बाल विवाह पर 'रोकथाम' नहीं

2018-12-26

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-उपेन्द्रनाथ पांडेय

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भले ही बाल विवाह पर कानूनन रोक है लेकिन उसकी वैधता अब भी बरकरार है। बाल विवाह रोकथाम अधिनियम 2006 में केवल इतना कहा गया है कि बाल विवाह अमान्य है और वधू यदि नाबालिग है तो किसी भी पक्ष के संरक्षक द्वारा उसे तोड़ी जा सकता है। इसके लिए बालिग होने के दो साल के भीतर याचिका दायर की जा सकती है। 
कम उम्र की दुल्हन के लिए सामने आकर शिकायत करना और विवाह को खत्म करने के लिए पहल करना काफी कठिन है। बाल विवाह की शिकार बच्ची किसी भी समय जिला अदलात में याचिका दायर कर अपने विवाह को खत्म कर सकती हैं और बालिग होने पर विवाह को खत्म करने की याचिका दायर करने के लिए उनके पास दो वर्षों का समय होता है। इसका मतलब यह हुआ कि बच्ची के पास 20 वर्ष की उम्र होने तक का समय है। हालांकि इसकी संभावना काफी कम है कि वह अपने माता-पिता, परिवार के लोगों और संबंधियों के खिलाफ जाकर विवाह को खत्म करने के लिए याचिका दायर करेगी, क्योंकि यदि वह ऐसा करने में समर्थ होती तो पहले ही चरण में विवाह का विरोध करती। इसलिए उसे एक वकील और वित्तीय मदद की भी जरूरत होगी।
तमाम मामलों की तरह यदि वह 20 वर्ष की उम्र तक पहुंचने से पहले ही गर्भवती हो जाती है तो विवाह को खत्म करने के लिए कोई भी कदम उठाना उसके लिए काफी कठिन हो जाएगा। ऐसे में उसे इस बात की चिंता सताएगी कि वह अपने बच्चे और खुद की मदद कैसे करेगी। ऐसे मामले विरले ही दिखते हैं जहां कम उम्र की लड़की कोई कदम उठाती है और ऐसे मामले तभी सामने आते हैं जब कोई गैर-लाभकारी संगठन उसकी कानूनी मदद के लिए सामने आता है।
इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले में बाल विवाह के बाद शारीरिक संबंध को बलात्कार बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि कर्नाटक के एक मामले से सीख लेते हुए केंद्र सरकार को बाल विवाह रोकथाम अधिनियम में संशोधन कर बाल विवाह को अमान्य कर देना चाहिए। यह संशोधन जल्द से जल्द लाया जाना चाहिए। इस संशोधन को लागू करने में प्रमुख चुनौती इस कानून के बारे में लोगों को जागरूक करने की होगी ताकि उन्हें पता चल सके कि बाल विवाह अवैध होगा। ऐसे में लोग इस प्रकार के विवाह से परहेज करेंगे।
पिछले अक्टूबर में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि बाल विवाह बच्चियों के संवैधानिक एवं मानवाधिकारों का हनन है। साथ ही अदालत ने बाल विवाह के तहत बिना सहमति के शारीरिक संबंध को बलात्कार करार दिया था। क्या इसके दुरुपयोग का कोई खतरा है?
