सेहत की खेती

2018-12-29

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तस्वीर द्वारा-

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लेखक-परम

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‘कालानमक’ नामक चावल की खेती से भी किसान अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं। यह शुगर फ्री चावल है, इस कारण इसकी मांग भी इन दिनों काफी बढ़ रही है। हालांकि इसका उत्पादन कम होने के कारण यह काफी महंगा बिक रहा है।अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत पांच सौ रुपये किलो तक है। कालानमक नामक प्रजाति का चावल शुगर फ्री होने के साथ ही 40 से अधिक पोषक तत्वों से भरपूर है। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और झारखंड सहित देश के अन्य हिस्सों में इसके उत्पादन को पुन: बढ़ावा देने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें प्रयास कर रही हैं। नए सिरे से ब्रांडिंग भी की जा रही है। पिछले एक दशक में यह लुप्त होने की स्थिति में जा पहुंचा था।
झारखंड के किसानों की दिलचस्पी इसमें तेजी से बढ़ी है। 2017 में यहां इसे लेकर कुछ प्रयास शुरू हुए थे, जो अब अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। झारखंड के पाकुड़ और संताल क्षेत्र में इसका अधिक उत्पादन हो रहा है।  नीड्स नामक संस्था ने पिछले साल दो हजार से अधिक किसानों को इसके उत्पादन के लिए प्रेरित किया था। करीब 200 एकड़ पर उत्पादन किया गया। 600 किलो बीज से 12,000 किलो उपज तैयार हुई। यह सिलसिला अब चल पड़ा है।
खरीदारों की बात करें तो निर्यातक कंपनियां भी किसानों से संपर्क साध रही हैं। इनमें प्रख्यात संत श्रीश्री रविशंकर की कंपनी श्रीश्री साइंस एंड टेक्नोलॉजी ट्रस्ट बेंगलुरु भी शामिल है। कुलमिलाकर किसानों को उम्मीद जग गई है कि कालानमक उनकी तकदीर बदल देगा।
गौर करने वाली बात है कि भारत सरकार ने 2013 में पोषक फार्म योजना में कालानमक चावल को शामिल किया है। यह कुपोषण से लड़ने में सहायक है। इसे सरकार ने पोषक फसलों में से एक माना है। इसकी एक खूबी यह भी है कि इसमें अधिक तापमान झेलने की क्षमता है इसलिए जलवायु परिवर्तन के लिहाज से भी यह बेहतर है।
मनमोहक खुशबू के कारण अंग्रेजों के जमाने में ही यह चावल पूरी दुनिया में मशहूर था। पूर्वी उप्र के कुछ क्षेत्रों में कभी इसकी बंपर पैदावार होती थी। रासायनिक खादों के प्रयोग व उपेक्षा से यह लुप्त होने की स्थिति में जा पहुंचा।
हल्का नमकीन स्वाद और काली भूसी होने के कारण इस चावल का नाम कालानमक पड़ा है। इसकी खुशबू ऐसी है कि आप बासमती चावल को भूल जाएंगे। यह सुपाच्य है। इसमें लवण की प्रचुरता है। 40 प्रकार के खनिज होने के कारण यह यकृत और हृदय रोगों में भी लाभकारी है। इसमें लोहा और जस्ता पर्याप्त है। साधारण धान की फसल जहां 130 दिन में तैयार होती है, वहीं इसकी फसल को तैयार होने में 140 दिन लगते हैं।  
अनानास और काली मिर्च उगा रहे किसान
यह पहला मौका है जब झारखंड में केरल की तरह मसाले (काली मिर्च) की खेती शुरू की दी गई है। वहीं, उत्तर-पूर्व के राज्यों की तरह झारखंड में पाइनएपल की खेती शुरू की गई है। इससे बेरोजगारों रोजगार के सुनहरा अवसर मिलेंगे। रांची सहित पूरे झारखंड की मिट्टी व जलवायु अनानास (पाइनएपल) व काली मिर्च के लिए उपयुक्त है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, प्लांडू के वैज्ञानिक डॉ. विकास दास ने इस पर रिसर्च करते हुए अच्छी फसल भी उगाई गई है। अनानास व काली मिर्च की अच्छी पैदावार देख उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
