति के तीन से चार सौ परिवार निवास करते हैं। 
तेजी से बढ़ते प्लास्टिक वस्तुओं के प्रचलन ने बांस के इन कारीगरों के सामने रोजगार की समस्या जरूर उत्पन्न हो रही है। वहीं जिले में बांस की कमी बंसोड़ परिवार के लिए परेशानी का सबब है। इन सब के बाद भी इस जनजाति का अपने पारंपरिक व्यवसाय के प्रति मोह भंग नहीं हुआ है और वे खुशी-खुशी बांस से बने सामान को बेचने का व्यवसाय कर रहे हैं। वे बांस से बनने वाले सूप, दौरा, टोकरी आदि को बनाकर उसे बाजार में व शहर में बेचते हैं। जिससे इनकी रोजी-रोटी चलती है। जिले की ठंडी जलवायु बांस के उत्पादन के लिए अनुकुल नहीं है। इसलिए जिले के वन क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से बांस बिल्कुल नहीं पाए जाते। ग्रामीणों द्वारा अपने खेत व बाड़ी में रोपे गए बांस जिले में बंसोड़ों के लिए बांस प्राप्त करने का एकमात्र साधन है। जिले में भीषण ठंड व पाला गिरने से बांस के पौधे गल जाते हैं। 
जिसके कारण जिले में बंसोड़ जाति के लोगों के सामने बांस की कमी हो जाती है। आम दिनों में तो किसी तरह वे काम चला लेते हैं। पर अभी त्योहार का सीजन है। विशेषकर छठ महापर्व में बांस से बने सूप व दौरा की मांग काफी अधिक रहती है। जिसकी पूर्ति करने के लिए बंसोड़ जाति के लोगों को झारखंड के सीमावर्ती गांवों से अधिक कीमत पर बांस खरीदनी पड़ती है। पिल्खी की सनियारो बाई ने बताया कि ऐसे समय में बांस 80 से सौ रुपए तक में मिल जाते हैं। पर सीजन के वक्त झारखंड से उन्हें 150 से 200 रुपए की ऊंची दर में बांस खरीदना पड़ता है। 
झोलंगा के शिवचरण ने बताया कि बांस की कारीगरी और उससे बने सामान बेचना ही हमारा पारंपरिक व्यवसाय है। जिसका गुण हमें अपने पूर्वजों से मिला है। हम इस परंपरागत व्यवसाय को नहीं छोड़ सकते। उसने बताया कि बांस कला में तेज धारवाली छूरी और लकड़ी से बनी सोटांसी बांस कला का मुख्य औजार है। छूरी का प्रयोग बांस को छिलने में और सोटांसी का बांस की परतों को बारीक करने में किया जाता है। बांस की कला में जनजाति के महिला व पुरुषों के साथ बच्चे तक माहिर होते हैं।