बाल विवाह में झारखंड देश में चौथा
 बाल विवाह के मामले में झारखंड की स्थिति में बहुत अच्छी नहीं है। गौरतलब है कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 के अांकड़े के अनुसार बाल विवाह के मामले में झारखंड का स्थान पश्चिम बंगाल, राजस्थान व बिहार के बाद देश भर में चौथा (38 फीसदी) है. इससे पहले राजस्थान (51.2 फीसदी) तथा बिहार (49.2 फीसदी) के बाद इसका तीसरा (45.2 फीसदी) स्थान था।
राज्य के जिलों की बात करें तो कम उम्र की सबसे अधिक लड़कियां गोड्डा जिले में ब्याही जाती है। इस जिले में कुल हो रही शादियों में से 63.5 फीसदी मामले में 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों को बालिका वधू बनना पड़ता है। इस मामले में गढ़वा (58.8 फीसदी) तथा देवघर (52.7 फीसदी) क्रमश: दूसरे व तीसरे स्थान पर है. सबसे कम बाल विवाह सिमडेगा (14.7 फीसदी) में हो रहा है। ये आंकड़े नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस)- 4 के हैं।. दरअसल, राज्यभर में लड़कियों की सुरक्षा या परंपरा के नाम पर मां-बाप बच्चियों की शादी कम उम्र में कर देते हैं।  यह कुप्रथा व अज्ञानता के साथ-साथ लैंगिक भेदभाव का मामला भी है।
गिरिडीह में सुधार, यूनिसेफ व जागो फाउंडेशन का प्रयास : एनुअल हेल्थ सर्वे (एएचएस) 2012-13 की रिपोर्ट के अनुसार बाल विवाह के  सर्वाधिक मामले देवघर जिले में थे। इसके बाद गिरिडीह में सर्वाधिक बाल विवाह होता था। वर्ष 2013 में  गिरिडीह जिले में करीब 25 हजार शादियां हुई
 इनमें से 15 हजार मामले बाल  विवाह के थे. पर संयुक्त राष्ट्र संघ बाल अापात कोष (यूनिसेफ)  तथा  एनजीअो जागो फाउंडेशन की मदद से चले बाल विवाह विरोधी अभियान के कारण गिरिडीह जिले की स्थिति में सुधार आया है। जिले की 10 पंचायतों के 65 गांवों में यह अभियान अब भी चल रहा है. इससे ग्रामीण, पंचायती राज प्रतिनिधि, धार्मिक गुरु व सामाजिक संगठन कम उम्र की बच्चियों की शादी के खिलाफ खड़े हो रहे हैं।
विभिन्न जिलों में बाल विवाह की क्या है स्थिति
जिले का नाम मामला (%में)
गोड्डा          63.5
गढ़वा          58.8
देवघर          52.7
गिरिडीह          52.6
कोडरमा          50.8
चतरा          49.0
दुमका          47.4
जामताड़ा          44.7
पाकुड़          41.9
हजारीबाग          40.8
पलामू          40.5
साहेबगंज          38.4
लातेहार          37.1
सरायकेला          33.2
बोकारो          30.6
धनबाद          29.9
लोहरदगा          28.5
रांची                  28.1
खूंटी                  27.8
रामगढ़          27.7
पू. सिंहभूम          26.1
गुमला          24.0
प.सिंहभूम          21.3
सिमडेगा          14.7
झारखंड           38
(आंकड़े नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस)-4 के)
बाल विवाह के दुष्परिणाम
 स्वयंसेवी संस्था ब्रेक थ्रू ने झारखंड में हो रहे बाल विवाह पर चिंता व्यक्त की है। उसके अनुसार, तमाम प्रयासों के बाद भी झारखंड में बाल-विवाह नहीं रुक रहे हैं। इस दिशा में गंभीरता से काम करने की जरूरत है। हमें लड़का और लड़की के भेदभाव को मिटाना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, कैरियर से लेकर हर दिशा में लैंगिक भेदभाव को खत्म करने का प्रयास और तेज करना होगा। 
में लगभग 38 प्रतिशत बच्चियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है। कम उम्र में शादी होने से लगता है समाज में कही ना कही जागरुकता की कमी है.। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 की रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में लगभग 31 फीसदी लड़कों की भी शादी कम उम्र में हो जाती है।
15 से 19 वर्ष की लगभग 12 फीसदी लड़कियां गर्भवती पायी गयी है, जिनमें 65 फीसदी लड़कियों में खून की कमी है। महिलाओं में साक्षरता दर 59 फीसदी है,  वहीं पुरुषों में 80 फीसदी है। 