वैज्ञानिक दास ने काली मिर्च की एक प्रजाति के पौधे कर्नाटक से लाकर और उसकी लत्तर आम के पेड़ों पर चढ़ाई। इसके बाद पौधे का ट्रीटमेंट किया गया। ताकि उन्हें कोई नुकसान न पहुंचे। पौधे लगाने के तीन साल बाद काली मिर्च की अच्छी फसल हुई।
प्लांडू में क्वीन प्रजाति के अनानास लगाए गए हैं। इस प्रजाति की फसल छोटी जरूर है, लेकिन फ्लेवर सर्वश्रेष्ठ है। बाजार में क्यू प्रजाति का अनानासमिलता है। प्लांडू में आम पेड़ के नीचे खाली जमीन पर अनानास के पौधे लगाए गए थे, जिससे अच्छी पैदावार हुई। वैज्ञानिक डॉ. दास बताते हैं कि झारखंड की जलवायु अनानास के लिए उपयुक्त है। रांची-टाटा मार्ग पर प्लांडू में पहली बार अानानास (पाइनएपल) की खेती शुरू की गई है। पहली बार जब अनानास की पैदावार हुई। फल साइज में कुछ छोटा है। इसमें मिठास अधिक है।
आईसीएआर वैज्ञानिक  डॉ. विकास दास का कहना है  झारखंड में अम्लीय मिट्टी के कारण आम की फसल कम होती है। आम बागान में किसान पेड़ के नीचे अनानास व पेड़ पर लत्तर से काली मिर्च की खेती कर अधिक मुनाफा कर सकते हैं। एक एकड़ में दस हजार अनानास के पौधे लग सकते हैं।
लेमन ग्रास चमकाती किस्मत
झारखंड के गोड्डा जिले के कदवा गांव में कभी चारों ओर बंजर जमीन और गरीबी के सिवा कुछ और नहीं था। ग्रामीणों के पास शहर जाकर मजदूरी करने के अलावा कोई और चारा नहीं था। लेकिन गांव की ही एक महिला के प्रयासों की बदौलत तस्वीर अब बिलकुल बदल गई है। सेरोफिना सोरेन नामक इस आदिवासी महिला ने अपनी सोच व मेहनत से गांव की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाया। सेरोफिना सोरेन की पहल पर आज उनका गांव लेमन ग्रास की खुशबू से महक रहा है। बंजर पड़ी रहने वाली जमीनों पर इसकी खेती शुरू की गई। जो अब इस आदिवासी गांव के किसानों की तकदीर बदल रही है।
गोड्डा जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर आदिवासी बहुल कदवा गांव के लोगों की गुजर-बसर का साधन खेती ही रहा है। लेकिन गांव की ज्यादातर भूमि बंजर है। इसलिए बड़े स्तर पर खेती नहीं हो पा रही थी। इंटर तक पढ़ी गांव की ही सेरोफिना ने इसका हल ढूंढ निकाला। बकौल सेरोफिना, गांव में काफी बंजर भूमि है। इसे उपजाऊ बनाकर आमदनी का जरिया बनाने का विचार किया। अपने शिक्षक पति सुनील कुमार हांसदा के जरिये कृषि विशेषज्ञ से बात की। उन्होंने बताया कि लेमन ग्रास बंजर भूमि पर भी उगती है। यहां की जलवायु भी इसके लिए उपयुक्त है। बस बात बन गई। अब लेमन ग्रास की खेती ने यहां के किसानों के चेहरे चमका दिए हैं।
सेरोफिना लेमन ग्रास की खेती देखने देहरादून भी गईं। वहां प्रशिक्षण लिया। फिर गांव पहुंच ससुर पटवारी हांसदा को इसकी खेती के लिए तैयार किया। अन्य किसानों को भी प्रेरित किया। पहले तो किसान तैयार नहीं हुए। कहा कि घास से क्या फायदा होगा। इसे खरीदेगा कौन। पर, जब बताया कि लेमन ग्रास बंजर जमीन पर होती है तो किसान तैयार हो गए।
बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए आज सबका सहयोग मिल रहा है। शुरुआत में 25 एकड़ भूमि पर लेमन ग्रास लगाई। बेहतर फसल देखकर अन्य किसान भी जुड़े। अब 46 एकड़ में खेती हो रही है। 75 किसान जुड़ गए है। दो तीन कटाई के बाद लेमन ग्रास और तेजी से बढ़ती है। जिला कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने मिट्टी जांच आदि में सहयोग किया। सेरोफिना ने कहा कि यदि गांव में सिंचाई सुविधा हो तो लेमन ग्रास की मेड़ पर मूली, गाजर जैसी सब्जियां भी उगाई जा सकती हैं। इस दिशा में कोशिश की जा रही है।
गुणों की खान है लेमन ग्रास
लेमन ग्रास का उपयोग हर्बल चाय व कॉस्मेटिक्स बनाने में होता है। इसका तेल निकाला जाता है। जो दर्द में उपयोगी होता है। इससे मधुमेह और रक्तचाप की दवाई बनती है। एलर्जी के उपचार में यह कारगर साबित होता है। लेमन ग्रास के आसपास मच्छर नहीं होते। इसे मवेशी भी नहीं खाते।