कानून भी कम लचीला नहीं है। 1978 में हिन्दू विवाह अधिनियम और बाल विवाह अधिनियम में संशोधन किया गया। संशोधित कानून के तहत लड़की की उम्र शादी के वक्त 15 से बढ़ाकर 18 वर्ष और लड़के की उम्र 18 से बढ़ातकर 21 कर दी गयी। लेकिन दूसरी ओर इससे संबंधित जो जरूरी व्यववस्थाएं अन्य कानूनों में हैं, उन्हें यूं ही छोड़ दिया गया। मसलन हिन्दू विवाह अधिनियम और बाल विवाह अधिनियम में तो लड़की की शादी की उम्र 18 वर्ष कर दी गयी, लेकिन भारतीय दंड संहिता को संशोधित नहीं किया गया जिसकी धारा 375 में पति-पत्नी के रिश्ते की उम्र 15 साल है।  इसी तरह धारा 376 में उल्लेखित है कि 12 साल से ज्यादा और 15 साल से कम उम्र की विवाहित युवती से शारीरिक  रखने वाला पति बलात्कार का आरोपी होगा और उसे दो साल की कैद या जुर्माना हो सकता है, जबकि दूसरी ओर साधारण बलात्कार के मुकदमों में अधिकतम सजा आजीवन कारावास और न्यूनतम 7 साल की कैद का प्रावधान है। इस तरह परस्पर विरोधी बाते स्पष्ट दिखाई देती हैं।
हिन्दू विवाह अधिनियम में एक और विसंगति है - 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह वर्जित है और ऐसा करने वाल व्यक्ति को 15 दिन की कैद या सजा  या 100 रुपये का जुर्माना हो सकता है, लेकिन जो मुकदमे आज तक निर्णीत हुए हैं, उनमें देखा गया है कि इस तरह के विवाह भले ही दंडनीय अपराध है, लेकिन अवैध नहीं है। सवाल उठता है कि जब विवाह अवैध नहीं है तो सजा क्यों। इतना ही नहीं, हिन्दू विवाह अधिनियम और बाल विवाह अधिनियम की और भी विसंगतियां है। प्रावधान यह कै अगर किसी लड़की का 15 साल से पहले विवाह रचा दिया गया तो वह लड़की 15 साल की होने के बाद मगर 18 साल से पहले इसविवाह को अस्वीकृत कर सकती है। यानी कानून खुद मान रहा हैकि 15 साल से कम उम्र की लड़की की शादी उसके परिवार कर सकते हैं।  इस तरह के और कई विरोधाभास कानून में हैं।
एक अनुमान के अनुसार हर वर्ष विश्वभर में 10 से 12 मिलियन नाबालिग लड़कियों की शादी कर दी जाती है। यमन, अफगानिस्तान, इथोपिया और ऐसे ह कुछ अन्य देशों में तो युवा या विधुर उम्र दराज व्यक्ति किसी बच्ची का बलात्कार करते हैं और फिर उससे विवाह का दावा ठोंक देते हैं। वहां की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार उनकी शादी भी हो जाती है। भारत की बात करें तो यहां बाल विवाह पर कानूनन रोक है, लेकिन रात के अंधेरे में आज भी हजारों बाल विवाह हो रहे हैं।
भारत में 15-19 वर्ष की महिलाओं में 16 प्रतिशत या तो मां बन बन गयीं या पहली बार गर्भवती हुईं। इनमें सबसे भयावह स्थिति झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार की है। जहां क्रम 27.5, 25 व 25 प्रतिशत महालिएं 15 से 19 वर्ष के मध्य मां बन चुकी थीं या बनने जा रही थीं।
मुश्किल क्यों है बाल विवाह पर नियंत्रण?
सभी धर्मों और समुदायों में कम उम्र की विवाह को है जबरदस्त सामाजिक स्वीकार्यता है। बाल विवाह की रोकथाम के लिए कानून होने के बावजूद हमारे परिवार और समुदाय यह मानने को तैयार नहीं हैं कि बाल विवाह से बच्चियों को उनके स्वास्थ्य एवं जनन अधिकारों को क्या नुकसान होता है। जबकि ऐसे विवाह को अभी भी समाज मान्यता देता है।
यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पिछले दशक के दौरान बाल विवाह 47 फीसदी से घटकर 27 फीसदी रह गया है। क्या आप इसे एक अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड माना जा सकता हैं? यह एक अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड है लेकिन 27 फीसदी अभी भी भारत में बाल विवाह का काफी बड़ा आंकड़ा है। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिशत के लिहाज से आंकड़े भिन्न हो सकते हैं और कुछ क्षेत्रों में आंकड़े अभी भी 40 फीसदी तक अधिक हैं। हम आत्म संतुष्टï नहीं हो सकते बल्कि इसके खिलाफ अभियान को लगातार जारी रखने की जरूरत है।